शाहीन बाग और भारतीय लोकतंत्र..

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प्रियदर्शन

चुनाव लोकतंत्र की देह है. लेकिन संवाद उसकी आत्मा है. संवाद न हो तो लोकतंत्र निष्प्राण है, वह सिर्फ़ शव है. अगर आप चुनाव जीत जाते हैं और संवाद छोड़ देते हैं तो आप लोकतंत्र का शव ढो रहे होते हैं. चुनाव बहुत ठोस चीज़ है- हम जानते हैं कि वह क्या होता है, उसके नतीजे कैसे तय होते हैं. लेकिन संवाद एक सूक्ष्म प्रक्रिया है. उसमें सिर्फ़ बोलना और सुनना नहीं होता, उसमें मर्म तक पहुंचना होता है. जब हम वह सुनने लगते हैं जो कहा नहीं जा रहा, और वह कहने लगते हैं जो हम करना नहीं चाहते- तो यह संवाद का दिखावा होता है, संवाद नहीं. दुर्भाग्य से आज यही हो रहा है. बीते ही साल बीजेपी ने लोकसभा चुनाव जीते हैं- इतने भारी बहुमत से कि 37 फ़ीसदी वोट लाने के बावजूद वह मान रही है कि पूरा देश उसके पीछे है. इस अहंकार में उसने संवाद की उपेक्षा ही नहीं की है, उसको तोड़ा-मरोड़ा भी है. शाहीन बाग़ का उदाहरण ले सकते हैं.

शाहीन बाग़ से बहुत सारी आवाजें आ रही हैं, बहुत सारे दृश्य आ रहे हैं. वहां तिरंगा लहराया जा रहा है, वहां जन-गण-मन और वंदे मातरम तक गाया जा रहा है, वहां भारत का सुंदर नक्शा बनाया जा रहा है. वहां भारत की साझा संस्कृति के गीत गाए जा रहे हैं, वहां गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल वाली आज़ादी के नारे लगाए जा रहे हैं, लेकिन बीजेपी को यह सब सुनाई और दिखाई नहीं पड़ रहा. उसे बस दो हाशिए की आवाज़ें सुनाई पड़ीं जिन्हें शाहीन बाग के मंच का समर्थन नहीं मिला. कहीं किसी ने जिन्ना की आज़ादी का ज़िक्र किया या नहीं- यह साफ़ नहीं है, लेकिन रामदेव से लेकर बीजेपी के कई नेता तक यही नारा ले उड़े- बताते हुए कि शाहीन बाग़ में कैसे अलगाववादी तत्व सक्रिय हैं. दो दिन पहले शरजील इमाम का वीडियो सामने आया तो अचानक शाहीन बाग़ विरोधी ताकतें उछल पड़ीं. उन्हें शाहीन बाग को अलग-थलग करने का एक बहाना मिल गया.

इसमें शक नहीं कि शरजील इमाम वैचारिक तौर पर बुरी तरह भटकावों का शिकार युवक है जो गांधी तक को फासीवादी करार दे रहा है. उसके और उसके विचारों के साथ खड़ा नहीं हुआ जा सकता. शाहीन बाग़ के आंदोलन में भी उसके विचारों को कोई समर्थन नहीं मिला. यह अलग बहस है कि उसके बयान भर को देशद्रोह माना जाए या नहीं. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट तक यह कह चुका है कि सिर्फ़ भाषणों और बयानों से देशद्रोह नहीं होता. जाहिर है, देशद्रोह एक कृत्य है जो तब हो सकता है जब दविंदर सिंह जैसे संदिग्ध पुलिस अफसर आतंकवादियों को संरक्षण देते हुए सुरक्षित निकालने का काम करें. यह अलग बात है कि ऐसे शख़्स पर देशद्रोह की धारा नहीं लगाई जाती. या जो लोग यूपी में एक इंस्पेक्टर की सड़क पर हत्या कर देते हैं, वे देशद्रोही नहीं होते हैं, भले ही उससे पुलिस का मनोबल बुरी तरह टूटता हो. बहरहाल, शरजील इमाम शाहीन बाग का पोस्टर ब्वाय नहीं है- भले उसे बनाने की कोशिश की जा रही है. शाहीन बाग भी टुकड़े-टुकड़े गैंग का केंद्र नहीं है, भले ही उसे यह बताने की कोशिश हो रही है. और यह टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसी कोई चीज़ नहीं है- अपनी सुविधा से एक दुश्मन गढ़ने और उस पर हमला करने की संघी मानसिकता का नया विस्तार है. दरअसल प्रधानमंत्री सहित बीजेपी के नेता जिस हिकारत के साथ टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं, उससे पता चलता है कि उनके भीतर उन लोगों को लेकर कितने गहरे पूर्वग्रह हैं जो राष्ट्रवाद या देशभक्ति के उनके दिए मुहावरे से कुछ भी अलग हट कर सोचते हैं? चाहें तो याद कर सकते हैं कि टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द ही एक संदिग्ध टीवी रिपोर्ट के साथ आया.

जेएनयू में चल रहे एक कार्यक्रम के दौरान लगा यह नारा किन लोगों ने लगाया, यह अब तक साफ़ नहीं हो पाया है, लेकिन उसके गुनहगारों की पहचान कर ली गई. फिर एक गैंग पुरस्कार वापसी के नाम पर खड़ा कर दिया गया. जो लोग कुछ साल पहले चली पुरस्कार वापसी की मुहिम को क़रीब से जानते हैं, वे जानते हैं कि यह पूरी मुहिम स्वतःस्फूर्त रही और इसमें आपस में बिल्कुल टकराते लेखक भी शामिल रहे. लेकिन सम्मानित लेखकों को ‘गैंग’ बताना, आंदोलन कर रहे कुछ लोगों को देश का दुश्मन बताना, जिस आंदोलन में बड़े पैमाने पर महिलाएं और अस्सी पार की बुज़ुर्ग औरतें शामिल हैं, उससे बलात्कारियों के निकलने की कल्पना करना बिल्कुल डरावना है. इससे पता चलता है कि बहुमत के अहंकार में डोलती सरकारें किस हद तक विषवमन तक जा सकती हैं? लेकिन बीजेपी यह दुस्साहस किस भरोसे कर रही है? क्या उसे लग रहा है कि पूरे के पूरे हिंदू समाज को वह वैसे ही सांप्रदायिक रंग में रंग लेगी जैसे संघ और उसके संगठन रंगे हुए हैं? असल में यह सवाल जितना बीजेपी से है उतना ही इस देश की बहुसंख्यक आबादी से भी है. यह सच है कि इस देश के बहुसंख्यकवादी रवैये ने- जिसका हम सब हिस्सा हैं- कई बार हमें बहुत निराश किया है. लगता है, जैसे उसके जातिगत, लैंगिक और सांप्रदायिक पूर्वग्रह कभी जाएंगे ही नहीं. लेकिन यह भी सच है कि कई निर्णायक मौक़ों पर उसने ऐसे पूर्वग्रहों से बाहर आने का जज़्बा भी दिखाया है- खास कर ऐसे मौकों पर, जब उसके सामने कोई राष्ट्रीय संघर्ष आया हो.

गांधी के नेतृत्व में चली आजादी की लड़ाई के दौरान विकसित हुई राष्ट्रीयता इस जज़्बे का अपूर्व उदाहरण रही. आज फिर से हमारे सामने एक इम्तिहान है- हमारी उस भारतीयता का इम्तिहान जिसमें हर नागरिक खुद को बराबर का हिस्सेदार माने, हमारी उस भारतीयता का इम्तिहान जो पिछले हज़ार साल में बहुत सारी नदियों और संस्कृतियों का पानी लेकर कुछ इस तरह विकसित हुई है कि खान-पान, आचार-व्यवहार-बोली-बानी और कपड़े-लत्ते से उसके अलग-अलग समुदायों को पहचानना लगभग नामुमकिन हो जाए- भले देश के प्रधानमंत्री उन्हें कपड़ों के आधार पर पहचानने पर तुले हों. इस इम्तिहान के लिए अधिकतम संवाद जरूरी है. केंद्र सरकार अपने दुराग्रह छोड़ कर इस संवाद से जुड़े तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. कुछ मंत्री शाहीन बाग़ जाएं और वहां लोगों से बात करें तो शायद साथ आगे बढ़ने की कोई सूरत निकले. अगर यह काम पहले हुआ होता तो वहां न किसी तरह की नागवार गुज़रने वाली आज़ादी के नारे लगते न किसी शरजील को कुछ मूर्खतापूर्ण बातें कहने का मौक़ा मिलता. संकट यह है कि ऐसी मंशा भी फिलहाल दिखाई नहीं पड़ती.

में शाहीन बाग़ क्या करे? क्या वह शहर के एक मुहाने पर बैठ कर तरह-तरह के इल्ज़ाम और किसी हताशा, किसी नासमझी में उछले बयानों के दाग़ झेलता रहे? या वह वहां से उठे और आगे का रास्ता खोजे? जो संवाद बीजेपी और उसकी सरकार संभव नहीं होने दे रही, उसे घर-घर जाकर संभव करे और अंततः लोकतंत्र को उसकी वह आत्मा लौटाए जो फिलहाल कहीं दिख नहीं रही. शाहीन बाग़ को इस बारे में विचार करना चाहिए, उठ कर आगे बढ़ने और आंदोलन को विराट जनांदोलन में बदलने के विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए.

(प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं.)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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