क्या कनेक्शन था देविंदर सिंह, अफ़ज़ल गुरु और संसद हमले  के बीच.?

क्या कनेक्शन था देविंदर सिंह, अफ़ज़ल गुरु और संसद हमले के बीच.?

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-सुरेंद्र ग्रोवर।।
आप चौंक जाएंगे रविवार को 4 आतंकवादियों के साथ धरे गए जम्मू कश्मीर के पुलिस उपाधीक्षक देविंदर सिंह का अफजल गुरु से कनेक्शन जानकर और सोच में पड़ जाएंगे कि 2001 में संसद पर हुए हमले में अफजल गुरु ने साज़िश रची थी या फिर वो महज एक कठपुतली था देविंदर सिंह की? और हाँ, देविंदर सिंह भी किसी और के हाथ की कठपुतली बन आतंकवाद फैलाने में लगा हुआ था, लेकिन पूरे सच की तह तक पहुँचने के लिए इस मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जाँच ज़रूरी है पर हो भी पाएगी यह आज के दौर में कत्तई मुमकिन नहीं लगता!
संसद पर हुए हमले के बाद भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने सुराग लगा अफ़ज़ल गुरु को गिरफ्तार कर लिया था। पूछताछ के दौरान अफ़ज़ल ने चौंकाने वाली जानकारी दी थी कि सन 2000 में देविंदर सिंह ने उसे कई दिनों तक एसटीएफ के कैम्प क़ैद कर भयंकर यातनाएँ दी थी फिर उसे अपना मुखबिर बना कर छोड़ दिया। उस पूछताछ में ही अफ़ज़ल गुरु ने बताया था कि देविंदर सिंह ने उसे सन 2001 में एक अंजाने आदमी मोहम्मद से मिलवाया और आदेश दिया था कि अफजल उसे अपने साथ दिल्ली लेकर जाए और वहाँ किसी होटल में कमरा दिलवा मोहम्मद के रहने का इंतज़ार करे।
लेकिन अफ़ज़ल गुरु,मोहम्मद से बातचीत करने पर उसकी भाषा से पहचान चुका था कि मोहम्मद भारतीय नागरिक नहीं है क्योंकि मोहम्मद टूटी फूटी कश्मीरी भाषा बोल रहा था। अफ़ज़ल ने इस पर देविंदर सिंह को चेताया साथ ही देविंदर सिंह के आदेश को पूरा करने में आनाकानी करने लगा। किंतु देविंदर सिंह ने अपने पुलिसिया रुतबे का उपयोग कर अफ़ज़ल गुरु को अपना आदेश मानने के लिए मजबूर कर दिया और वो मोहम्मद को लेकर दिल्ली चला आया।
गौरतलब है कि अफजल ने इस पूछताछ में यह भी बताया था कि जम्मू कश्मीर पुलिस के अधिकारी देविंदर सिंह और मोहम्मद अक्सर उसे फोन कॉल किया करते थे, इसकी कॉल डिटेल्स निकलवा क्रॉस चेक किया जा सकता है।
लेकिन ताज़्ज़ुब इस बात का है कि सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों ने अफज़ल गुरु के इन बयानों पर कोई कार्रवाई करना उचित नहीं समझा जिसके चलते मोहरा तो 2013 में फाँसी पर चढ़ा दिया गया और चाल चलने वाला देविंदर सिंह 2019 में राष्ट्रपति द्वारा गैलेंट्री सम्मान से नवाजा गया।
यहाँ, सवाल यह भी है कि सुरक्षा एजेंसियों ने अफजल गुरु से आगे ले जाने वाले सुरागों पर आगे बढ़ने पर काम क्यों नहीं किया और संसद हमले की बिसात बिछाने वाले मुख्य साज़िश करने वाले तक पहुँचने की जहमत क्यों नहीं उठाई?
यदि रविवार को देविंदर सिंह आतंकियों के साथ धरा न जाता तो देश की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बरती गई इतनी बड़ी लापरवाही, जो किसी प्रभावशाली व्यक्ति की साज़िश भी हो सकती है, सामने ही नहीं आती।

तो आइए इसे इस तरह समझते हैं कि 2001 के सितम्बर खत्म होने तक संघ के प्रचारक बतौर नरेंद्र मोदी काश्मीर में तैनात थे। ध्यान रहे कि उस वक़्त नरेंद्र मोदी, लालकृष्ण आडवाणी के खासम खास हुआ करते थे जबकि अटल बिहारी वाजपेयी को फूटी आँख नहीं सुहाते थे लेकिन आडवाणी ने जिद कर मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनवा दिया। यहाँ, यह भी देखना होगा कश्मीर में प्रचारक रहते मोदी कोई चुप तो बैठे नहीं रहे होंगे। नरेंद्र मोदी ने वहाँ अपना नेटवर्क तो खड़ा किया ही होगा और उसमें स्थानीय नागरिकों के अलावा वहाँ के प्रशासन में बैठे लोग भी थे।

संसद पर हुए हमले के बाद खबरें उड़ी थी कि उस वक़्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनाव जीतने के लिए संसद पर हमला करवाया था लेकिन यह कोई नहीं बता सका कि इस हमले को कार्यरूप किसने दिया जबकि वाजपेयी का कोई खास बन्दा कश्मीर में था ही नहीं। हाँ, आडवाणी जी का बन्दा कश्मीर में अपनी जड़ें जमाकर ज़रूर आया था। इससे सीधा सीधा निष्कर्ष निकलता है कि अटल बिहारी वाजपेयी पर संसद पर हमला करवाने की साज़िश रचने का आरोप बेमानी था।

तो क्या आडवाणी ने वाजपेयी से प्रधानमंत्री पद हथियाने की साज़िश रची थी?

तो क्या नरेंद्र मोदी को लालकृष्ण आडवाणी ने किसी सौदे के तहत गुजरात का मुख्यमंत्री बनवाया था?

तो क्या नरेंद्र मोदी के सीने में लालकृष्ण आडवाणी का कोई बड़ा राज दफन है कि उसकी कीमत बतौर 2014 में आडवाणी को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी नरेंद्र मोदी के लिए छोड़नी पड़ी?

तो क्या 2019 में देविंदर सिंह को मिला राष्ट्रपति सम्मान भी किसी काम के बदले कोई इनाम था?

एक एक कड़ी जोड़ते जाईये, संसद पर हमले का सच खुद ब खुद आपकी नज़रों के सामने तैरने लगेगा!

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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