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-केशी गुप्ता।।



देश की समस्याओं तथा मुद्दों को लेकर हर व्यक्ति का अपना मत हो सकता है। एक ही मुद्दे को लेकर सहमति असहमति होना  स्वाभाविक है क्योंकि हर व्यक्ति अपने विवेक और विचारों से प्रभावित होकर ही सोचता है। लोकतांत्रिक देश में हर व्यक्ति को अपनी बात स्वतंत्र होकर रखने की आजादी है। जो न्याय संगत भी है मगर हर नागरिक को अपने अधिकारों  के साथ अपने कर्तव्य और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारी ,अपने दायित्व को भी समझना बहुत जरूरी है। किसी भी मुद्दे को लेकर विरोध जताना आवाम जनता का हक है क्योंकि बिना आवाज़ उठाएं आप अपनी बात देश की कार्यरत सरकार तक नहीं पहुंचा सकते।
किसी भी मुद्दे के  विरोध में जनता को प्रदर्शन करने की अनुमति है  तो दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों का यह दायित्व बनता है कि किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन से देश की  सार्वजनिक व्यवस्था में किसी भी तरह की कोई रुकावट पैदा ना हो जिससे आम आदमी को कठिनाइयों का सामना करना पड़े। विरोध प्रदर्शन के दौरान लगाए जाने वाली सार्वजनिक संपत्ति को आग या किसी भी तरह के दंगे तथा मारपीट को बढ़ावा देना ना सिर्फ कानून के विरुद्ध है बल्कि मानवता और एक नागरिक के दायित्व के भी विरुद्ध है। देश की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मतलब अपना ही नुकसान करना है। वैसे ही हमारे देश में बहुत सी व्यवस्थाओं की कमी है और यदि रोष में आकर हम मौजूदा सार्वजनिक संपत्ति को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाते हैं तो यह हमें और देश को और पीछे की तरफ ले जाता है।
दूसरी तरफ देश की कार्यरत सरकार और कानूनी व्यवस्था कि यह जिम्मेवारी बन जाती है कि वह किसी भी विरोध प्रदर्शन को इस नौबत तक ना आने दे  की प्रदर्शनकारी उग्र रूप ले। कोई भी प्रदर्शन या विरोध शांत तरीके से ही किया जाना चाहिए। आज देशभर में जेएनयू , बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तथा भारतीय नागरिकता अधिनियम जैसे मुद्दों को लेकर कई तरह के विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं।  जो शायद सही भी है यदि हम देश के नौजवान जो कल इस देश का भविष्य है कि नजरिए से देखते हैं तो वह आज बढ़ती महंगाई बढ़ती जनसंख्या बेरोजगारी और हिलती आर्थिक व्यवस्था से लड़ रहा है । जिसके चलते आम आदमी में रोष देखने को मिलता है। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम बाकी सभी  मुद्दों की तरफ ध्यान देने से पहले अपने देश  की अंदर की समस्याओं जैसे शिक्षा ,बेरोजगारी ,महंगाई बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते अपराध और हिलती अर्थव्यवस्था ,प्रदूषण , गंदगी में सुधार लाने का प्रयत्न करें ताकि एक स्वास्थ्य समाज और राष्ट्र का निर्माण हो सके।

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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