अखबारों की जांच का तमाशा, जांच करने वाले ही बटोर रहे है मोटी रिश्वत..

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-महेश झालानी||

अखबारों के घोटालों की ईमानदारी से जांच होनी चाहिए, इस पर ना तो किसी पत्रकार को एतराज है और ना ही समाचार पत्र संगठन को । अगर अखबारों की जांच की जाती है तो जांच करने वाले अधिकारियों के काले धंधों की जांच करना भी अनिवार्य है ।

राजस्थान के अलवर का एक मामला प्रकाश में आया है । अलवर के जन सम्पर्क अधिकारी योगेंद्र शर्मा ने एक कुख्यात अखबार की फर्जी रिपोर्ट पेश करने के लिए ना केवल 35 हजार रुपये ऐंठ लिए बल्कि अपने एक रिश्तेदार को फर्जी अखबार का प्रभारी भी बनवा दिया । जयपुर स्थित इस अखबार अलवर सहित पांच संस्करण है । मजे की बात यह है कि जयपुर के अलावा इस अखबार का ना तो कही कार्यालय है और ना ही प्रेस । फर्जी संस्करण के आधार राज्य एवं केंद्र सरकार से हर माह लाखो रुपये के विज्ञापन बटोरे जा रहे है ।

पीआरओ साहब ने इस अखबार का जहां कार्यालय दर्शाया है, वस्तुतः वहां भैस का तबेला है । जिस प्रेस में अखबार प्रकाशित होने का उल्लेख है, उस प्रेस में आज तक इस अखबार की एक भी कॉपी प्रकाशित नही हुई । अपने कारनामों और करतबों की वजह से जन सम्पर्क अधिकारी महोदय काफी कुख्यात है । झुंझुनू से अलवर तबादला होकर आ रहे थे तो साथ मे कुर्सी भी ले आये । इस बार फर्जी सफाई के लिए ये पुरस्कृत भी हो चुके है । बताया जाता है कि और भी कई अखबारों की जांच के नाम पर उगाही करने का आरोप है ।

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