इंदिरा गांधी के सामने जो चुनौती 1974 में थी वही मोदी के समक्ष भी है पर आज देश बदल चुका है..

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इतिहास अपने को दोहरा रहा है और 1974 वाले दौर में जो महसूस हुआ था वही आज भी महसूस होने लगा है लेकिन आज का भारत एकदम अलग हालात में जी रहा है, जिसके चलते मोदी के लिए इंदिरा गांधी के नक्शेकदम पर चलना मुश्किल है.


-शेखर गुुप्ता।।

लगातार गिरावट दर्शाते तमाम आर्थिक संकेतकों में एक ऐसा संकेतक भी है जो सबसे अलग दिख रहा है. बेरोजगारी का स्तर आज जितना बुरा है उतना पिछले 45 वर्षों में कभी नहीं रहा और यह हमें 1974 में पहुंचा रहा है.
तब, इंदिरा गांधी की लोकप्रियता घटी नहीं थी मगर एक निराशा उभरने लगी थी. फिर भी, निराश वोटर अभी ‘टीना’ (देअर इज़ नो ऑल्टरनेटिव) यानी विकल्पहीनता वाले जाल में उलझे थे. सारे आर्थिक संकेतकों में गिरावट बेकाबू हो चुकी थी, मुद्रास्फीति दर लगभग 35 फीसदी पर पहुंच गई थी. इस सबके बावजूद राष्ट्रवाद अपने चरम पर था.
आज भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है न? मुद्रास्फीति दर को छोड़ दें तो बाकी सब कुछ 1974 जैसा ही दिख और महसूस हो रहा है. तब की तरह एक बेहद लोकप्रिय नेता भी है, जिसकी पार्टी के अंधभक्त समर्थक भी हैं, बिखरा हुआ विपक्ष भी है, राष्ट्रवादी जोश भी वैसा ही है, और बुरा न मानें तो बेलगाम गिरावट दर्शाती अर्थव्यवस्था है, गंभीर बेरोजगारी भी है.
भारत केवल विरोधाभासों का ही देश नहीं है, वह एक ही पीढ़ी में एकदम भिन्न विचारधाराओं के तहत एक ही तरह का ‘मेगा’ विरोधाभास पैदा करने में भी सक्षम है.
हम जरा और पीछे 1971 में जाकर देखें. इस साल के शुरू में इंदिरा गांधी ने उस कांग्रेस के, जिसे उन्होंने खुद तोड़ा था, ताकतवर पुराने नेताओं की जमात को हरा कर एक मशहूर चुनाव जीता था. यही नहीं, पूरा विपक्ष भी उनके खिलाफ एकजुट हो गया था.
1971 के शुरू में वे ‘गरीबी हटाओ’ के लोकलुभावन नारे से उभरी लहर पर सवार थीं. वह साल खत्म होते-होते वे ‘मां दुर्गा’ की अवतार बन गईं, क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान को परास्त किया और उसे तोड़ भी दिया था. वे पानी के ऊपर भी चल सकती थीं.

लेकिन समाजवाद और राष्ट्रवाद से मिलकर नेता की जो दोधारी लोकप्रियता बनी थी उसने भारत की कटु सच्चाइयों को नज़रों से ओझल कर दिया था. अर्थव्यवस्था उनके उन्मादी राष्ट्रीयकरण के बोझ से चरमरा रही थी, उद्यमी लोग लाइसेन्स-कोटा राज की ज़्यादतियों के कारण मैदान छोड़कर भाग रहे थे, सुपर-हाइ टैक्सों (अंततः 97.5 प्रतिशत) ने उस काली अर्थव्यवस्था को जन्म दे दिया था जिसे आज तक दफन नहीं किया जा सका है, ऊपर से युद्ध का खर्च सिर पर आ पड़ा था. लेकिन याद रहे कि राजनीतिक तक़दीरें आंकड़ों से नहीं तय होतीं, बल्कि जनता के मूड से यानी जिसे हम ‘हवा’ कहते हैं, उससे तय होती हैं.
1971 में ही गीतकार-शायर गुलज़ार ने अपनी पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ बनाई थी. इसकी कहानी शहर में रहने वाली एक गरीब, बेसहारा औरत (मीना कुमारी द्वारा अभिनीत) के इर्दगिर्द बुनी गई थी, जिसे कुछ जवान लड़कों (जो बाद में हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार बने) से सहारा और प्यार मिलता है. इन लड़कों के पास डिग्री है, सपने हैं मगर रोजगार नहीं है और जिन्हें हताशा में गलियों में उधम मचाने, झगड़े करने और समय काटने के सिवा करने को कुछ नहीं है. लेकिन वे अपने ऊपर हंस सकते हैं. और गुलजार ने गिरावट के उस दौर के लिए एक गीत लिखा था- ‘हालचाल ठीकठाक है…’

इस गाने को ध्यान से सुनिए. इसकी हरेक लाइन सुनिए, रुक कर यह समझने की कोशिश कीजिए कि मैं आपको उस दौर में क्यों ले जाना चाहता हूं. मसलन यह लाइन देखिए- ‘बीए किया है, एमए किया, लगता है वो भी ऐवें किया/ काम नहीं है वरना यहां आपकी दुआ से सब ठीकठाक है…’ गुलजार यह 2019 में भी लिख सकते थे, या आज इसे रिलीज़ करके कह सकते थे कि इसे अभी ही लिखा है. आप पकड़ नहीं पाते.
2014 में ‘दुनिया मुट्ठी में कर लो’ के जोश के बाद आज हम यहां कैसे आ गिरे हैं, इस पर विचार करने से पहले यह समझ लेना काम देगा कि 1971 में एक शिखर पर पहुंचा इंडिया और इंदिरा 1974 के गर्त में कैसे पहुंचीं. मार्च 1971 में तमाम विपक्ष को धूल चटा कर हासिल हुई वह जोरदार जीत इतनी नशीली थी कि इंदिरा गांधी और उनके घोर सिद्धांतवादी (वामपंथी) सलाहकार समाजवाद के नशे में बस डूबते ही चले गए.

तब, भारतीय अर्थव्यवस्था जब अपनी सबसे कमजोर हालत में थी तभी दो अप्रत्याशित अपशकुनी घटनाएं घट गईं. अक्तूबर 1973 में योम किप्पुर युद्ध हो गया जिसके चलते तेल के मामले में ऐसा झटका लगा जिसे संभालना उनके बस में नहीं था. दूसरे, गेंहू के थोक व्यापार का राष्ट्रीयकरण करके उन्होंने खुद पैर पर कुल्हाड़ी मार ली. उनकी कम्युनिस्ट मंडली ने कहा कि जब यह सोवियत संघ में कारगर है तो अपने यहां क्यों नहीं होगा. लेकिन यह यहां कारगर नहीं हुआ.
इसके बाद पहाड़ टूट पड़ा. गेंहू की कीमतें बढ़ने लगीं, किसानों में आक्रोश उबलने लगा, व्यापारी और ग्रामीण बिचौलिये बेरोज़गार होने लगे. इंदिरा गांधी के लिए यह वैसा ही था जैसा चीन में माओ के लिए था जब उन्होंने गोरैयों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था. इंदिरा गांधी ने फैसले को पलटा मगर तब तक देर हो चुकी थी. 1974 की अंतिम तिमाही तक भारत में मुद्रास्फीति दर अपने शिखर 34.7 प्रतिशत पर पहुंच गई, तो इंदिरा गांधी की लोकप्रियता गर्त में पहुंच गई. देशभर में बेरोज़गार और नाराज़ युवाओं ने विरोध प्रदर्शन, नवनिर्माण आंदोलन छेड़ दिया. यह सब आपको जाना-पहचाना और कुछ-कुछ आज के जैसा तो नहीं लग रहा है?
निरुपाय होकर इंदिरा गांधी ने अपना आजमाया हुआ अस्त्र- ‘राष्ट्रवाद’ चलाया. पहले आया मई 1974 में पोकरण में पहला परमाणु परीक्षण. लेकिन इसका जोश चंद हफ्तों तक ही रहा क्योंकि लोग गहरे आहत थे. अंतिम पासा मई 1975 में फेंका गया, सिक्किम का भारत में विलय करवाकर. लेकिन नाराज़ लोग धरने से उठने को तैयार नहीं थे. एक ही महीने बाद देश के ऊपर इमरजेंसी थोप दी गई.

एक बार फिर यह साफ कर दूं कि इन दिनों हर बात को ठोक-बजा कर जांच लेना ही बेहतर है. इसलिए, मैं कोई भविष्यवाणी नहीं कर रहा कि फिर ऐसा ही होगा. फिलहाल के लिए मेरा इतना ही कहना है कि जब बेरोज़गारी बढ़ जाती है और अर्थव्यवस्था में लंबे समय तक गतिरोध बना रहता है तब लोगों के आक्रोश को राष्ट्रवाद के जोश से शांत नहीं किया जा सकता.
यहां हम आपको फिर से फिल्मों की ओर ले जा रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे फ़िल्मकार जनता के मूड, अपने बाज़ार को हमारे जैसे पंडितों से पहले भांप लेते हैं. ‘मेरे अपने’ के बाद गरीबी, शोषण, महंगाई (बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई… गाना हिट हो गया था) और बेरोज़गारी पर बनी फिल्मों (‘शोर’, ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ आदि) का एक दौर ही आ गया, जिनमें बेरोज़गार को हीरो बनाया गया. यह बड़ी सफाई से ‘एंग्री यंग मैन’ वाले दौर में पहुंच गया. लेकिन यहां मैं इस पर बात नहीं करूंगा.
आपके मुताबिक, इतिहास ने खुद को कब से दोहराना शुरू किया? आपमें से कुछ लोग मान सकते हैं कि यह 2019 के चुनाव में मोदी की जीत से शुरू हुआ, और इसने अर्थव्यवस्था में गिरावट के बावजूद मोदी सरकार को दंभी बना दिया. अगर लोग अर्थव्यवस्था में गिरावट के बावजूद हमें वोट दे रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि उन्हें बस सामाजिक-राष्ट्रवादी जोश दिलाते रहना ही काफी है. इसलिए, अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए भिड़ जाने की जगह अनुच्छेद 370, मंदिर, नागरिकता कानून थोप दो. इस बात की कतई परवाह मत करो कि तिमाही-दर-तिमाही आर्थिक संकेतक बद से बदतर होते जा रहे हैं.
क्या आप कैलेंडर को पीछे उलट कर वहां ले जाने पर विचार करेंगे जब मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के शुरू में उसे ‘सूट बूट की सरकार’ और भूमि अधिग्रहण कानून पर हार के रूप में दोहरा झटका लगा था? मोदी ने तुरंत राष्ट्रवाद, गहरे सामाजिक लोकलुभावन नारों की ओर रुख कर लिया था और खुद को भ्रष्टाचार से लड़ने वाले योद्धा के रूप में पेश करना शुरू कर दिया था.

नोटबंदी उनका खुद का उठाया गया पहला अपशकुनी कदम था. अब सीएए-एनआरसी-एनपीआर का जो घालमेल है वह इस तरह का दूसरा कदम दिख रहा है. क्योंकि पहली बात यह है कि इसने देश में जिस तरह विभाजन पैदा किया है वैसा दशकों में किसी कदम ने नहीं किया था. दूसरे, इस पर दुनियाभर में जिस तरह सीधा विरोध नहीं तो निराशा ज़ाहिर की जा रही है उसके बाद अब आप इससे पलट भी नहीं सकते. आज हम एक वैश्विक दुनिया में जी रहे हैं, जिसमें भारत के दांव वे नहीं रह गए हैं, जो 1974 में थे. तीसरे, इंदिरा गांधी के उत्कर्ष वाले दौर के विपरीत भारत में आज संघीय शासन व्यवस्था ज्यादा मजबूत है. आप मुख्यमंत्रियों पर हुक्म नहीं चला सकते, न ही अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करके उनकी छुट्टी कर सकते हैं.
तो, 1974 में पहुंच जाने के एहसास के बाद अब हम आगे कहां जाएंगे? हमें मालूम है कि इंदिरा गांधी ने हमें 1975 की गर्मियों में कहां पहुंचाया था. फैसला करना नरेंद्र मोदी के हाथ में है. वे भले ही इंदिरा गांधी से ज्यादा लोकप्रिय और ताकतवर होंगे लेकिन यह 1975 नहीं है, आज दुनिया भी बदल चुकी है और भारत भी बदल चुका है.

द प्रिंट से साभार

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