हिन्दनामा एक रेलगाड़ी है..

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-राहुल बुयाल।।

हैं कुछ ख़राबियाँ मेरी तामीर में ज़रूर
सौ मर्तबा बना के मिटाया गया हूँ मैं!

आसी के इस शे’र की कसम ! हिन्दनामा किसी पुस्तक का नाम नहीं है, एक देश के इतिहास का नाम है। बहुत गहन चिन्तन के बाद कहना पड़े तो कहूंगा कि यह इतिहास का नाम नहीं, इतिहास की छाती में गड़ी हुई फाँस का नाम है। जहाँ से कविता का रूदन आरम्भ होता है, वहाँ से हिन्दनामा के उच्छ्वास का उदय होता है क्यों कि –

इस महादेश में कविता लिखना
जीवन – मरण का प्रश्न था!

यह कवि कृष्ण की कथा नहीं है, न ही यदुवंशी कृष्ण की बंशी है। यह पत्थरों की सभ्यता है, जल की संस्कृति है। आग से उपजा हुआ कोई कृष्ण कल्प को गल्प की तरह प्रस्तुत करता है, जब यही गल्प लोक की जिह्वा पर बैठता है तब नये स्वाद की पुनर्स्थापना होती है।

ऋण लेकर घृत पीने वालों की
इस महादेश में
किसी भी काल में
कोई कमी नहीं रही।

हिन्दनामा जिये गये जीवन की कल्पना है या मरे हुए समय का यथार्थ, यह ठीक- ठीक कहा नहीं जा सकता। कितने इतिहासकारों ने कविता लिखी, कितने कवियों ने इतिहास! विस्मय से भरे इस प्रश्न के उत्तर में इतना विस्मय है कि इसे अविस्मरणीय करने के लिए विस्मृत समय की ओर दृष्टि करना अवश्यम्भावी जान पड़ता है।

मुझे सन्देह है कि
कावेरी से प्राचीन पवित्र और स्वच्छ
कोई दूसरी नदी इस पृथ्वी पर होगी
गंगा में धुलते होंगे पाप
पर कावेरी गंगा की तरह
पाप की धोबन नहीं थी।

हिन्दनामा किसी शाह की वाह में उठा हुआ परचम नहीं है। किसी राज के तख़्त-ओ-ताज का चर्चा नहीं है। यह समय की दी हुई चोटों का इलाज भी नहीं है। घाव के भीतर रिसता हुआ लहू भी नहीं है। क्या यह एक कल्पना के देश का यथार्थ है? नहीं, फिर यथार्थ के देश की कल्पना? नहीं!!! यह तो कल्पित समय की वास्तविक गाथा है जिसे एक देश ने भोगा है, एक कवि ने देखा है! बहुत से ये सब कह सकते हैं मगर जादू कैसे होता है, यह ठीक-ठीक कब कहा जा सका है।

ज्ञान जहाँ समाप्त होता है
जादू वहीं से शुरू होता है
यह देश जादूगरों का देश था!!!

इसमें निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह की तरह दो दरवाज़े नहीं कि हिन्दनामा में घुसे और निकल गये। जब तक गुमते नहीं, यहाँ तब तक रमते नहीं। यह रमता जोगी का उपदेश नहीं है। किसी वाइज़ की सलाह भी नहीं है। यह चिकित्सक का परामर्श नहीं है। किसी संत की वाणी भी नहीं है। लकीर का फ़कीर भी शामिल नहीं है इसमें, श्लोकों से गूँजता हुआ वैदिक काल है, रक्त से धुलता/मैला होता हुआ समय भी है। पसीना पौंछते- पौंछते आया हुआ पसीना है यह।

जो लिखकर मिटाता है
उसने सृष्टि के इस रहस्य को जान लिया

यह मौलवियों का तंज़ है?- नहीं
किसी कलाकार का रंज़ है? – नहीं
किसी साधु का मंत्र है? – नहीं
किसी वैद्य का तंत्र है? – नहीं
किसी भिक्षु का कासा है? – नहीं
किसी मुल्क को दिलासा है? – नहीं
धूर्त का षड़यंत्र है? – नहीं
क्या नया लोकतंत्र है? – नहीं
फिर बाबरनामा है? हुमायूंनामा है? शाहनामा है?
नहीं!!! यह हिन्दनामा है! जिसमें कविता का तरन्नुम है, गद्य का तबस्सुम है, श्लोकों का भ्रम है, शे’रों का वहम है। एक कटी-फटी तस्वीर है, बनती बिगड़ती तकदीर है। कहानियों का स्वाद है, दु:ख का आलेख है। इसमें आपके घर की सबसे नजदीकी शराब की दुकान मिल सकती है। इसमें आपके बग़ल में रखी हुई किसी किताब का ज़िक्र मिल सकता है। इसमें आपकी पढ़ी-रटी हुई किसी भी बात का खण्डन हो सकता है। इसमें जिसको आपने हीन-हेय माना, उसी का महिमामण्डन हो सकता है। किताब नहीं है भई, एक महादेश है जिसमें कुछ भी मिल सकता है। आपके घर का मटका भी और पड़ौसी द्वारा किया गया टोटका भी।

कोई मगध का था
कोई श्रावस्ती कोई अवन्ती
कोई मरकत -द्वीप का था
कोई आया उज्जयिनी से
कोई पाटलिपुत्र कोई अंग -देश
कोई दूर समरकंद से आया
कोई नहीं था भारत का
कोई नहीं आया भारत से
भारत कल्पना में एक देश था
एक मुसव्विर का ख़्वाब
एक कवि की कल्पना
किसी ध्रुपद -गायक की नाभि से उठा दीर्घ -आलाप
मैं एक काल्पनिक देश की
काल्पनिक कहानी लिखता हूँ!

हिन्दनामा क्या है? हिन्दनामा एक रेलगाड़ी है जिसमें बैठकर आप माज़ी और मुस्तकबिल दोनों वक़्तों को एक साथ हमसफ़र कर सकते हो। किताबों से निकलकर जिसकी मंशा फिर किताबों में लौट आने की हो वो इस यात्रा में शामिल हो सकता है। जो सुनहरे को स्याह रंग में देखने की ख़्वाहिश रखता है और स्याह को नये नूर में ढला हुआ देखना चाहता है, उसके लिए यह सफ़र मुफ़ीद नहीं है। यह एक शहर की दास्तान है जो गांव को तबाह कर के नहीं बना, यह एक गांव की बानगी है जो नगर क्या महानगरों तक घुस आयी । यह गुम्बदों से फिसलने का ब्यौरा है और सीढियों से उतरने का अफ़साना।

जितनी बार यह दुनिया भस्मसात् हुई
राख के ढेर में तब्दील हुई
उतनी बार
हमने अपना चिमटा वहीं गाड़़ा
और भस्मन् को भासमान किया

यह एक महादेश का मोमजामा है जो एक शम्स के लम्स से स्वाहा हो जाये और पूरी दुनिया जल जाये तो बच जाये। इससे पहले कि वक्त तुम्हे पी जाये, इस किताब को तुम गटक जाओ।

अमृत पान
मद्य पान
विष पान
रक्त पान
इस महादेश में
कई तरह के पेय प्रचलित थे
हर ग्राम नगर हाट बाज़ार में
पन शालाएँ थीं
देवता -दानव
सुर-असुर सभी ओक से पान करते थे
कालांतर में किसी कुम्भकार ने कोई कूजा बनाया
मिट्टी के सिकोरे का आविष्कार किया !

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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