जब क़ातिल ही इल्ज़ाम लगा दे मासूमों पर..

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-प्रियांशु।।

जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने कैब और एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट किया लेकिन दिल्ली पुलिस ने न केवल छात्रों के शांतिपूर्ण जुलूस पर लाठी चार्ज किया बल्कि विश्वविद्यालय में बिना किसी हक़ घुस लाइब्रेरी में बैठ पढ़ रहे बच्चों तक को बेतरह मारा। यहाँ तक कि पुलिस ने वाशरूम तक में अनाधिकृत प्रवेश कर दरवाज़े तोड़ डाले। यह कैसा जंगलीपन था और पुलिस का कौन सा क्रूर चेहरा दिखाया जा रहा था. बीते रविवार को ऐसा क्या हुआ जिसके कारण पुलिस को विश्विद्यालय में घुस कर बच्चो को निर्ममता पूर्वक पीटना पड़ा? इसके पीछे की वजह शायद हम और आप में से किसी को भी मालूम नहीं है या यूं कहे तो दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार के अलावा सोमवार की घटना की जानकारी किसी अन्य व्यक्ति को है ही नहीं।

एक तरफ पुलिस और उनके लोग खुद इस बात की पुष्टि करते है कि वहां के स्थानीय उपद्रवी तत्वों ने पुलिस चौकी और बसों में आग लगाई, फिर वही पुलिस लाइब्रेरी में पढ़ रहे बच्चो को पीटने कैंपस के भीतर पहुंच जाती है वो भी बिना किसी इजाज़त के। दिल्ली पुलिस बसों में आगजनी करने वाले लोगों की पहचान करने के बजाए छात्रों पर टूट पड़ती है और उन्हें इतना पीटती है कि बदन लहू लूहान कर देती है, मंजर ऐसा हो जाता है कि छात्रों के मरणासन्न होने की खबरें सामने आने लग जाती है।

देश की राजधानी है दिल्ली और देश के सबसे बड़े शहरों में से भी एक है, वहां हर जगह, हर चौक चौराहे, दुकानों, घरों के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हुए है, प्रोटेस्ट को देखते हुए चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल के सैनिक और अत्यधिक मात्रा में तैनात किए गए है, यह दौर ऐसा है कि हर हांथ में फ़ोन है और हर फ़ोन में कैमरा भी है फिर क्यों ऐसा होता है कि बसों या पुलिस चौकियों में आग लगाने का, आग लगाने वाले लोगों का, या फिर आग लगाने के लिए हाथों में पेट्रोल या फिर तेल की बोतलें लेे जाते हुए लोगों का एक भी वीडियो सामने नहीं आया है। इसके पीछे ऐसी क्या वजहें है? क्या ये महज़ एक इत्तेफाक है या फिर छात्रों के ख़िलाफ़ कोई साजिश? क्योंकि छात्रों को बड़बड़ता से पीटने का वीडियो सामने है, उन्हें ज़ख्मी हालात में पाए जाने का वीडियो सामने है, नारे लगाते हुए छात्रों का वीडियो सामने है, आंसू गैस के गोले दागते हुए पुलिस का वीडियो सामने है, नकाबपोश लोगों और पुलिस के पत्थरबाजी का वीडियो सामने है लेकिन वो वीडियो सामने क्यों नहीं है जिसके जवाब में पुलिस ने बच्चों को बेरहमी से मार पीट के मौत के घाट उतार दिए है।

इन तमाम चीजों को देखते हुए एक सवाल तो मुनासिब बनता है न कि पुलिस उन लोगो की पहचान करने में असफल क्यों रही है जिसने छात्रों के आंदोलन को हिंसात्मक बनाया था?. जहां बसें जलाई गई वहां भारी लाठीचार्ज और आंसूगैस बिखरी होने के बाद पुलिस के अलावा कोई आम नागरिक जा भी नहीं सकता था, और दूसरी कि पुलिसिया आतंक के बीच किसकी मज़ाल थी कि अपनी जान जोखिम में डालता।

फिर आग लगाई किसने? किसने जलाया दिल्ली को? किसने जलाया जामिया को? हम कब तक पुलिस और सरकार की नाकामी का सारा ठीकरा बिना किसी तथ्य के मासूम छात्रों पर फोड़ते रहेंगे?

पिछले दो दिनों से हम जामिया के छात्रों के ख़िलाफ़ खड़े हुए है तब जब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत है। हम बिना किसी तथ्य या सबूत के जामिया के छात्रों को पाकिस्तान परस्त और देशद्रोही बता रहे है जबकि वो इसी हिंदुस्तान के संविधान की कद्र करते हुए यहां के नागरिकों की हक़ की लड़ाई लड़ रहे है?

दिल्ली पुलिस और केंद्र कि सरकार बस इतना बता दे कि यदि जामिया के छात्रों ने आग लगाई है, हिंसा की है तो आप सबूत पेश कीजिए और गिरफ्तार कीजिए या फिर जिस किसी अन्य बाहरी व्यक्ति ने भी ऐसा काम किया है तो उसे पकड़िए और देश के सामने लाईए, उसपर कानूनी कार्रवाई करके सजा दिलवाइए और यदि आप ऐसा नहीं कर पा रहे है तो जामिया के छात्रों को बदनाम करने की साजिश खत्म कीजिए और देश को बताईए की वो तमाम छात्र जिसको आपने पीटा है वो बेगुनाह है।

लेकिन यदि आप अब भी इसी जद्दो-जहद में है कि इस घटना का ठीकरा किसके सिर पर फोड़े तो आपको और पूरे देश को जम्हूरियत के कत्ल की मुबारकबाद।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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