और दीपिका पादुकोण मुसलमान घोषित हो गई..

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-विष्णु नागर।।

कल घूमने में देर हो गई थी और मुझे यह ताजा खबर मालूम नहीं थी कि दीपिका पादुकोण जेएनयू गई है, वहाँ की छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष के पास यह कहने कि मुझे तुम पर गर्व है।मेरे आगे एक प्रेमी- प्रेमिका थे।उन दोनों को यह बात पता रही होगी।उस लड़की ने दीपिका का नाम लिया। उसके प्रेमी ने व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी चला दी फौरन।कहा-‘दीपिका पादुकोण मुसलमान है’।फिर उसने फिल्मी दुनिया के और भी सितारों के नाम लिए,जो धर्म से या नाम से मुसलमान हैं।

वह लड़की भी इतनी बोदी थी कि उसने इस पर आश्चर्य जरूर प्रकट किया मगर अच्छा कहकर चुप हो गई।मुझे संदर्भ मालूम नहीं था,मैं भी चुप रहा।वैसे भी पार्क में कई संघी बूढ़े रोज बकवास करते रहते हैं-जो उनका अधिकार है-मैं चुपचाप सुनता हूँ और निकल जाता हूँ।कोई फायदा तो है नहीं,उन्हें सच बताने का।एक बुजुर्ग कभी- कभी उनसे भिड़ता है तो उसे पागल समझकर उसकी बात पर ये चुप लगा जाते हैं।वह भी ऊबकर उठ जाता है और फिर वही संघी बकवास शुरू हो जाती है।वैसे भी प्रेमी-प्रेमिका के मामले में हम करें भी क्या?वे जानें, उनका काम जाने,उनका ज्ञान जाने!

खैर दीपिका मुसलमान है या हिंदू है या नास्तिक है,इससे फर्क नहीं पड़ता।वह एक बड़ी फिल्मी स्टार है और उसकी जब एक फिल्म रिलीज हो रही है,तब उसका जेएनयू जाना केवल फिल्मी टोटका नहीं हो सकता।वह इससे कुछ अधिक है और साहसिक इस मायने में है कि उसकी फिल्मों का बजट कई-
कई करोड़ों में होता है और आज के माहौल में संघी उत्पाती उसकी फिल्म को पिटवाने के लिए गुंडागर्दी से लेकर सरकारी मशीनरी तक का इस्तेमाल कर सकते हैं,जो वे करेंगे ही।शुरू भी हो गया होगा यह अभियान।

लेकिन अगर आप पोजीशन लेने की छोटी सी भी कोशिश करते हैं तो आपके साथ क्या- क्या हो सकता है,इसका उदाहरण जेएनयू, एएमयू, समेत तमाम विश्वविद्यालय के छात्र छात्राएँ तो हैं ही,दीपिका भी है। एक छोटी सी कोशिश आपके बारे में सफेद झूठ फैलाने की भी हो सकती है।

ऐसा नहीं है कि उन प्रेमीजी को तुरंत संघ कार्यालय से फोन आया होगा या संदेश मिला होगा मगर संघी प्रेमी का प्रशिक्षण ही इस तरह का हुआ है कि तुरंत उसने दीपिका का धर्मांतरण कर दिया, जो पूरी तरह संघी षड़यंत्र के अनुरूप है।और कोई संघी प्रेमी या प्रेमिका भी हो ही सकते हैं! और आत्मलिप्त युवा इतने बोदे भी हो सकते हैं और इतने संघी भी कि किसी को मुसलमान कह देना उसके अविश्वसनीय होने का स्वतः प्रमाण बन जाए!

यह किया है इन्होंने हमारे देश के साथ पिछले साढ़े पाँच साल में तेजी से मगर अब इससे युवाओं का बड़ा तबका उकताकर तन कर खड़ा हो रहा है,यह शुभ है।और न जाने कितने फिल्मी दुनिया के लोग खड़े हो रहे हैं,यह बड़ी बात है।उस दिशा में एक झिझकता हुआ छोटा सा कदम दीपिका का भी है,इसका स्वागत है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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