ये जो मंगल मिसिर हैं, पसीने का प्यासा..

admin
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-कलीम अव्वल।।
मैं अभी फ़ज्र की नमाज़ के लिए वुज़ू कर रहा था कि मिसराइन का काल आ गया.
फून उठाया तो मिसराइन बिना भूमिका और बिना लोकाचार शुरू हो गयीं ; ” अरे तंजू बाबू जल्दी आवा, मिसिर पगला गयल बा. “
मैंने पूछा क्या हो गया # लेकिन उधर से फून कट गया था # लिहाजा मैं घबरा गया # और लगभग भागता हुआ मिसिर के घर पहुंचा # मैं पसीने में तर-ब-तर था.

मैंने देखा कि बगल में एक चाक़ू और कटोरा पड़ा था और मिसिर लंगोट बांधे दंड पेल रहे हैं और किसी क्रोधित अजगर की भांति फा फूं कर रहे हैं.

” अबे ये क्या पागलपन ? ऐसी सर्दी में ये नंगे बदन तू क्या कर रहा है, हड्डिया जकड जायेंगी, हृदयघात पड़ जाएगा, ख़त्म हो जाएगा.”

तभी मिसिर उठे और कटोरा और चाक़ू हस्तगत कर पवनगति से मेरी तरफ बढे. मैं घबरा गया और मैंने भागना चाहा लेकिन दहशत से मेरे पांव अंगद की तरह जम गए थे , उठ ही नहीं रहे थे। मैं ‘ जल तू जलाल तू ;आई बला को टाल तू ‘ के मन्त्र का जाप करने लगा .

मिसिर क़रीब आये.
मैं स्वगत बुदबुदाया ;’ बेटा कलीम तू तो गया काम से # तू कहां इस पागल के चक्कर में पड़ गया .”

मिसिर चाक़ू की धार से मेरा पसीना उतार कर कटोरे में एकत्रित करते हुए बोले ; ” तू क़त्तई मत घबराना # तुझे कोई नुक्सान नहीं पहुंचाऊंगा , मुझे तो पसीना चाहिए ; बस !”

” पर पसीने का तू करेगा क्या ?”

” ये सब तू मत पूछ, तू सरकारी स्कूल का आठवी फ़ैल ; ये बातें तेरी समझ में नहीं आयेंगी “

” तो भी ?”

” अरे यार ; ये मिसराइन साली काला-कलूटा बोलकर रोज़ ताने मार कर अपमानित करती है. अब मैं पसीने से अपने चेहरे की मालिश करके अपना चेहरा हेमा मालन के गालों सरीखा चमकाऊंगा फिर मिसराइन को उसके तानों का वो जवाब दूंगा कि वो भी याद रखेगी ” वाक्य प्रारम्भ करने से पहले मिसिर ने चारों तरफ देखकर अच्छी तरह मुआयना कर लिया था कि मिसराइन ‘श्रवण-क्षेत्र ‘ में नहीं हैं

मिसिर मेरा सारा पसीना उतार चुके थे . मैं अब आश्वस्त था, मैं सहज हुआ ; ” तो मैं अब चलूं “

” ठीक है # पर तू रोज़ इसी तरह दौड़ते हुए सुबह-सुबह आ जाना # महज़ पंद्रह दिनों की तो बात है . उसके बाद तो मैं चन्द्र-मुखी हो जाऊंगा कहते हुए मिसिर अपने शयन-कक्ष में अंतर्धान हो गए.

मैं बकलोलों की तरह मुंह बाए तिरस्कृत खड़ा था .

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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