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कश्मीरी पंडितों को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया..

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-अभिषेक श्रीवास्तव।।

कश्मीरी हिंदुओं/पंडितों के नुकसान को 1989 से गिनने वाले लोग सनातन धर्म की कश्मीरी धारा से कटे हुए मूर्ख शुतुरमुर्ग हैं। कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का ज़िक्र शैव/कौल परंपरा की विलुप्ति के बगैर अधूरा है। कश्मीरी हिंदुओं/पंडितों का सबसे ज्यादा नुकसान यदि किसी ने किया है तो वह है वेदों/उपनिषदों से अपनी वैचारिक से खुराक लेने वाला उत्तर का ब्राह्मणवाद। इसे थाेड़ा और व्यापक तरीके से कहना हो तो मैं कहूंगा कि भारतीय सभ्यता-संस्कृति के इतिहास में ब्राह्मणवाद ने जितना ज्यादा नुकसान कश्मीरी हिंदुओं/पंडितों की धार्मिक संस्कृति को पहुंचाया है, उतना सनातन धर्म के किसी भी पंथ को नहीं पहुंचाया।

सबसे पहले कर्मकाडी पंडों ने प्राचीनतम कश्मीरी शैव तंत्र को वामाचारी कह के बदनाम किया; उसके भीतर गुरु के महात्म्य की जगह ब्राह्मण को स्थापित किया; ‘शिव सूत्र’ जैसे पवित्र ग्रंथ को लोक से भुलवा दिया; कुलेश्वरी, कुब्जिका, काली और त्रिपुरसुंदरी की कापालिक परंपरा को अछूत बना दिया; और हठ योग के रास्ते नाथ−सिद्ध परम्परा तक आने वाली कौलतंत्र की धारा को सुखा डाला। इस तरह कश्मीरी हिंदुओं को बीते हजार साल में पहले वैष्णव बनाया गया। यह पहला सांस्कृतिक अन्याय था, जिसके बारे में कश्मीर के कथित सेकुलर जानकार जानते तक नहीं। जानते हों तो पॉलिटिकली करेक्ट रहने के लिए बोलते तक नहीं। अभिनव गुप्त का नाम तक ये भूल चुके हैं कश्मीरियत की रट लगाते लगाते।

फिर हुआ 19 जनवरी 1989 का कुख्यात कथित एग्जोडस यानी कश्मीरी पंडितों का पलायन। इस एक घटना ने वैष्णव पंथ में पहले से ही को-आप्ट किए जा चुके कश्मीरी पंडितों को हिंदुत्व की आधुनिक राजनीति का मोहरा बना दिया। अब बंद हो चुकी मालेगांव ब्लॉस्ट की फाइल में लगी चार्जशीट को देखिए तो पता चलेगा कि कैसे कश्मीरी हिंदुओं का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया था। इस मामले में पकड़े गए स्वामी दयानंद के लैपटॉप से जो कुछ बरामद हुआ था, वह बताता है कि कश्मीरी पंडितों के दुख-दर्द पर बुक्काफाड़ आंसू बहाने वालों ने कैसे उन्हें मूर्ख बनाया और आज भी बनाए जा रहे हैं।

सनातन धर्म की शक्तिपूजक धारा में दो हज़ार साल पुराने कश्मीरी कौल पंथ को पंडावाद चुपके से निगल गया लेकिन उस पर हमने कभी बात नहीं की। 1989 से वह एग्जोडस एग्जोडस रटने लगाऔर हम अचानक गिल्ट में आ गए। इतने गिल्ट में, कि अब भी खुलकर कश्मीरियत के सही सांस्कृतिक मायने जनता के सामने नहीं रख पा रहे जबकि कश्मीर को घुटते छह महीने होने जा रहे हैं। एक तरफ सनातन धर्म के दुश्मन शातिर पंडे हैं, तो दूसरी तरफ़ पॉलिटिकली करेक्ट रहने के दबाव में फॉर्मूलेबाज़ सेकुलर। हकीकत यह है कि कश्मीर के हिंदुओं से किसी को धेला भर मतलब नहीं। और कश्मीरी हिंदू? वे खुद अपने दुश्मन हैं- देश के बाकी हिंदुओं की तरह, जिनके लिए हिंदू होने का मतलब मुसलमान और पाकिस्तान के अनिवार्य अस्तित्व से बंधा है। किसी द्वीप पर अकेले में बिना मुसलमानों के छोड़ दिया जाए इन्हें, तो इनको समझ ही नहीं आएगा कि खुद को ये हिंदू क्यों कहें।

कभी मौका लगा तो इस पर विस्तार से लिखूंगा गोकि कश्मीरी पंडितों का जानकार मैं हूं नहीं, तो अभी लंबा नहीं खींचूंगा। ज्यादा जानकारी और दृष्टि के लिए अशाेक कुमार पांडे से सम्पर्क करें जिन्होंने कश्मीरी पंडितों पर एक ग्रंथ लिखा है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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