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घमंडी रघु शर्मा को महंगी पड़ेगी असामयिक मौतें..

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-सुरेन्द्र ग्रोवर||

एकतरफ कोटा के जेके लोन अस्पताल में नवजात और दुधमुंहे बच्चों की मौतों का  सिलसिला अभी थमा नहीं है तो दूसरी तरफ, बाड़मेर से भी कुछ ऐसी ही खबरें सामने आ रही हैं. उधर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर के संपूर्णानंद अस्पताल के बच्चों के वार्ड में लम्बे समय से एक सौ पचास बच्चे हर महीने मौत के घाट उतर जाने की खबरों ने रूह कंपकंपा दी है. लेकिन ना तो राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलोत और ना ही चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा के चेहरे पर शर्मिंदगी नाम की कोई चीज नज़र आ रही है. हाँ, राज्य के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने ज़रूर बच्चों की इन असामयिक मौतों के प्रति ज़वाबदेही तय करने की बात कही है, लेकिन वह भी इतने दिन बाद. जबकि राज्य के उप मुख्यमंत्री होने के नाते जवाबदेही उनकी भी तो बनती है.

दरअसल राज्य का चिकित्सा मंत्रालय ही एक बेहद असंवेदनशील और स्वभाव से घमंडी राजनेता रघु शर्मा के हाथों में होने के चलते, राजस्थान की जर्जर चिकित्सा व्यवस्था नज़रअंदाज़ होती रही है. खबर है कि रघु शर्मा का अधिकांश वक़्त अपने मंत्रालय के कामकाज की बजाय खुद की राजनति चमकाने में व्यतीत हो जाता है.

गौरतलब है कि रघु शर्मा पहली बार चुनाव लड़ने से लेकर तीसरी बार तक लगातार तक हारने के बाद चौथी बार जाकर सचिन पायलट की मेहरबानी से विधयक, फिर साँसद और फिर से विधायक का चुनाव जीत पाए और इस बार वे मंत्री पद के लालच में सचिन पायलट का खेमा छोड़ अशोक गहलोत के पाले में चले गए. स्वाभाविक है कि इससे सचिन पायलट रघु शर्मा से खासे  नाराज हैं. इसके चलते रघु खुद को अपने चुनाव क्षेत्र केकड़ी में बेहद असुरक्षित महसूस करते हैं और इसलिए उनका अधिकांश समय अपने राजनैतिक अखाड़े के स्थानीय पहलवानों को खुश रखने में गुजर जाता है.

सरकारी अस्पतालों की जर्ज़र अव्यवस्थाओं और वहां व्याप्त भ्रष्टाचार के शिकार हुए इन बच्चों की मौत के जिम्मेदार रघु शर्मा भूल गए कि अशोक गहलोत एक घाघ राजनेता हैं और वे अपने कंधे पर फालतू की किसी बदनामी का बोझ लेकर चलने की बजाय उनके कन्धों पर ऐसा बोझ लड़ने वाले को ही दूर झटक देते हैं. यह अब मंत्री पद के घमंड में चूर रघु शर्मा को भी जल्द ही देखने को मिलेगा. अगले महीने राजस्थान मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित विस्तार होने वाला है और इस विस्तार के समय रघु शर्मा के हाथों से चिकित्सा मंत्री का पद छीन जाना तय है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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