टुकड़े-टुकड़े गैंग का पूरा सच..

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-संजय कुमार सिंह||
टुकड़े-टुकड़े गैंग फिर खबरों में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में दिल्ली के कड़कड़डूमा में डीडीए के ईस्ट दिल्ली हब के उद्घाटन समारोह में कहा, ‘दिल्ली की टुकड़े-टुकड़े गैंग को सबक सीखाया जाना चाहिए।’ एएनआई के एक ट्वीट के अनुसार अमित शाह ने कहा, “कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में टुकड़े-टुकड़े गैंग जो दिल्ली के अशांति के लिए जिम्मेदार है, इसको दंड देने का समय आ दया है। दिल्ली की जनता ने दंड देना चाहिए।” कहने की जरूरत नहीं है कि निशाना दिल्ली चुनाव है इसीलिए इस राष्ट्रीय मुद्दे को अब स्थानीय स्तर पर उठाया जा रहा है और इसमें कांग्रेस को भी लपेटा जा रहा है।
इस क्रम में दिल्ली आरपी सिंह के नाम से प्रकाशित एक विज्ञापन में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के नाम एक खुला पत्र प्रकाशित हुआ है। इसमें कहा गया है, मैं भारत के एक नागरिक के नाते आप से यह अपेक्षा करता हूं (कि) क्या आप जाते-जाते टुकड़े-टुकड़े गैंग की फाइल पर साइन कर देंगे और यह अपेक्षा इसलिए करता हूं क्योंकि आपको दिल्ली ने अन्ना हजारे जी की राष्ट्रवाद की छाप के चलते मुख्यमंत्री बनाया था। मेरा आपसे यह निवेदन है कि इस राष्ट्रहित के विषय को राजनीति से ऊपर उठकर देखें। ….. केजरीवाल जी आप चाहें सिटिजन अमेंडमेंट बिल पर वोट बैंक की राजनीति के चलते विरोध करें पर टुकड़े-टुकड़े गैंग की फाइल रोक कर आप देश का बहुत बड़ा अहित करेंगे।
आरपी सिंह की भाजपा से करीबी जग जाहिर है पर यह विज्ञापन एक नागरिक की हैसियत से हैं। यह छिपाया नहीं गया है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार का कार्यकाल पूरा होने को है (और चुनाव होने हैं)। इसलिए समझा जा सकता है कि यह एक नागरिक द्वारा आम आदमी पार्टी को ”इस राष्ट्रहित के विषय की राजनीति” में फंसाने की कोशिश चल रही है। इस मामले के तथ्य ऐसे हैं जिससे पता चलता है कि इसमें दम नहीं है और यह गढ़ी हुई कहानी है। चूंकि राष्ट्रवादियों द्वारा पसंद की गई है इसलिए इसे फिर से भुनाने की कोशिश की जा रही है। अमित शाह और आरपी सिंह की भाषा से यह स्पष्ट है।
इस मामले में दिल्ली पुलिस ने चार्ज शीट लोकसभा चुनाव से पहले और घटना के तीन साल बाद दायर की। तब पता चला कि इसके लिए दिल्ली सरकार की अनुमति जरूरी है और ली ही नहीं गई। अगर अनुमति जरूरी थी तो चार्जशीट बगैर अनुमति बननी ही नहीं चाहिए थी और अगर बननी भी थी तो कार्यव्यवहार होता कि अनुमति मांगी जाती या उसके लिए औपचारिक आवेदन करके चार्जशीट बनाने की तैयारी की जाती। पर यह सब नहीं हुआ और क्यों नहीं हुआ यह समझना मुश्किल नहीं है। अब दिल्ली सरकार पर अनुमति देने के लिए राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है और दिल्ली सरकार कह चुकी है कि दिल्ली पुलिस को चार्जशीट दायर करने में तीन साल लगे तो उसे भी मामले को समझने में समय लगेगा।
इस तरह, दिल्ली सरकार टुकड़े-टुकड़े गैंग के खिलाफ अनुमति दे तो “कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में” चलने वाले गैंग का नुकसान कांग्रेस को होगा और नहीं दे तो आम आदमी पार्टी पर भी इस गैंग को संरक्षण देने का आरोप लगाया जा सकेगा। और यह गैंग भी हवा में, हवा जैसा ही है। आप जानते ही हैं कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक आंदोलन में लगे कथित देश विरोधी नारों को लेकर एक हवाई टुकड़े-टुकड़े गैंग बनाया गया जिसपर देश के टुकड़ें होंगे जैसे नारे लगाने का आरोप लगा और इसका वीडियो भी एक टेलीविजन चैनल पर चल गया। इस वीडियो के फर्जी होने से लेकर इसका संपादन कहां हुआ तक सब कुछ अखबारों में छप चुका है और सार्वजनिक है। फिर भी मीडिया इसपर चुप है और सरकार इसका लाभ उठा रही है।
आपको याद होगा 2016 में जब यह घटना हुई थी तभी इस आशय की खबरें छपी थीं। जेएनयू में नौ फरवरी 2016 को देशद्रोही नारेबाजी के आरोपी कन्हैया कुमार से जुड़े सात में से दो वीडियो फर्जी पाया गया है। दिल्ली सरकार ने 13 फरवरी को जेएनयू घटना की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए थे। इस जांच के दौरान सरकार ने सात वीडियो को जांच के लिए हैदराबाद की ट्रुथ लैब में भेजा था। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक दिल्ली सरकार को ट्रुथ लैब की ओर से सौंपी गई फाइनल सप्लीमेंट्री रिपोर्ट में कहा गया है कि उसे सौंपे गए सात में दो वीडियो पूरी तरह फर्जी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इन वीडियो की जांच करने पर पता चलता है कि इनके ऑडियो और विजुअल आपस में मेल नहीं खाते हैं। यानी वीडियो में नारा लगाने की आवाजें अलग से जोड़ी गयीं हैं।
आपको याद होगा कि नारों में एक नारा था, हमे चाहिए आजादी और इसे भी देशद्रोही नारा बना दिया गया था। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि आजादी देश और देश के हुक्मरानों से नहीं, गरीबी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार से मांगी जा रही थी जो देशद्रोह नहीं है। वीडियो में कुछ नारे फर्जी हैं और बाहर से जोड़े गए हैं। कायदे से मुकदमा टीवी चैनल पर चलना चाहिए कि उसने फर्जी वीडियो दिखाया पर उसकी कोई बात ही नहीं है क्योंकि चैनल सरकारी भोंपू बना हुआ है और उसके संपादक सरकार लाड़ले हैं। नारों के संबंध में इंडियन एक्सप्रेस ने भी कुछ सूत्रों के हवाले से कहा है कि फॉरेंसिक जांच में किसी भी वीडियो में कन्हैया कुमार को नारे लगाते हुए नहीं देखा गया है। जांच के दौरान किसी भी वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ जैसा नारा नहीं है।
दिल्ली पुलिस ने भी हाईकोर्ट से कहा था कि कन्हैया कुमार किसी भी वीडियो में नारेबाजी करते नहीं पाए गए हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध खबरों के अनुसार, दिल्ली सरकार के आदेश पर जेएनयू के विवादास्पद कार्यक्रम के वीडियो क्लिपिंग की फारेसिंक जांच से पता चला था कि दो वीडियो का संपादन किया गया था जो व्यक्ति मौजूद नहीं था, उनकी आवाज जोड़ी गई थी। इस संबंध में आरोप था कि मौके पर मौजूद बाहरी लोगों द्वारा भारत विरोधी नारेबाजी की थी और इसका एक वीडियो सामने आने के बाद मामला और उलझ गया था। लंबी जांच या लंबे अंतराल के बाद दाखिल चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने छह मोबाइल फोन से मिली वीडियो फुटेज का जिक्र किया है। इनमें से तीन मोबाइल फोन एबीवीपी से जुड़े छात्रों और एक पुलिसकर्मी का है। इसके अलावा पुलिस ने एक चैनल और उसकी डिबेट का वीडियो फुटेज भी सबूत के तौर पर दिया है।
दूसरी ओर, दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फेंस कर एबीवीपी की जेएनयू इकाई के पूर्व उपाध्यक्ष जतिन गोराया और पूर्व संयुक्त सचिव प्रदीप नरवाल दावा कर चुके हैं कि एक न्यूज चैनल द्वारा जारी वीडियो में जेएनयू में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाते दिख रहे छात्र एबीवीपी के सदस्य थे या संगठन से सहानुभूति रखने वाले छात्र थे। दोनों छात्र नेताओं ने दावा किया है वह अपने इस बयान पर अडिग हैं। इसी मामले में जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत 10 लोगों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया है। एबीवीपी की जेएनयू इकाई के पूर्व उपाध्यक्ष जतिन गोराया ने साफ तौर पर कहा कि जी न्यूज के डीएनए प्रोग्राम में दिखाए जा रहे चार वीडियो में से आखिरी वाले वीडियो में जितने लोग ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाते दिखाई दे रहे हैं, वे सभी एबीवीपी से जुड़े हैं।
इस वीडियो को लैब की जांच में सहीं पाया गया है पर जी न्यूज को शायद नहीं पता है कि उस वीडियो में जो लोग नारे लगा रहे हैं वे एबीवीपी के लोग हैं। उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे पर एबीवीपी के पदाधिकारियों से कभी भी बहस के लिए तैयार हैं। वहीं, जेएनयू में एबीवीपी के पूर्व संयुक्त सचिव प्रदीप नरवाल ने कहा कि देश विरोधी नारेबाजी का जो वीडियो जी न्यूज ने दिखाया है, उसमें छेड़छाड़ की गई है। नरवाल ने कहा, “जब जी न्यूज और पुलिस का दावा है कि उस वीडियो के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है तो फिर पुलिस ने अपनी चार्टशीट में उस वीडियो को क्यों नहीं शामिल किया? वह वीडियो कहां है?” नरवाल ने भी वीडियो में दिख रहे लोगों के एबीवीपी से जुड़े होने का दावा करते हुए कहा कि आखिर उन लोगों के खिलाफ चार्जशीट क्यों नहीं दायर हुई?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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