मोदी-शाह साहब के निजाम में लोकतंत्र ऐसा बचकाना ही हो सकता है..

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-विष्णु नागर।।

अमित शाह जी लखनऊ में डंके की चोट पर कह आए हैं कि जिनको विरोध करना हो, कर लेंं, सिटीजन अमेंडमेंट बिल वापिस नहीं होगा। मोदी-शाह साहब के निजाम में लोकतंत्र ऐसा बचकाना ही हो सकता है,जहाँ विरोध को लात मारी जाती है। दरअसल बचपन में अमित शाह ऐसी दादागीरी कर चुके होते तो दिमाग अधिक परिपक्व हो चुका होता। हमारे बचपन में स्कूल का दादा कहता था-‘ हाँ जा मैंने तेरी पेंसिल-रबर चुराया, तू जो कर सकता है, कर ले’। फिर भले ही वह दादा मास्टर साहब या माँ-बाप से पिट जाता था। शाह साहब या तो बचपन में ऐसी हरकतों पर कभी पिटे नहीं, किसी दोस्त ने उन्हें रगड़ कर धूल नहीं चटाई या इतने डरपोक रहे होंगे कि कुछ कर नहीं पाए होंगे। दादागीरी कोई करता होगा तो सह लेते होंगे। इसलिए गृहमंत्री होकर अब ऐसी बात कर रहे हैं।

समझ में नहीं आता कि इस पर हँसूँ या रोऊँ या दोनों करूँ! गृहमंत्री तो फिलहाल वह हैं मगर उन्हें मानूँ या मानूँ कि शाह साहब बचपना करके अपना खोया हुआ बचपन लौटाने की कोशिश कर रहे हैं। वैसे भाजपा के ऐसे ही कुंठित बचपन बिताने वाले ‘संस्कारी’ अधेड़ों-बूढ़ों से भरी हुई है। दरअसल भाजपाइयों का बचपना शुरू हो रहा है अब,जबकि उनका बुढ़ापा शुरू हो जाना चाहिए था!बचपन में भद्दी गालियाँ न दे पाने की कुंठा, डींगें न मार पाने की कुंठा अब ये रोज निकाल रहे हैं, प्रतियोगिता कर रहे हैं। बुरा लगे भाइयों तो एक रोटी ज्यादा खा लेना मगर पोहे मत खाना! क्या पता आपकी पार्टी के महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय आपको भी बांलाग्लादेशी घोषित कर दें!

शाह जी पहले तो बता दूँ कि अगर आप ही देश के गृहमंत्री हैंं तो माननीय आपके ही कर- जो कि कमल नहीं हैंं- यह बिल अब एक्ट बन चुका है। यह सीएबी था , अब सीएए है।यह अब बिल नहीं, आपका बिल्ला है। खैर अगर आप मंत्री होने के अलावा संयोगवश इनसान भी हैं तो इनसानों से ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं। और अगर आप वह न हों तो क्षमा करें कि मैंने यह कहने की गुस्ताखी की कि आपसे गलती हो गई होगी! दरअसल गलती आपसे नहीं,महोदय, हम देशवासियों से हुई है कि दुबारा मौका मिला तो हमने और भी बड़े पैमाने पर वही गलती कर दी, जो हमने 2014 में कर चुके थे। पिछले पाँच साल में भी हम आपको समझ नहीं पाए, इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं,आप नहीं।

लगता है डंके पर चोट करनेवाले शाह जी आप भी अपने को छप्पन इंची सिद्ध करने में लगे हैं, जबकि जिसने कहा था, उसकी जुबान जरूर छप्पन इंची है मगर सीना भी इतने इंची है, इस पर लोगों को संदेह है। लोग नापने को आतुर है, वह विदेश भागा फिरता है। तो शाह साहब तथाकथित किस्म की मर्दानगी दिखाने का शौक आपको भी बहुत चर्राने लगा है! ऐसा है माननीय, आप कितने बड़े मर्द हैं या जो भी हैं, यह आपका निजी और घरेलू मामला रहे तो अच्छा! एक और तरह की मर्दानगी के सड़क शो दिल्ली में प्रतिदिन, प्रति मिनट चलते रहते हैं। रिक्शावाला जरा सा स्कूटर,मोटरसाइकिल या कार के रास्ते में आता दिखा तो ये बीच सड़क पर अपनी कार या मोटर साइकिल रोककर उसे दस गालियों के साथ दो थप्पड़ नवाजते हैं। वह यह पूछने की’गलती’ कर दे कि हुजूर मेरी गलती क्या थी तो दो और रसीद कर देते हैं । कोई बीच में आए तो उस पर पिस्तौल या छुरा तान देते हैं। आप कहीं उस तरह के दिल्ली वाले मर्द तो नहीं हैं! इस तरह की मर्दानगी की वैसे कई किस्में आज बाजार में उपलब्ध हैं। एक किस्म फिल्म के परदे पर सलमान खान वगैरह शर्ट निकाल कर परोसते हैं। सलमान एकसाथ पचास लोगों से निबट लेते हैंं और एक- एक का भुर्ता बनाकर छोड़ते हैंं।वैसे अब तो बच्चे भी जानते हैं कि इस मर्दानगी में कैमरे का कमाल है,सलमान का नहीं। आशा है(मगर विश्वास नहीं है) कि आप उस तरह के मर्द बनकर दिखाना नहीं चाहते होंगे वरना सलमान खान के आगे पूरे गावदू लगेंगे और आपकी फिल्म पिटने का नया इतिहास कायम करेगी।

चूँकि आप’ संस्कारी’ हैं और आप मर्दानगी की भाषा ही समझते हैं तो माननीय असल मर्द तो वे औरतें हैं, जो सीएए और एन आर सी के खिलाफ पर्दे से बाहर निकल कर कड़ाके की ठंड में सड़क पर निकल आईंं और आप जैसों की मर्दानगी को चुनौती देते हुए देश के कोने- कोने में उठ खड़ी हुई हैं। सरकारी ताकत, ताकत नहीं होती, सरकार गई और ताकत गई। ताकत वह होती है महोदय, जो कँपकपाती ठंड से नहीं घबराती। आँसू गैस, डंडा, गोली की ताकत से नहीं डरती।बंदूकें धोखा दे जाती हैं, यह ताकत धोखा नहीं देती, जो मदांधों के सामने संविधान की किताब लेकर खड़ी हो जाती है। लाठी गोली की ताकत तो आती -जाती रहती है महाशय संविधान की ताकत आती- जाती नहीं, लोकतंत्र का आखिर तक साथ निभाती है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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