मीडिया की छह साल की कीमियागिरी का नतीजा है युवाओं में नफरत और तीस जनवरी का गोलीकांड..

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-राजीव मित्तल।।

पहले तो चार साल तक एक सी ग्रेड एक्टिविस्ट को महात्मा गांधी बना कर पेश किया जाता रहा..जिसके चलते सारे भ्रष्ट अधिकारी और नेता सड़कों पर जाजम बिछा कर आम जनता, सरकारी कर्मचारियों और दुकानदारों को ईमानदार बनने की कसमें दिलाते हुए मीडिया में जगह पाते रहे..फिर राष्ट्रवाद ने अंगड़ाई ली और अन्ना हजारे को उनके गांव का टिकट कटवा कर भ्रष्टाचार मिटाओ, विदेशों में धरी काली कमाई लाओ टाइप आंदोलन चला कर देश की सत्ता हासिल कर ली…तब तक काग़ज़ी हो या चैनल, दोनों मीडिया के मालिक बंधुआ मजदूर बन चुके थे और उनके संपादक और उनकी टीम का काम.. वतन की आबरू खतरे में है, गाने भर का रह गया..

देश में बढ़ती जा रही बेरोजगारी, बिगड़ते आर्थिक हालात, चौपट हो रही बैंकिंग व्यवस्था, नष्ट हो रहे छोटे बड़े कारोबार, निजीकरण के नाम पर एक मजबूत नींव पर खड़े सरकारी उद्योग तंत्र की नीलामी, विदेशों में बन रहा मजाक- इन सबके बावजूद मीडिया का अहा रूपम अहा गायन, जो हारमोनियम और तबले के साथ शुरू हुआ था, अब रणभेरी बन देश भर में गूंजने लगा..

सरकार अपने दूसरे दौर में अपनी जन्म जन्मांतर की सारी इच्छाएं पूरी करने को आमादा हो उठी.. ड्रम और नफीरी बजाने को मीडिया पेशगी ले ही चुका था..लेकिन शाहीन बाग की औरतों ने सब किए कराए पर पानी फेर दिया..जैसे जैसे शाहीन बाग की जड़ और शहरों में फैलनी शुरू हुई, मीडिया बौखला गया क्योंकि पेशगी जो ले ली थी..तो एक से एक जंग खाए मुद्दे निकाले जाने लगे..सरकारी प्रवक्ता अपने कानून को तार्किक बनाने के लिए गांधी नेहरु युग में पहुंच गए, और उनके कहे को आधा अधूरा या अपने काम के वाक्य बांचने लगे और मीडिया मंत्रमुग्ध हो निहार रहा..उसे यह कानून भारत छोड़ो आंदोलन जैसा लग..

जब इससे भी काम नहीं चला तो कश्मीरी पंडितों का मामला उठा दिया..इसकी रामधुन दिल्ली से लेकर सुदूर मुजफ्फरपुर तक गूंजी.. लेकिन यह मुद्दा भी नहीं खिंचा तो दिल्ली के चुनाव सामने पड़ गए..खुद के पास कुछ गिनाने को था नहीं तो इस बार सरकारी नेताओं ने मीडिया को झंकार बना खुद गाना शुरू कर दिया सत्तर साल पुरानी ट्यून पर हिंदुस्तान हिंदुस्तान – पाकिस्तान पाकिस्तान..तो मीडिया और सरकार का यह मिल जुला राष्ट्रीय अभियान अब जम के गुल खिला रहा है और तीस जनवरी बापू की पुण्यतिथि के साथ साथ वो मंच बना दी गई है जहां कोई गोडसे हर साल किसी गांधी को गोली जरूर मरेगा क्योंकि राष्ट्रवाद की देशभक्ति की दैनिक योजना में गांधी सबसे बड़ा रोड़ा है..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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