मुल्क का यह संक्रमण काल है..

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वीरेंदर भाटिया।।

देश को आज़ाद हुए 72 बरस हो गए हैं। एक लिहाज से 72 कुछ होता नहीं। मुल्क को बदलने के लिए सेंकडो साल लगते हैं। 1947 में फिर से जन्मे भारत की तब की जरूरत गिरने से खड़ा होना था। गिरने से खड़ा होने के लिये तब जो जरूरी था वह किया गया। कुछ जरूरी था जो तहों परतों के नीचे दब गया। सोच रहे थे कि पीढियां जब बदलेंगी तो नई पीढियां नए माहौल, नए विचार को स्वतः अडॉप्ट कर लेंगी। लेकिन हम पुराने लोग, पुराने वर्शन वाले लोग नए वर्शन में पुराना सब लोड करते गए। कुछ संस्कृति के नाम पर, कुछ धर्म के नाम पर, कुछ रिवाजो के नाम पर । एक ही पार्टी राज करती गयी। एक ही ढर्रे पर देश चलता रहा। बढ़ता रहा या नही यह विरोधियों के तर्क वितर्क का मामला है लेकिन विचार के धरातल पर मुल्क में नीचे तक कोई विमर्श नही गया। जे पी, लोहिया और इमरजेंसी के दौरान जरूर देश आंदोलित हुआ लेकिन एक सीमित विषय को लेकर।

2014 मे सत्ता बदली। पूर्ण बहुमत पहली बार किसी दूसरी पार्टी को मिला। उसने पिछली सरकारों के किये को किया माना ही नही और अपना कुछ नया करने की ठानी। नया जब जब करने की कोशिश हुई है उसके लिए पुराना या तो पूरा ढहाना होगा या आंशिक। ढहाने की प्रक्रिया जब शुरू होती है औऱ नया बनने तक के समय को हम संक्रमण काल कहते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा द्वंद्व होता है। इसी समय मे सबसे ज्यादा कठिनाई होती है। इसी समय मे ठीक बनाने की जदोजहद खड़ी होती है।

तो यह जो वर्तमान समय है दरअसल यह एक मुफीद समय है इस संक्रमण की प्रक्रिया के लिए, ऎसा कह कर संतोष कर लेते हैं। इस समय मुल्क की लगभग आबादी अक्षर ज्ञान ले चुकी है, इसी समय विचार के दौड़ने के अनेक मार्ग पनप गए हैं। अनेक साधन आविष्कृत हो चुके हैं। स्थापित विचार पर जब नया विचार चोट करता है तो वैचारिक प्रक्रिया शुरू होती है। विचार विकास की पहली सीढ़ी है। बिना विचार या वैचारिक द्वंद्व के विकास सम्भव नहीं। जिस कौम में विचार मर गए वे कौमें विकास के मामले में वही रुक गईं जिन धर्मों में विचार रुक गए उनमे विकास रुक गए वे धर्म सड़ गए। इसलिए 1947 से अब तक वैचारिकी औऱ विचार के द्वंद्व से हम दूर रहे। आज स्त्री विमर्श, जातिगत विमर्श, रोजगार संबंधी विमर्श, अर्थव्यवस्था जनक विमर्श, धर्म आधारित नागरिकता सम्बन्धी विमर्श वातावरण में है। इसके लिए मौजूदा निजाम को साधुवाद कहने का मन करता है कि उनकी एक-एक असफलता एक-एक बड़ा विमर्श खड़ा कर रही है

अब सोचनीय यह है कि नया क्या बन रहा है। रोडमैप क्या है । दरअसल प्रजातन्त्र में सरकारें अपने आप मे कुछ नही होती। सरकारें वही करती हैं जो बहुतायत जन चाहता है। संक्रमण काल मे सोचने दें उन्हें कि वे क्या चाहते हैं। आप सोचिए ना। क्या चाहिए आपको। कैसा देश चाहिए। जब एक-एक समूह सोचता है तब कुछ नही होता। जब सभी वर्ग सोचते हैं, आन्दोलित होते हैं तब बदलता है कुछ। इस वक्त देश आंदोलित है। सोचिए ना कि आदर्श मुल्क की तस्वीर कैसी हो।

संक्रमण काल मे हम सोचेंगे कि हमारी ताकत क्या है। सुबह बेटे को पढा रहा था तो खुद पढ़ने को मिला कि हम बहु सेल से बने जीव हैं। वहीं कुछ जीव एकल सेल से बनते हैं। बहु सेल से बने जीव एकल सेल की अपेक्षा वृहद सोचते हैं। भारत भी विविधताओं से बना देश है। इसे एकल सेल में बदलने की सोच खतरनाक है। देश के मूल स्ट्रक्चर को नही छेड़ा जाना चाहिए। यह हमें किसी दिन समझ जरूर आएगा। सोचिये कि विविधताओं के मुल्क की परिकल्पना कितना खूबसूरत विचार है। सिर्फ हिंदू मुल्क बनाने की जिद में क्या खो देंगे यह हम नही जानते शायद।

एक महत्वूवर्ण बात जो मुझे यहां करनी है कि यदि भाजपा सत्ता में ना आती तो मुसलमान वर्ग के बीच भी वैचारिक हलचल ना होती। आज बेशक कोई इस बात से सहमत हो या ना हो लेकिन मुसलमान की पैरवी सामान्य धार्मिक हिन्दू नही कर रहा। सामान्य हिन्दू की यह सोच है कि मुसलमान कट्टर है, खतरनाक है। मुसलमान की पैरवी नास्तिक हिन्दू या प्रगतिवादी हिन्दू ही करता है क्योंकि वह धर्मो के जंजाल को लांघ चुका है। लेकिन वह जिस मुसलमान की पैरवी करता है वह खुद धार्मिकता में गहरे जकड़ा है। इतना गहरे जकड़ा है कि संविधान और इस्लाम दोनों बराबर रखे हों तो उसकी प्राथमिकता इस्लाम है संविधान नही। बेशक किसी जगह संविधान इस्लाम से महत्वूवर्ण होगा लेकिन वह सार्वजनिक रूप से उभर कर नही आया। आज देश मे यदि यह आवाज मुखर होती कि मुसलमान की प्राथमिकता संविधान है, तो कोई कारण नही था कि हिन्दू इस तरीके से mobilise किया जा सकता। संघ को राम पर हिंदू इकठे करने में फिर दिक्कत होनी थी। संक्रमण काल मे मुस्लमान किसी वक्त सोचेगा कि देश मे उसने इस्लाम को आगे रखकर, धर्म को आगे रखकर हासिल क्या किया। मुसलमान गैर धार्मिक नही होना चाहता लेकिन हिन्दू से गैर धार्मिक होने की उम्मीद करता है। खुद इस्लाम को आगे रखता है, कुरआन को आगे रखता है और हिन्दू से उम्मीद करता है कि वह संविधान को आगे रखे। मुसलमान के नेता तमाम ही धार्मिक लोग हैं। मुल्ला, मौलवी या इमाम इनके नेता हैं। इनके खैरख्वाह यही लोग क्यों हैं। कोई नास्तिक इनका नेेता क्यो नहीं उभरता। प्रगतिवाद हिन्दू मात्र का तो मसला नही। मानव का मसला है।

क्या हम किसी दिन सोचेंगे कि हम जिस सनातन का ढिंढोरा पूरे विश्व मे पीट रहे थे उसके दर्शन का जब समय आया, जब सनातन को दिखाने का वक्त आया, जब हिन्दू सरकार आयी तब हम सनातन के नाम पर लिंचिंग करते पाए गए। हम तो सनातन की सुंदरता दिखाने के दावे करते थे। सर्वत्र नारी पूज्यंते के दावे थे हमारे लेकिन प्रगतिशील युग मे भी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद हम उन्हें मंदिर नही जाने दे रहे। हम अदालतों से कह रहे हैं कि स्त्री को मंदिर ना जाने दिया जाए। अरे भई मुसलमान को ही कट्टर कहे जाते हो। भीतर अपने भी तो देख लो एक बार। सनातन की सुंदरता हमने क्या दिखाई कि विवेकानंद जी का धूमधाम से जन्मदिन मनाने वाले हम विवेकानंद के मूल स्वर से ही मुकर गए कि हम तमाम धर्मो तमाम पन्थो के लोगों को अपने हृदय में स्थान देते हैं। कहाँ दे रहे हैं हम स्थान। हम तो नागरिकता बिल के समर्थन में खड़े मुस्लिम भगाओ के नारे लगा रहे हैं। सोचेंगे हम कभी तो कि सनातन की सुंदरता दिखाने का जब मौका मिला तब हम अति विभत्स और असुंदर हो गए।

हम किसी दिन सोचेंगे कि देश का मतलब क्या है। नागरिकता का मतलब क्या है। स्टेट का मतलब क्या है। आज आधार बनवाओ। आज पैन से लिंक करवाओ आज kyc अपडेट करवाओ। कागज पूरे करो। क्या नागरिकता का मतलब राइट ऑफ एजुकेशन भी होगा कभी? राइट to cure भी होगा? राइट to employed भी होगा? क्या बुढ़ापा निश्चिन्त गुजारने के इंतजाम भी होगा नागरिकता में या सिर्फ मुल्क की बाउंड्री में रहने भर की नागरिकता है बाकी सब झगड़े फसाद मवाद वैसे ही। सोचेंगे ना कभी तो। कब सोचेंगे। संक्रमण काल मे ही सोचिये ना।

सोचिये। देश में एक दल ने उथल पुथल मचाई है। आपका देश है। उस पार्टी के कार्यकाल में बनेगा भी नही। संक्रमण काल इतना छोटा नही होता कि दस पांच साल में देश का नक्शा मिल जाए। लेकिन दिमागों को खोल के रखियेगा कि आपका भारत कैसा हो। जब संक्रमण काल निकल जाए तब हम हिन्दू मुस्लिम विभाजन पर ना खड़े हो। तब हम स्त्री की खिलाफ़त या स्त्री को रौंदने की मनोवृत्ति पर ना खड़े हों। तब तक हम धर्म की विभीषिका को समझ सकें। तब हम सब संविधान में विश्वास रखें। और विकास के नाम के लिए अपनी ऊर्जा खर्च करें नाकि लिंचिंग, झगड़ों या धार्मिक उठापठक में। देश का नक्शा देश के लिए मांग अभी सोचिये। निजाम वही देगा जो आप अवाम तय करेंगे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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