योगेंद्र यादव होने का मतलब..

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-वीरेन्दर भाटिया।।

योगेंद्र यादव इस देश के सबसे संवेदनशील, संवेदना पूरित बुद्धिजीवी हैं। वे राजनेता कम है बुद्धिजीवी अधिक है। बुद्धिजीवी को राजनीति में दखल देना चाहिए वे इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए एक्टिव पॉलिटिक्स भी करते हैं। हर जगह वे एक ही योगेंद्र यादव हैं। राजनीति में कोई और बौद्धिकता में कोई और हो ऐसा छल वे कभी नही करते हैं। वे वैकल्पिक राजनीति के सिद्धांत के बुनकर हैं जिन्होंने वैकल्पिक राजनीति के सिद्धान्त को लोगों के मन-मस्तिष्क तक पंहुचाया। आज के समय मे वे सबसे प्रासंगिक, एक्टिव और तार्किक नजर आते हैं। देश की संस्कृति, धर्म और संविधान की साफ समझ रखते हुए संविधान की रक्षा के लिए हमेशा नेतृत्व कारी भूमिका में आगे होते हैं।

अन्ना आंदोलन के वक्त योगेंद्र ही वे व्यक्ति थे जिन्होंने इन्टरवीन करके उस आंदोलन को राजनीतिक परिणति तक लेकर जाने में सफलता पाई। वैकल्पिक राजनीति का वह एक आरंभिक दौर था जिसे अरविंद केजरीवाल समझ ही नही पाये और वे खुद को ब्रांड समझने की खतरनाक सोच से घिर गए। अरविंद केजरीवाल ने अपने जीवन मे यदि सबसे ज्यादा किसी का नुकसान किया है तो वह योगेंद्र यादव का किया है कि उनके मूल सपने को ही अरविंद ने तार तार कर दिया बावजूद इसके योगेंद्र ने कभी अरविंद को बुरा नही कहा। वे बाकी राजनेता की तरह दूसरे पक्ष की सिर्फ बुराई करने वाले नेता नही हैं। उन्होने वैकल्पिक राजनीति के आंदोलन को अपने सामने मरते देखा जिसका कातिल सिर्फ अरविंद केजरीवाल था लेकिन योगेंद्र ने केजरीवाल के हर अच्छे काम की सराहना की। अन्ना मूवमेंट के बाद एक टेलीविजन कार्यक्रम में अरविंद और मणिशंकर अय्यर उपस्थित थे। मणिशंकर अय्यर ने अरविंद से कहा कि आप खुशकिस्मत हैं कि आपके पास योगेंद्र यादव जैसा बुद्धिमान आदमी है। आप तो उनके चरणों मे बैठकर राजनीति सीखिए। अरविंद आज अकेले बैठकर यदि ईमानदारी से मन्थन करें तो वे पाएंगे कि योगेंद्र के जाने के बाद आम आदमी पार्टी दिल्ली तक रुक गयी है। जबकि योगेंद्र ने napm को जोड़कर सारे भारत मे आंदोलनकारी एक झंडे के नीचे ला खड़े किए थे। आम आदमी पार्टी वैकल्पिक राजनीति का एक बड़ा प्रयोग थी। 2019 के आम चुनावों में आम आदमी पार्टी मोदी का विकल्प बन कर उभरती यदि अरविंद केजरीवाल इस आंदोलन की हत्या ना करता।

योगेंद्र यादव ने nrc बिल के तुरंत बाद एक वीडियो जारी किया औऱ बताया कि इस बार सरकार के इस कृत्य के खिलाफ विद्यार्थी वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग खड़ा हो रहा है। यह आंदोलन सरकार के लिए बहुत दुष्कर होने वाला है। योगेंद्र की संवेदनशीलता दरअसल बहुत तीव्रता से काम करती है। देखते ही देखते पूरे देश के विद्यार्थी औऱ लेखक इस बिल के विरोध में आ खड़े हुए। योगेंद्र ने आम चुनाव के वक्त बहुत दिन पहले यह बता दिया था कि नरेंद्र मोदी एक्सट्रीम मेजोरिटी से फिर से सरकार बना रहे हैं। हम बहुत सारे उनके मित्र जो योगेंद्र से बहुत प्रेम करते हैं उनकी इस घोषणा से बहुत नाराज भी हुए।

दरअसल योगेंद्र एकल संस्था हैं। एक आदमी कई बार संस्था हो जाता है। एकल संस्था बौद्धिक औऱ नैतिक स्टैंड पर खड़ी रहे तो उसके साथ सेलेक्टिव लोग ही जुड़े रहते हैं। भीड़ तन्त्र उनके साथ जुड़ नही पाता क्योंकि उनके निजी लालच का योगेंद्र किसी प्रकार से पोषण नही करते। जबकि योगेंद्र भीड़ तंत्र का मनोविज्ञान बहुत बेहतर जानते औऱ समझते हैं। वे यह भी जानते हैं कि तिनके भर भी अनैतिक और झूठा हुआ जाए तो एक के बाद एक चुनाव जीते जा सकते हैं लेकिन उनका वैकल्पिक राजनीत का मॉडल किसी झूठे आश्वासन पर खड़ा नही है। वैकल्पिक राजनीति में वे पूरी राजनीतक मनोवृति बदलने का मॉडल सोचे हुए हैं जिसे वे अपने सीमित साधनो से प्रचारित करते रहते हैं। यदि चालू ढर्रे की राजनीति करनी हो तो योगेंद्र के लिए कोई भी लोकसभा सीट अजेय नही, योगेंद्र के लिए देश मे बड़े से बड़ा पद अजेय नही है। प्रत्येक दल के नेता योगेंद्र की बुद्धिमता के ना सिर्फ कायल हैं बल्कि चाहते हैं कि योगेंद्र उनके साथ काम करे। लेकिन नैतिकता, सिद्धान्त कुछ तो होते हैं जिन्हें मुल्क ने त्याज्य मान लिया है। योगेंद्र को देश के संविधान, देश के युवा, देश की ऊर्जा से बहुत उम्मीद है। मुझे इन सबके साथ योगेंद्र से बहुत उम्मीद है। किसी दिन हम योगेंद्र को देश के लिए नीतियां बनाते देखेंगे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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