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क्या आपने ऐसी “शाकाहारी लिंचिंग” देखी है.?

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-श्याम मीरा सिंह।।

चौरसिया समाचार की दुनिया के मंझे हुए हुए कलाकार हैं, जिन्हें पता है कि कंघी, साबुन, तेल, शर्प, की तरह, खबर कैसे बेची जाती हैं. लेकिन इस घटना के बाद, चौरसिया जी अन्य एंकरों के ऊपर एक पारी की बढ़त बना गए हैं, अब उन्होंने खबरों को आयात करने की जगह निर्यात करना शुरू कर दिया है. ऐसा करके वो दुनिया के पहले “सेल्फडिपेंडेंट पत्रकार” बन गए, जिसे समाचारों के लिए गांव-गांव घूमना नहीं पड़ेगा. अब वे स्टूडियो में ही खबरों का उत्पाद कर सकते हैं. और ऐसा करके वो मोदी जी के “मेड इन इंडिया” को भी बढ़ावा दे रहे हैं.

कल चौरसिया शाहीनबाग पहुंचे, और लौटे तो इस आरोप के साथ कि वहां उनकी लिंचिंग हो गई होती. क्या आपने कभी ऐसी शाकाहारी लिंचिंग देखी है, जिसमें कान के नीचे एक कपाट भी न बजा हो? कपड़ों की एक शिकन तक खराब न हुई हो? और लिंचिंग भी हो गई हो?

आपने ऐसी अहिंसक लिंचिंग देखी है? क्या ये लिंचिंग वेजिटेरियन लिंचिंग थी? या शाकाहारी लिंचिंग थी? अगर चौरसिया के साथ जो हुआ वह आपको भी लिंचिंग लग रही है. तो इसका मतलब है कि आपने असली लिंचिंग देखी ही नहीं हैं.

जिस जगह से चौरसिया रिपोर्ट कर रहे थे, वहीं पर वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह भी थीं, उनके अनुसार बहुत पहले से ही दीपक चौरसिया के आने का माहौल क्रिएट किया जा रहा था, सबको पता था चौरसिया सरकारी पिच के ओपनर बल्लेबाज हैं, उन्हें लेकर पहले से ही जनता के बीच में नाराजगी थी. चौरसिया भीड़ के ठीक बीच में थे, उसी भीड़ में से ही कुछ लोग आए जिन्होंने कहा कि आप बिना आयोजकों की मर्जी के अचानक से वीडियो नहीं ले सकते, आप कैमरा बन्द कर लीजिए. जब मामला थोड़ा बढ़ा, तो मंच से तुरंत एक आवाज लगाई गई कि किसी के भी साथ, किसी भी तरह की हिंसा न हो. तभी मंच से ही कुछ लोगों ने आकर, चौरसिया और उनके साथियों को प्रोटेक्ट करते हुए बीच भीड़ में से बाकायदा सुरक्षित बाहर निकाल दिया. अब यहां कुछ तर्क के साथ सोचने की जरूरत है.

  1. क्या आपने लिंचिंग वाली ऐसी कोई भीड़ देखी है? जो मारने वाले को सुरक्षित निकाल दे? क्या चौरसिया शक्तिमान थे जो इतनी बड़ी भीड़ में होने के बावजूद एक भी टमाचा खाए बाहर निकल आए!. यदि बाहर किसी और ने निकाला था तो चौरसिया को सुरक्षित बाहर निकालने वाले लोग कौन थे? यदि वे लोग शाहीनबाग के ही लोग थे तो शाहीनबाग को बदनाम करने वाले कौन लोग हैं? या चौरसिया खुद ही ऐसा ड्रामा क्रिएट करना चाहते थे?
  2. करीब 42 दिन हो गए उन औरतों को दिसम्बर, जनवरी की ठंड में. अब आप बताइए, 42 दिन बाद कथित पत्रकार जी आंदोलन को कवर करने पहुंचते हैं, इस सवाल के साथ कि आंदोलनकारियों की आवाज सरकार तक पहुँचाएंगे. जबकि 42 दिन तक स्टुडियो में बैठकर जितना नंगा नाच किया है, सबको पता है.

अब मेरा सवाल दीपक चौरसिया जी से है कि जब आप उन औरतों की आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए ही गए थे, तो उन औरतों को आप पर विश्वास क्यों नहीं हो रहा था? आपको लेकर शाहीनबाग की जनता इतने अविश्वास में क्यों थी? आप पत्रकार थे, पत्रकार पर तो जनता का विश्वास होता है, फिर लोग आप पर विश्वास क्यों नहीं कर पा रहे थे?

आप 42 दिनों तक स्टूडियो में बैठकर पत्रकारिता पर मूतते रहे, फिर 43 वे दिन उठे, और कैमरे लेकर वहीं पहुंच गए, जिन्हें आप रोज दंगाई, देशद्रोही, जिहादी कह कहकर बदनाम कर रहे हैं. और फिर ये सोचें कि लोग आपका प्रतिकार नहीं करेंगे, ये कैसे सम्भव है?

लोगों को पूरा हक है कि वे आपके निरे झूठ के प्रति असहमति जताएं, अपनी वीडियो लेने से मना कर दें.

शाहीनबाग के लोग आपके प्रति शंकित थे, क्योंकि उन्हें पता था कि आप यहां से उनकी वीडियो ले जाओगे, स्टूडियो में जाकर उसे दिन-रात बेचोगे. फिर वो क्यों लेने दे अपनी वीडियो. ऐसी दलाली करकर, एक पार्टी के भौंपू बनकर, पत्रकार होने के प्रिविलेज तो नहीं ले सकते न,

कितने ही लोग शाहीनबाग से लगातार लाइव कर रहे हैं, कितने ही लोग यूट्यूब पर वीडियो अपडेट कर रहे हैं, वहां क्विंट के पत्रकारों को कोई कुछ नहीं कहता, वहां द प्रिंट के पत्रकारों को कोई कुछ नहीं कहता, वहां लल्लनटॉप, एनडीटीवी, बीबीसी, द वायर के पत्रकारों को कोई कुछ नहीं कहता, लेकिन आपको लेकर आम।जनता इतने अविश्वास में क्यों है, क्या ये सवाल आपको।खुद से नहीं करना चाहिए? आपको सच में सोचना चाहिए कि आप पत्रकारी ही कर रहे हैं या दलाली करने लग गए हैं. क्योंकि जो पत्रकार होता है, वह जनता का आदमी होता है, जनता उसे सर आंख बिताती है. अगर जनता आपको लेकर अविश्वास में है तो इसका मतलब है आप उस पक्ष से हैं जो जनता का शोषण करता है. और यदि ऐसा है तो जनता को पूरा हक है कि ऐसे बिचौलियों के प्रति अपनी असहमति जताए.

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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