जेएनयू की रिपोर्टिंग से जो तथ्य गायब हैं, और क्यों.?

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-संजय कुमार सिंह।।

आज के ज्यादातर अखबारों में जेएनयू में नकाबपोश गुंडों का हमला – लीड खबर है। भिन्न अखबारों ने इसे अलग ढंग से पेश किया है पर सबसे खास बात यह है कि दिल्ली पुलिस कैम्पस में अनुमति नहीं मिलने तक नहीं घुसी और गुंडे लोगों पर बर्बर हमला करते रहे। शीर्षक में यह तथ्य कैसे आया है, देखना दिलचस्प है। इसके अलावा यह भी बताया जाना चाहिए था कि नकाबपोश अपराधी पकड़े गए या नहीं, क्यों नहीं पकड़े गए या पकड़े गए तो कौन हैं। अखबारों की खबरें इन मुद्दों पर शांत हैं। मैं जो अखबार देखता हूं उनमें सिर्फ राजस्थान पत्रिका में यह खबर लीड नहीं है। यहां यह खबर लीड के साथ दो कॉलम में टॉप पर है। फ्लैग शीर्षक है, “गुंडागर्दी : 20 छात्र एम्स में भर्ती”। शीर्षक में छात्रसंघ अध्यक्ष बुरी तरह घायल बताने के साथ उपशीर्षक है, अमित शाह ने कमिश्नर से बात की। घटना की जो खबर पहले पन्ने पर है उसमें यह नहीं बताया गया है कि हमले के वक्त पुलिस कहां थी, थी या नहीं और उसने क्या कार्रवाई की, हमलावर पकड़े जा सके या नहीं आदि आदि। पर यह जरूर बताया है कि घटना के बाद पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।

हमले में घायलों की अधिकतम संख्या नवोदय टाइम्स ने 36 बताई है। दैनिक जागरण ने 15 की हालत गंभीर लिखा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि देश की राजधानी में गेट वाले एक सुरक्षित शैक्षिक परिसर में अगर नकाबपोश हमलावर घुसकर 36 लोगों को घायल कर सकते हैं (अगर वाकई दो गुटों का झगड़ा हो और दोनों गुट के लोग घायल हों, तब भी) तो पुलिस किस मर्ज की दवा है। और अगर यह ला-इलाज ही है तो इसका जिक्र खबर में क्यों नहीं होगा और होगा तो यह बताने के लिए कि पुलिस ने मार्च किया। एक गेट वाले कैम्पस में फ्लैग मार्च का मतलब समझिए और अगर यह बाहर हुआ तो क्या खबर है? जब यह बताया ही नहीं गया है कि पुलिस ने अपने काम का कौन सा हिस्सा पूरा किया या कौन सी जिम्मेदारी निभाई तो फ्लैग मार्च किया यह सूचना किस काम की?

नवोदय टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, जंग का मैदान बना जेएनयू। उपशीर्षक में यह भी लिखा है कि तलवारें चलीं। अगर ऐसा है तो हमलावरों की तरफ से भी कोई घायल हुआ होगा और उसका पहचान हो जाती। पर दूसरे अखबारों की खबरों से ऐसा नहीं लगता है। बाकी अखबारों की खबरों से भी यही लगता है कि नकाबपोश हमलावरों ने कैम्पस में उत्पात मचाया है। इस लिहाज से नवोदय टाइम्स का शीर्षक भी गलत है। कई अखबारों की खबरों से ऐसा नहीं लगता है कि जेएनयू में जंग हुआ बल्कि नकाबपोशों का हमला ही था और बचाव में भी कोई हमलावर घायल हुआ होता तो पता चल जाता कि नकाबपोश हमलावर कौन थे। पर यह बताया नहीं गया है या छिपाया गया है। पुलिस ने न बताया हो पर अखबारों ने जानने की कोशिश की ऐसा भी नहीं लगता है।

सूचना के लिहाज से अमर उजाला की खबर काफी उदार है। अखबार ने नकाबपोश हमलावरों की संख्या 40-50 बताई है जबकि नभाटा में यह करीब 200 है। अमर उजाला ने शीर्षक में यह भी बताया है कि छात्रसंघ अध्यक्ष के साथ महिला प्रोफेसर का सर फूटा। अखबार ने 22 छात्रों के एम्स ट्रॉमा सेंटर में खबर होने की सूचना उपशीर्षक में दी है और यह भी बताया है कि देर रात पुलिस मुख्यालय के बाहर छात्रों का प्रदर्शन हुआ। अमर उजाला ने लिखा है कि चार घंटे तक चला बवाल और पुलिस को नहीं मिली एंट्री। टेलीविजन चैनल कल रात बता रहे थे कि वाइस चांसलर कहीं नहीं हैं। ट्वीटर पर भी नहीं। ऐसे में प्रवेश नहीं मिलने और दिल्ली पुलिस का जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की तरह जबरन नहीं घुसना और लाइब्रेरी में तोड़फोड़ नहीं करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है जो अखबार ने नहीं लिखा है। पुलिस के धैर्य की तारीफ की जानी चाहिए कि वह गेट पर खड़ी रही। अमर उजाला की खबर से ऐसा ही लगता है। हालांकि, अखबार ने यह भी छापा है कि छात्रों ने कुलपति से इस्तीफा मांगा। अखबार में और भी सूचनाएं हैं। और भरपूर हैं। लेकिन दिल्ली पुलिस की भूमिका पर कुछ खास नहीं है। यही कि मुख्य गेट के बाहर खड़ी रही और नौ बजे कैम्पस में आने की अनुमति मिली।

दैनिक जागरण में यह खबर सात कॉलम में टॉप पर है लेकिन लीड नहीं। अखबार का मुख्य शीर्षक है, जेएनयू में छात्रों और शिक्षकों पर हमला, जमकर तोड़फोड़। उपशीर्षक है, 25 घायल, हॉकी और डंडों से लैस थे नकाबपोश हमलावर, विश्वविद्यालय परिसर में संपत्ति को पहुंचाया नुकसान। जागरण ने एक और खबर छापी है, पंजीकरण में बाधा डाल रहे थे : दुर्गेश। इसके मुताबिक, एबीवीपी की जेएनयू ईकाई के अध्यक्ष दुर्गेश कुमार ने कहा कि रविवार को उन छात्रों के लिए पंजीकरण का आखिरी दिन था, जो मानसून सेमेस्टर की दिसंबर में परीक्षा नहीं दे पाए थे। साथ ही जनवरी से शुरू होने वाले विन्टर सेमेस्टर के लिए भी पांच जनवरी तक पंजीकरण कराने की तिथि तय की गई थी, लेकिन दो-तीन दिन से वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्रों ने पंजीकरण को बाधित किया। शनिवार रात पंजीकरण कार्यालय, संचार व सूचना सेवा कार्यालय में इंटरनेट सेवा ठप कर दिया। इसके कारण रविवार को कोई पंजीकरण नहीं हो सका। अपराह्न् तीन बजे एबीवीपी से जुड़े छात्र प्रशासनिक भवन के पास स्वामी विवेकानंद प्रतिमा पर जमा हुए और पंजीकरण व्यवस्था को शुरू करने की कोशिश कर रहे थे कि वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्रों ने हम पर हमला कर दिया। यहां मौजूद सुरक्षा कर्मियों को पीटा गया। अभाविप के इस पक्ष को अखबारों में आमतौर पर प्रमुखता नहीं मिली है। और जागरण ने यह नहीं बताया कि अभाविप ने किसी से कोई शिकायत की थी या नहीं। और इस सामान्य से विवाद में नकाबपोश कहां से कैसे आ गए और कौन थे। पकड़े गए कि नहीं आदि।

नवभारत टाइम्स ने इस खबर को लीड बनाया है और शीर्षक है, जेएनयू में नकाबपोशों ने छात्रों और शिक्षकों को बेरहमी से पीटा। पिटाई तो बेरहमी से ही होती है, प्यार से पीटा भी तभी लिखा जाएगा जब पुलिस को बाहर रखकर अच्छी पिटाई कर दी जाए। कोई पकड़ा न जाए। उपशीर्षक में अखबार ने एक नई बात बताई है – मदद के लिए 90 से ज्यादा पीसीआर कॉल्स। इसके बाद तो आपको दिल्ली पुलिस की कर्तव्यपरायणता की तारीफ करनी ही पड़ेगी कि वह गेट पर अनुमति मिलने का इंतजार करती रही और जबरदस्ती अंदर नहीं गई और जामिया मिलिया की तरह पीटने (या बचाने) के लिए बिना वर्दी वाले पुलिसियों का भी इस्तेमाल नहीं किया। अखबार ने लिखा है, करीब 200 हमलावरों ने साबरमती हॉस्टल समेत कई बिल्डिंग में जमकर तोड़फोड़ की। रजिस्ट्रार की सलाह पर स्टूडेंट्स ने कई बार 100 नंबर डायल किया। …. छात्रों का आरोप है कि कई कॉल करने के बावजूद पुलिस देरी से पहुंची और हिंसा रोकने के बजाय चुप रही।

दैनिक हिन्दुस्तान में इस लीड खबर का डिसप्ले छह कॉलम में सबसे अच्छा है पर तथ्य के नाम पर यह खबर पूरी तरह लचर और सामान्य सूचनाओं से युक्त है। किसी भी अखबार ने प्रमुखता से यह नहीं बताया कि हमलावर पकड़े गए या नहीं पकड़े गए। कल हमले के बाद सबसे पहले जो फोटो टीवी पर दिखी या सोशल मीडिया पर वायरल हुई। कुछ लोग इनकी पहचान भी बता रहे हैं। पर लगभग चार घंटे तक परिसर में उधम मचाने वाले इन तीन लोगों में से कोई एक और एक भी हमलावर का नहीं पकड़ा जाना या उनके पकड़े जाने या नहीं पकड़े जाने की चर्चा अखबार में नहीं होना बताता है कि कैसी नालायक रिपोर्टिंग हो रही है। अगर यह विवाद शाम में शुरू हुआ और रात नौ बजे के आसपास कैम्पस में पुलिस घुसी, मार्च पास्ट हो गया तो दैनिक अखबारों में रिपोर्टिंग के लिहाज से आदर्श टाइम है। पूरी प्लानिंग की जा सकती थी और सबसे बात करके या बात करने की कोशिश करके लिखा जा सकता था कि अपराधी पकड़े गए या नहीं और नहीं पकड़े गए तो क्यों। लेकिन इस महत्वपूर्ण मामले में चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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