धारा 144 जमानती अपराध है लेकिन पुलिस बना रही पोस्टर बॉय..

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-पंकज चतुर्वेदी।।

बीस दिसम्बर को देश के कई हिस्सों के साथ गाज़ियाबाद में हुयी दुर्भाग्यपूर्ण अशांति अब यहाँ की पुलिस के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गयी है , जिले के विभिन्न थानों में दर्ज सात एफ़आईआर में कोई सात सौ नामज़द और कई हज़ार अज्ञात लोग दर्ज कर लिए गये हैं।

उस दिन के प्रदर्शन में पुलिस के अलावा पत्रकारों द्वारा खींचे फोटो और वीडियो से लोगों के चित्र बना कर उन्हें फरार घोषित किया जा रहा है। पसोंडा गाँव में पुलिस ने कई घरों में तोड़ फोड़ की , लूटा, सीसीटीवी कैमरे तोड़े।

एक बात और पुलिस हिरासत में गए लोगों में कई हिन्दू भी हैं, कई अल्प आयु भी और बहुत से बूढ़े भी — पुलिस शाम को पकडती है, रात भर मारती है- न खाना- ना पानी और ना ही कडाके की ठण्ड से बचने के उपाय – जिसके घर से माल आ गया उसे छोड़ दिया , गरीब जेल भेजे जा रहे हैं — आतंक इतना है कि किशोर- युवा घर छोड़ कर भागे हुए हैं।
हालांकि मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले के अनुसार पुलिस किसी को शक के आधार पर मुजरिम घोषित कर उसका फोटो नहीं चस्पा आकर सकती, एक बात और क्या किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने और हिंसा करना एक ही बात है ?

पुलिस तो प्रदर्शन में शामिल सभी लगों के फोटो लगा कर गैर क़ानूनी काम खुद कर रही है – लोगों को मारना, साम्प्रदायिक गाली देना, घर से सामन लूटना और तोड़ फोड़ करना — यह तो जाहिर है किसी कानून में दर्ज है ही नहीं।
इसका जवाब किसी अफसर के पास नहीं कि- किसी प्रतिरोध में शामिल होने पर किस धारा के तहत मामला दर्ज़ हो रहा है ? महज दफा १४४ तोड़ने का ? यह तो जमानती है ? महज प्रदर्शन में शामिल होने को तोड़ फोड़ में शामिल मान लेना भारतीय नागरिकों के संवैधानिक अधिकार का हनन है।

काश: उस दिन शान्ति से प्रदर्शन में शामिल सारे लोग एक साथ, अपने हाथ पीछे बाँध कर थानों में पहुँच जाएँ– काश जिन लोगों के फोटो पुलिस चिपका रही है, यदि वे खुद एक साथ थाणे जाएँ और सवाल करें कि हम तो नारे लगा रहे थे, हमने कहाँ हिंसा की ??
बहरहाल “अज्ञात ” लोगों की इतनी बड़ी संख्या गाज़ियाबाद पुलिस को इतनी जाड़े में भी जम कर गर्मी का अहसास करवा रही है , जुम्मे की नमाज़ शान्ति से निकले इस लिए गुरूवार और शुक्रवार के दिन में पुलिस ने मुस्लिम मुहालों में उधम नहीं काटा — वरना यह उनका प्रिय शगल बन गया है —
गाजियाबाद जिले में दर्ज मामले, उनमें ज्ञात और अज्ञात की संख्या और पुलिस द्वारा घोषित नाम – इनमें पसोंडा के समाजवादी पार्टी के नेता के शामिल होने पर सपा ने कल पुलिस को ज्ञापन भी दिया है कि इस नाम का उनका कोई नेता नहीं है

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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