ईरानी होटल सी बेनूर कांग्रेस…

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-राजीव मित्तल।।

वैशाली के जंगल में पीपल के पेड़ पर दो डालों के बीच में टिके बर्बरीक उर्फ बॉब और चैनली बाला के बीच 2004 में हुआ एक संवाद..

बॉब, ये बताओ कि कांग्रेस का ईरानी होटल से क्या कनेक्शन है!!

चैनली, एओ ह्यम ने तो एक कमरे पर कांग्रेस का बोर्ड टांगा और अपना समय ब्रिज खेलते काट गये जबकि उनके समय के नेता अंग्रेजों से हैलो-हाय में लगे रहे.. बीसवीं शताब्दी शुरू होते ही कांग्रेस लाल-बाल-पाल के अंगने में गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाने लगी..जब मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका में नस्लवादी गोरों को अहिंसा की ताकत दिखाने में लगे थे.. उन्हीं दिनों ईरान से आए पारसियों ने बॉम्बे में कुछ ईरानी होटल खोलने शुरू कर दिये..इन होटलों में कड़क मसालेदार चाय, कीमा भरे समोसे, पेस्ट्री-केक वगैरह का जोरदार इंतजाम रहता.. कुछ ही समय में ईरानी होटल बॉम्बे की पहचान बन गये. इधर कांग्रेस भी गांधी जी के भारत आते ही कुलाचें भरने लगी.. जैसे जैसे ईरानी होटलों की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा होता गया, कांग्रेस जन-जन की पार्टी बनती गई..

मो. क. गांधी ने महात्मा गांधी बन नील की खेती के खिलाफ आंदोलन, असहयोग आंदोलन, ख़िलाफत आंदोलन, दांडी मार्च वगैरह-वगैरह कर ब्रिटिश सरकार के पसीने निकाल दिए..तो ईरानी होटल भी चकाकच.. उस समय की बहुतेरी फिल्मों में ईरानी होटल का अपना एक किरदार होता था.. कई लोकप्रिय गाने ईरानी होटलों में फिल्माये गये..

देश आजाद हुआ और ईरानी होटल के समोसे का कीमा कांग्रेस ने लपक लिया.. शुरू के तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस छायी रही, चौथा चुनाव आते-आते कमर झुकने लगी.. इंदिरा गांधी ने 75 में ऑपरेशन करा कर कांग्रेस की रीढ़ निकलवा दी और उसकी जगह धातु की छड़ डलवा दी.. पर जब उसमें भी क्रेक आ गया तो उसे बैसाखी पर लटका दिया. ईरानी होटल भी समय के साथ-साथ अपनी रंगत खोने लगे और खुशबूदार शांत वातावरण बजाजे की दुकान बनने लगा.. राजीव गांधी आये तो कांग्रेस के पपड़ाये गालों पर गुलाबी रंगत दिखायी दी लेकिन कुछ ही दिनों में उसे पेचिश लग गयी.. दो साल में दो विपक्षी सरकारें गिरने के बाद कांग्रेस को ऐसी गोली खिलायी गयी कि पेचिश तो रुक गयी पर पेट की दुखन नहीं गयी.. कबाड़ से निकाले गये नरसिम्हाराव ने उसे सुहागा चटा-चटा कर किसी तरह पांच साल खींचे ..

उधर ईरानी होटलों में गुजराती थाली मिलने लगी और उसका हाल आम रेस्तरां जैसा हो गया. न ही रह गया वो ज्यूक बॉक्स, जिसमें चार आने का सिक्का डाल कर अपनी मन पसंद के गाने सुने जा सकते थे, न रह गया वो माहौल, जो फिल्मों में काम करने के लिये धक्के खाने बम्बई आये किसी नौजवान को ठंडी और मीठी छांव देता.. कांग्रेस भी लंगड़ दी हट्टी बन गयी.. पैसा गिनते-गिनते अध्यक्षी करने बैठे सीताराम केसरी ने देवेगौड़ा और गुजराल को कांग्रेस की बैसाखी थमा कर दो-चार दिन का प्रधानमंत्री बना दिया. बैसाखी हटा ली तो दोनों दिल्‍ली पर भार बन गये.. फिर केसरी ने खुद प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा..अंत में सोनिया को उनके गले में पट्टा डालना पड़ा..

बचे ईरानी होटल, तो किसी में यूरिया खाद का बोर्ड टंगा है तो कोई जम्पर-कच्छे बेच रहा है, कुछ सब बेच-बाच कर ईरान चले गये.. ईरानी होटल तो हवा हुए अब देखो, नेहरू परिवार की अगली पीढ़ी क्या गुल खिलाती है..

(2004 के बाद ईरानी होटल बचे नहीं और दस साल सत्ता में रहने के बाद पिछले छह साल से कांग्रेस फिल्म पड़ोसन का महमूद बन भाजपा के सामने इक चतुरनार की तान पे ही अटक ता ता थैया कर रही है)…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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