कुणाल कामरा बनाम अर्णब गोस्वामी: कौन सही कौन गलत.?

Page Visited: 2002
0 0
Read Time:3 Minute, 59 Second

-श्याम मीरा सिंह।।

कुनाल कामरा ने जो किया वह किसी की भी डिग्निटी के खिलाफ है. प्रथम दृष्टया ही यह किसी की प्राइवेसी में घुसना ही नहीं था बल्कि अपमानजनक भी था, ह्यूमिलिएटिंग भी था. लेकिन “आदर्श” बने रहने की भी सीमाएं होती हैं. एक एंकर किसी टीवी स्टूडियो में बैठकर नस्ल की नस्ल खराब कर रहा हो, अवसर मिलने पर उसे, उसके किए का अहसास भी न कराया जाए? कितना व्यवहारिक है?

जनता ऐसे दलाल एंकर की एकाउंटेबिलिटी किन माध्यमों से तय करेगी? सवाल पूछने से ज्यादा नरम माध्यम और क्या हो सकता है?

एक व्यक्ति पूरे दिन एक “वर्ग” को टुकड़े टुकड़े गैंग, देशद्रोही, चीन से फंडेड कहता है, सरकारी हुकूमत के आगे दुम हिलाता है, यूनिवर्सिटीयों, छात्रों को लेकर हद्द नीच दर्जे के आरोप लगाता है. उसका प्रतिकार भी न किया जाए? क्या ये अति आदर्शवादी बात नहीं हो जाती? अर्नब टीवी चैनल की स्क्रीन से पब्लिकली कितनी ही बार कुनाल कामरा, ध्रुव राठी, रवीश कुमार को लेकर भ्रामक आरोप लगा चुका है. उसका प्रतिकार सवाल पूछने के अलावा, किन शब्दों में किया जा सकता है? कुनाल ने कोई गाली नहीं दी, कुनाल ने हाथापाई नहीं की. गला नहीं खींचा. बस इतना कहा कि जिन्हें तुम टुकड़े टुकड़े गैंग कहते हो वो सामने है, उसे जवाब दो!

और क्या अन्य तरीका हो सकता है जनता के पास?
स्टूडियो नहीं घुस सकते, घर में नहीं घुस सकते, कार्यालय नहीं घुस सकते. जहर फैलाने वाला जहां मिलेगा वहीं उसकी जवाबदेहिता तय की जाएगी न!

जो काम पूरे देश की जनता को मिलकर करना चाहिए था, वो कुनाल ने किया. देश के हर नागरिक को ऐसे लोगों से सवाल करने चहिए, जवाब मांगना चाहिए, जवाबदेहिता तय करनी चाहिए कि कैसे वह सरकार से विरोधी विचार रखने वालों पर विदेशी फंडिंग के झूठे आरोप लगा देता है, किन आधार पर वह किसी को देशद्रोही कहता है, किन आधार पर वह एक विश्वविद्यालय को टुकड़ों पर पलने वाला कहता है?

स्टूडियो में बैठकर नागरिकों को अवैज्ञानिक और धर्मान्ध बनाने वाले लोगों को जवाबदेहिता से हमेशा मुक्त नहीं रखा जा सकता. जनता को भी पूरा हक है कि उनसे सवाल पूछे. जितना अर्नब, सुधीर चौधरी, चौरसिया, अंजना ओम कश्यप, सुरेश चव्हाण जैसे एंकरों ने इस देश के नागरिकों की सोचने की समझ पर नियंत्रण किया हुआ है, उतना कोई बड़े से बड़ा संगठन मिलकर नहीं कर सकता. कोई आपके देश की पूरी नस्ल को खराब कर दे. ऐसे लोगों के प्रति सभ्य बने रहना ढोंग करने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है. हिंदी भाषा के मेरे पुरखे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने कहा है- भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं, उसे तबतक घूरो जबतक तुम्हारी आंखें सुर्ख न हो जाएं”.
कुनाल कामरा वही कर रहे थे.

“ऐसे लोगों का प्रतिकार करना “जुर्म” होते हुए भी “कर्तव्य” हो गया है.”

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram