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कालाधन निकला, जो घुसपैठिये निकलेंगे?

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-देवेंद्र शास्त्री।।

बड़े नोट 1000 और 500 के बन्द किये गए क्योंकि उनमें कालाधन छुपा हुआ था।अगर बड़े नोटों में कालाधन छुपाया ही जाता है तो 2000 का नोट (कालाधन छुपाने का पहले से बड़ा इंस्ट्रूमेंट) क्यों चलाया गया? इस सवाल का जवाब आज तक किसी भारतीय को नहीं मिला। उत्तर आप खुद ही खोजें। एक आदमी बड़ी करेंसी को गलत बता कर बन्द करता है लेकिन कुछ दिनों बाद पहले से ज्यादा बड़ा नोट जारी कर देता है। कुछ तो कारण रहा होगा?
अब जरा गौर फरमाएं। काला धन जिनके पास था, उन्हीं के पास है आज भी। बस कमीशन के पैसे गए। पर ये कमीशनबाजी हुई किनके बीच? सरकार, बैंक अधिकारी, एक खास राजनीतिक पार्टी और उससे जुड़े इंस्टिट्यूशन, उद्योगों व इंडिजुअल्स के बीच। पर नोटबन्दी का दंस देश झेल रहा है। लम्बे समय तक झेलता रहेगा।
वैसा ही खेल NRC का है। उससे कई गुना बड़ा और खतरनाक। वॉल्यूम देखा जाए तो इस दिवालिया होती इकोनॉमी के लिए सम्भव ही नहीं है कि वो पूरे देश में NRC का अभियान सफलतापूर्वक चला सके। पर होम मिनिस्टर ऐलान कर चुके हैं “NRC हो कर रहेगी, कोई चाहे जो कर ले”, तो मान कर चलते हैं कि होगी।
घुसपैठिया तो छुप कर बैठता है। सरकार क्या मानती है वो उसके पास आएगा डाक्यूमेंट ले कर, की नागरिकता दे दो? और वो उसको डिटेंशन केम्प में डाल देगी? वो बाहर क्यों आएगा अगर उसको जेल का डर होगा? पर उसके चक्कर में 133 करोड़ जनता को NRC का ऐसा रगड़ा लगेगा कि वो लहलुहान हो जाएगी। जाल साजी, भ्रष्टाचार, पुलिस और अदालतों के चक्कर। घुसपैठिया फिर भी छुप कर बैठा रहेगा। वैसे ही जैसे नोटबन्दी में काला धन कमीशन के जरिये रातोरात सफेद धन में छुप गया था।
नोटबन्दी के वक़्त मोदीजी ने कहा था ना कि ये बैंक मैनेजर बदमाशी कर रहे हैं। NRC में भी घुसपैठिये नहीं ढूंढ पाने के लिए किसी न किसी पर अंगुली उठेगी और लाखों करोड़ रुपयों की बर्बादी की दर्दनाक कहानी इतिहास के पन्नों में दफन कर दी जाएगी। और तब शुरू होगी बांग्लादेशी घुसपैठियों की खोज। स्थानीय पुलिस से कहा जायेगा अपने अपने इलाके से बांग्लादेसी घुसपैठिये ढूंढो। तो भाई ये नेक काम आज ही से क्यों नहीं किया जा सकता? थाने के पासपोर्ट वेरिफिकेशन सेल को घुपैठिये ढूंढने का जिम्मा दीजिये। साप्ताहिक शिविर लगाइये। सुनवाई कीजिये। और दो तीन साल में बिना खर्च के घुसपैठिये बाहर कर दीजिए। दूसरा राउंड जनगणना टीम को दीजिये और फिल्टर आउट करिये घुसपैठियों को। पर दोस्तों सरकार की नीयत, काबलियत और आर्थिक हालात को देख कर आप अनुमान लगाएं की क्या NRC दूसरा नोटबन्दी तो साबित नहीं होने जा रही है?
असम में आठ साल तक NRC चली। टैक्सपेयर का कई हज़ार करोड़ रुपया फूंकने के बाद उस पूरी कवायद को सरकार ने रद घोषित कर दिया। क्योंकि वांछित रिजल्ट नहीं मिले। अब पूरे देश में NRC लागू करने के परिणाम भी समझ लो। असम के अनुभव को आधार मान लिया लिया जाए तो डिटेंशन केम्पों को बनाने और रखे गए लोगों का खानपान रखरखाव, मैनपॉवर, प्रबन्धन, डाक्यूमेंटेशन आदि पर कई लाख करोड़ रुपया खर्च होगा। सवाल है कि विदेशी घुसपैठिये क्या वाकई इतनी बड़ी समस्या है कि पूरी पब्लिक को लाइन, कोर्ट, डाक्यूमेंट, जालसाजी, घूसखोरी के कई साल चलने वाले जंजाल में उलझा दिया जाना चाहिए? या बिना नागरिकों को परेशान किये बांग्लादेशी नागरिकों को फ़िल्टर आउट करने का तरीका निकालना चाहिए?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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