दिल्ली का शाहीन बाग राजनीतिक विषय..

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-केशी गुप्ता।।

15 दिसंबर को शुरू हुआ शाहीन बाग का विरोध प्रदर्शन आज भी कायम है। यह विरोध प्रदर्शन भारतीय नागरिकता अधिनियम और सिटिजन अमेंडमेंट एक्ट को लेकर शुरू हुआ था। आज शाहीन बाग चर्चा का विषय बना हुआ है। हजारों की तादाद में औरतें बच्चे तथा अन्य लोग इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बने हुए। प्रमुख रूप से औरतों ने इस प्रदर्शन का नेतृत्व ले रखा है। शाहीन बाग कालंदी कुंज के रास्ते में आता है जो दिल्ली नोएडा को जोड़ता है। दिल्ली में इस साल जिस तरह की सर्दी पड़ी है उसके रहते हुए भी प्रदर्शनकारियों ने अपने कदम वापस नहीं लिए है। इस कड़कती ठंड में दिन रात सड़क पर बैठना कोई मजाक नहीं है। खासकर से औरतों के लिए जो कभी अपने घर से बाहर बिना किसी काम के नहीं निकलती।
शाहीनबाग प्रदर्शनकारी बहुत ही अहिंसक तथा शांत तरीके से सरकार द्वारा लागू किए गए भारतीय नागरिकता कानून के विरोध में बड़ी ही हिम्मत से डटे हुए है। प्रदर्शनकारियों और अन्य लोगों का यह मानना है कि भारतीय नागरिकता अधिनियम के द्वारा उनसे धर्म के आधार पर उनका नागरिकता अधिकार छीना जा रहा है। लोकतांत्रिक देश में विरोध प्रदर्शन करना कानून के विरुद्ध नहीं है बशर्ते वह हिंसात्मक ना हो। सवाल यह उठता है कि क्या इस विरोध प्रदर्शन से सरकार एक बार अपने लिए हुए फैसले पर विचार विमर्श कर जनता को राहत देगी? क्या देश की कार्यरत सरकार के लिए सड़क पर विरोध प्रदर्शन में बैठी आवाम कोई मायने रखती है?
इस विरोध प्रदर्शन को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही है। सड़क पर बैठे लोगों की वजह से आने जाने वाले लोगों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को इस प्रदर्शन को संभालने की हिदायत दी है मगर कोई ठोस निर्देश जारी नहीं किए गए हैं। प्रदर्शनकारियों के अनुसार उन्हें डराया धमकाया जा रहा है। आज देशभर में यह आग फैल चुकी है और देश के नागरिक भारतीय नागरिकता अधिनियम की सहमति और असहमति के बीच बट गए हैं जो अत्यंत चिंता का विषय है।यह समय है अपने अधिकारों और कर्तव्यों को साथ लेकर चलने का। सरकार का दायित्व बनता है कि वह आंदोलनकारियों के विरोध और विचारों को समझे तथा अपने विचारों को सही तरीके से जनता के समक्ष रखें।


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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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