हिंदी पत्रकारिता में 4, तिलक मार्ग का योगदान..

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-राजीव मित्तल।।

बहादुरशाह ज़फर मार्ग और मंडी हाउस के बीचो बीच दिल्ली का शानदार रिहायशी इलाका है तिलक मार्ग..उसी में लबे सड़क एक बड़े से गेट पर 4 लिखा मिले तो रुकिए और इतिहास में खो जाइये..

4, तिलक मार्ग की ख़सूसियत कुछ वैसी ही रही जैसे झारखंड का वो इलाका जिसने राष्ट्रीय स्तर के कई हॉकी खिलाड़ी दिए थे..तो इस आशियाने ने हिंदी के कई संपादक दिए, जिनमें यह नाचीज भी टंका हुआ है..

करीब तीस साल पहले एकड़ों में फैले बाग बगीचे वाले इस 4, तिलक मार्ग में बेनेट कोलमैन के सर्वेसर्वा साहू अशोक जैन के कजिन साहू रमेश चंद्र जैन रहा करते थे, जो इस कंपनी के प्रबंधन के सर्वोच्च पद पर आसीन थे.. और बेनेट कोलमैन के चटनी मुरब्बा में क्या मिलाना है, क्या स्वाद रखना है, वो सब इन्हीं के जिम्मे था, खास कर नवभारत टाइम्स के तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों यही थे..सो, अल्ल सुबह जब यह अपने बेडरूम से केंची खुरपी के साथ अपना बाग बगीचा संवारने निकलते तो पत्रकारिता के कई ऊदबिलाव इन्हें झुरमुट से निहार रहे होते और मौका लगते ही चरण वंदना करने ताता थैया करते इनके समक्ष हाजिर हो जाते..

अपना नजीबाबादी कनेक्शन जब तब सुबह की चाय 4, तिलक मार्ग के गेस्ट हाउस में ही नोश फरमाता..लेकिन इस कनेक्शन और ताऊ-भतीजा के रूहानी संबंधों के अलावा अपने में और कोई खासियत नहीं थी, जबकि संपादकपद धारी कई बड़े नाम सब्जी फल मिठाई वगैरह के टोकरे लिए चढ़ावे को अपनी बारी का इंतजार करते दिखते..

समाचार भारती से ले कर न जाने कितनी मासूम पत्र पत्रिकाओं को कबाड़ में डालने के लिए मशहूर मरहूम घनश्याम पंकज……ऐसी शानदार इमारत कि जिसकी हर मंजिल लकदक करती हुई…..लेकिन नींव बेहद पोली…..कई बार ढहे……पर नींव पर कभी ध्यान नहीं दिया…हमेशा कमरा-छत-अलमारी संवारते रहे..रमेश चंद्र जैन के मुँह लगे दरबारी थे, तो कन्हैयालाल नंदन और आलोक मेहता स्किल्ड चोबदार..कतार बहुत लंबी है पत्रकारिता के तीतर, बटेरों, तोतों और मैनाओं की, जो 4, तिलक मार्ग को बरसों अपनी गुजर बसर का ठिकाना बनाये रहे..यहीं कई प्याली चाय चुसकने और न जाने कितनी बार रमेश चंद्र जैन की फुलवारी के दर्शनों के बाद अपन लखनऊ नवभारत टाइम्स के पालने में झूलने को नियुक्त पत्र पा गए राजेन्द्र माथुर के न चाहते हुए भी..

दिल्ली ने चौथी बार अपन का घोंसला उजाड़ कर फिर लखनऊ पहुंचा दिया..

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