विपक्षी राजनीति के लिए माद्दा चाहिए और नैतिक साहस भी..

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-अशोक कुमार पाण्डेय।।

राजनीति में विजुअल्स का अपना महत्त्व है। कल यूपी पुलिस की झूमाझटकी के बीच अडिग चलती जातीं और फिर स्कूटर पर सवार प्रियंका गांधी के विजुअल्स लम्बे समय तक बने रहेंगे स्मृति में। दारापुरी जी के घर पर उनकी बीमार पत्नी का सर सहलाते प्रियंका के चेहरे का वात्सल्य भी। जिन्हें लगता है यह राजनीति है उन्हे विनम्र सूचना कि राजनीतिक दल राजनीति करने के लिए ही हैं। सवाल बस इतना है कि वह किसके पक्ष में की जा रही है।

बड़ी सी गाड़ी में हाथ हिलाते रोड शो के विजुअल्स मुझे हास्यास्पद लगते रहे हैं। संघर्ष भाव ग़ायब ही है लगभग विपक्ष की राजनीति से। मायावती चंद्रशेखर की आलोचना करती हैं और अपने कार्यकर्ताओं से सड़क पर न आने की अपील। ज़ाहिर है उनमें न तो माद्दा है लड़ने का न नैतिक साहस। अखिलेश अपने कार्यकर्ताओं की पिटाई के बावजूद महल में आराम फ़रमा रहे हैं। जल रहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश लेकिन चौधरी साहब के साहबजादे अजित सिंह चुनाव के पहले दिखना शायद अपनी हेठी समझते हैं। वाम लड़ रहा है अपनी पूरी ताक़त से। पूरी की पूरी कमेटीज़ गिरफ़्तार हैं। लेकिन उनके विजुअल कहाँ आते हैं मीडिया में!

जानता हूँ कल वोट का टाइम आया तो कन्हैया भूमिहार बना दिया जाएगा। राहुल-प्रियंका कुछ और। इमरान प्रतापगढ़ी फ़र्ज़ी बना दिया जाएगा। जो आज मुस्लिम दलित पिछड़े के नाम पर जीतकर ख़ामोश बैठे हैं, उनसे कोई सवाल न होगा।

दिल्ली में बैठे कथित बुद्धिजीवी जातीय गोलबंदी के लिए जान लगा देंगे। होगा वह जब होगा। लेकिन आज जो लड़ रहे हैं वह इतिहास में दर्ज होगा, जो घरों में क़ैद बयानवीर हैं उनका कारनामा भी।

कौन जाने दलित-पिछड़ी-अल्पसंख्यक जनता की स्मृति में भी दर्ज हो रहा हो सब।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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