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गहलोत सरकार, भ्रष्टाचार की शिकार और नवजात बच्चों पर मौत की मार..

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-सुरेन्द्र ग्रोवर||

कभी संवेदनशील प्रशासन देने का वायदा करने वाले  अशोक गहलोत तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य की चिकित्सा व्यवस्था ही नहीं बल्कि छोटे छोटे बच्चों के लिए भी कितने संवेदनहीन साबित हो रहे हैं कि कोटा के जेके लोन अस्पताल में सिर्फ एक महीने में 103 बच्चों के काल का ग्रास बन जाने पर भी महज़ दो सौ किलोमीटर दूर कोटा स्थित इस अस्पताल का दौरा करने की बजाए जयपुर से साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर अपने गृह जिले और चुनाव क्षेत्र जोधपुर पहुँच उद्घाटनों में मशगूल हो गए.  

गौरतलब है कि राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था शुरू से रामभरोसे चल रही है. अधिकांश सरकारी अस्पताल खुद मृत्युशैया पर पड़े सिसक रहे है. बच्चों के लिए बने जयपुर और कोटा इत्यादि के अस्पताल भारी अव्यवस्थाओं और लालफीताशाही के शिकार हैं. एक एक बिस्तर पर दो से तीन बच्चों का इलाज होना आम बात है.  यहाँ तक कि कई बार तो गंभीर रूप से बीमार दुधमुंहे  बच्चों को आले में लिटा कर इलाज किया जाता है. अस्पतालों के उपकरण अक्सर दम तोड़े पड़े रहते हैं. इन उपकरणों को फिर से दुरुस्त करने में महीनों लग जाते हैं, क्योंकि यह एक लम्बी प्रक्रिया होती है. पहले फण्ड माँगा जायेगा, फिर टेंडर निकलेगा, टेंडर पास होगा और उसके बाद ही उपकरणों कि मरम्मत हो पाती है और इसके चलते कई गम्भीर बीमार सही इलाज के अभाव में दम  तोड़ देते हैं.  

याद रहे इन सरकारी अस्पतालों में सिर्फ गरीब लोग ही जाने को विवश होते है. साधन सम्पन्न लोग तो कभी इन अस्पतालों का रुख ही नहीं करते. हाँ, कुछ रसूखदार लोग ज़रूर इन अस्पतालों में वीवीआईपी की तरह मुफ्त इलाज करवाने पहुँचते रहते हैं और अस्पताल प्रशासन भी ऐसे लोगों की तीमारदारी में अपनी पूरी ताकत झोंक देता है.  

हमने कोटा जेके लोन अस्पताल में पिछले दिनों में हुई 103 बच्चों की मौत के कारण जानने के लिए कोटा शहर के कुछ नागरिकों से बात की तो यही कहानी सामने आई. कोटा निवासी और राजस्थान के पूर्व शिवसेना प्रमुख प्रमोद चतुर्वेदी ने बताया कि कुछ समय पहले अपने बच्चे के बीमार पड़ने पर जेके लोन अस्पताल में ले गए थे लेकिन उनके बच्चे का इलाज तब तक शुरू नहीं हुआ, जबतक उन्होंने अपने राजनैतिक प्रभाव का उपयोग नहीं किया.  

 इसी तरह कोटा के एक पत्रकार ब्रिजेश विजयवर्गीय का कहना था कि जेके लोन भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं का अड्डा बना हुआ है. इस अस्पताल के जीवन रक्षक उपकरण अक्सर ख़राब रहते हैं और उनके सुधरने में महीनों लग जाते हैं और सुधारने की प्रक्रिया में भी भारी भ्रष्टाचार होता है. यदि इसकी शिकायत भी की जाती है तो कोई सुनवाई नहीं होती. यहाँ तक कि खबरें लिखने का भी कोई असर नहीं होता.  

जब हमने इस मुद्दे पर बात करने के लिए राजस्थान के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा को फोन किया तो उनके सचिव मनोज पारीक ने कहा कि मंत्री जी मीटिंग में हैं, इसलिए कुछ देर में कॉल बेक करवाता हूँ. लम्बे समय तक इंतजार के बाद हमने दोबारा फोन किया तो भी मनोज पारीक ने ही रघु शर्मा का मोबाईल फोन उठाया और फिर वही रट्टा पढ़ दिया. इसके बाद हमने उन्हें देर रात एसएमएस किया  लेकिन रघु शर्मा हमसे बात करने से बचते रहे. 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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