पत्रकारिता में पद्मश्रियों और राज्यसभा की सांसदी के कलुष..

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-राजीव मित्तल।।

बात को आगे बढ़ाने से पहले कुछ बताना चाहता हूं..जनसत्ता चंडीगढ़ में रहते संपादकीय में अनुज गुप्ता की आमद हुई..बंदा मध्यप्रदेश के नवभारत का दिल्ली संवाददाता रह कर आया था.. लेकिन ज़्यादा रुका नहीं और पुरानी जगह लौट गया..कुछ साल बाद मिला दिल्ली में बड़े ठाठ के साथ..चकाचक गाड़ी, वसुंधरा में अपना फ्लैट..पता चला कि भाई ने नवभारत के अपने किसी मालिक को राज्यसभा की सांसदी दिलवा दी थी..सब उसी का प्रताप था..

हिंदी के बर्बाद ए गुलिस्तां टाइप पत्रकार और संपादक आलोक मेहता ने तो छजलानी की नईदुनिया की पैंसठ साल की विरासत को दिल्ली में प्रमुख संपादक रहते पूरी तरह नीलाम कर दिया..हां एक कमाल जरूर किया कि छजलानी को पद्मश्री दिलवाई और हाथोहाथ खुद को भी दिलवा दी..बस राज्यसभा की सांसदी हथियाने में मात खा गए हालांकि उसकी तैयारी पूरी थी यहां तक कि मालिकों को इस्तीफा भी सौंप दिया था..लेकिन राष्ट्रपति महोदया की पांव छुआई वक्त पर दगा दे गई..

राज्यसभा की सांसदी के लिए तो प्रभाष जी भी बेहद लालायित रहे..नानाजी देशमुख से उम्मीद भी खूब बांधी लेकिन जब नहीं मिली तो बाबरी मस्जिद के ढहने पर जोशी जी कागद कारे में पिल पड़े भाजपा पर…

बाकी तो चंदन मित्रा, रजत शर्मा जैसे न जाने कितने पत्रकार राज्यसभा की सांसदी भोग रहे..यहां तक कि प्रभात खबर के बीस साल संपादक रहे संतों के संत पत्रकार हरिवंश ने सारे जातीय प्रपंच चला कर नीतीश कुमार को साध लिया और राज्यसभा के उपसभापति तक बन गए..

लेकिन इन सबसे ऊपर निकल गए कनपुरिया चप्पल फटकारते रहे कनपुरिया पत्रकार राजीव शुक्ला, जो कांग्रेस ही नहीं, हर पार्टी को साध कर तीस साल से सत्ता की च्युंगम चबा रहे हैं और सांसदी के साथ साथ क्रिकेट की प्रशासकी कर रहे हैं और एक चैनल ग्रुप के मालिक तो हैं ही..

दिल्ली में अमर उजाला में रहते कुछ महीने आश्रम स्थित ऑफिस में अपने समय के बड़े पत्रकार उदयन शर्मा की संगत में गुजरे..तब तक वो अपने अंतिम दौर में चल रहे तो उनके पास अपन की बकवास सुनने के लिए समय समय ही था, जिसका खूब लाभ उठाया और हिंदी पत्रकारिता की बजाने के लिए उनके मुंह पर ही उन्हें और अन्य शूरवीरों को जम कर कोसा..

वहीं रहते अमर उजाला के तीन चार रिपोर्टरों के पास विदेशी गाड़ियों का कबाड़ संस्करण भी देखने को मिला..पता चला कि वे सब कांग्रेसी नेता जनार्दन द्विवेदी की लटक थे और वे कारें उन्हीं की देन थीं..एक रिपोर्टर तो द्विवेदी जी के इतने करीब थे कि कुछ साल बाद पत्रकारिता कर्म को धता बता कर रेलवे बोर्ड के मेंबर बन खूब मजे कर रहे हैं..

पत्रकारिता के दो धुरंधरों राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी इंदौरी रहते शुरू से ही आपस में काफी जुड़े रहे..लेकिन दोनों का काम करने का तरीका बहुत अलग था..माथुर साहब के लिए पत्रकारिता मात्र एक कर्म थी और अपने साथ के लोगों से भी वो केवल अच्छे काम की अपेक्षा रखते थे, बदले में देने के लिए उनके पास कुछ नहीं था..जबकि प्रभाष जी की पत्रकारिता एक मिशन थी, तो उस मिशन में उनके आका रामनाथ गोयनका थे, जिनके वो अंधभक्त हनुमान थे और इसी भक्ति की अपेक्षा वो अपने भक्तों से करते थे..उनकी पत्रकारिता शिक्षित करने की नहीं दीक्षित करने की थी..जिसमें ब्राह्मण होना बहुत लाभकारी हुआ करता था..

जारी…

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