जब 96 रनों से शतक से चूक गए थे नवाब मंसूर अली खां उर्फ ‘टाइगर’ पटौदी

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मंसूर अली खान उर्फ टाइगर वैसे तो हरियाणा में पटौदी नाम की एक बहुत ही छोटी सी रियासत के नवाब थे, लेकिन क्रिकेट में अपने शानदार खेल और बेहतरीन कप्तानी के दम पर उन्होंने करोड़ों भारतीयों के दिलों पर बरसों राज किया। शायद यही कारण था कि उनकी मौत पर हर खेल प्रेमी की आंखे नम हो उठीं, जबकि उनकी ऐतिहासिक जीत के 43 साल बीत चुके हैं।

इक्कीस साल की उम्र में उन्हें उस समय भारतीय टीम की कप्तानी दी गई थी जब वेस्ट इंडीज़ दौरे में चार्ली ग्रिफ़िथ की गेंद पर नारी कॉन्ट्रेक्टर का सिर फट गया था। उसके बाद से पटौदी ने चालीस टेस्टों में भारत की कप्तानी की और नौ में भारत को जीत दिलाई। 1968 में पहली बार विदेश की धरती में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ उन्होंने 3-1 से भारत को सिरीज़ जितवाई थी। वे उन दुर्लभ खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिनके पिता भी भारत के लिए टेस्ट खेल खेल चुके हैं। इफ़्तिख़ार अली ख़ाँ पटौदी आज़ादी से पहले भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान थे। हालांकि टाइगर उनकी मौत के वक्त सिर्फ 11 साल के थे।

कहते हैं भारतीय क्रिकेट में नवाबी की रवायत को नवाब पटौदी ने ही तोड़ा। वे उस दौर के आखिरी नुमाइंदे  थे, जब भारत में क्रिकेट से राजा-महाराजा और रईसजादे ही वास्ता रखते थे। सामंती अंदाज कुछ इस कदर हावी था कि सीनियर खिलाड़ी आउटफील्ड में फील्डिंग नहीं करते थे। लेकिन टाइगर पटौदी ने खुद आउटफील्ड में फील्डिंग करनी शुरू की और यह बताया कि मैदान पर खिलाड़ियों का अहं नहीं, खेल बड़ा होता है। उनसे पहले भारतीय क्रिकेट टीम एक ढीली-ढाली फौज की तरह मैदान पर उतरती थी, लेकिन टाइगर ने उसे एक संगठित टीम का रूप दिया। यही वजह रही कि विदेशी धरती पर 33 मैच हार चुकी भारतीय टीम पटौदी के नेतृत्व में जीत का सेहरा बांध कर अपने वतन लौटी। क्रिकेट के जानकारों का कहना है कि टाइगर पटौदी ने भारतीय टीम की सूरत ही बदल डाली थी।

अपने 46 टेस्ट मैचों में छह शतकों के साथ पटौदी ने 2,793 रन का योगदान किया। एक दोहरा शतक भी मारा। आज की कसौटियों पर यह रिकॉर्ड फीका लग सकता है, लेकिन 1960-70 के दशकों की कसौटी पर अगर यह असाधारण नहीं, तो शानदार जरूर है। टाइगर मानते थे कि वे इतने अच्छे खिलाड़ी नहीं थे कि टीम को लीड कर सकें, इसलिए वे उसे पीछे से प्रेरित करते रहते थे। ऐसे कप्तान के सामने चुनौती अपने साथी खिलाड़ियों से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवाना होता है। वे यह कर सके, इसलिए वे भारतीय क्रिकेट के टाइगर बने।

वर्ष 1961 मे एक कार दुर्घटना में उनकी दाहिनी आँख में चोट लग गई थी, जिससे उन्हें दो-दो चीज़ें एक साथ दिखाई देती थीं और वह भी 6-6 इंच की दूरी पर। इसके बावजूद न सिर्फ़ उन्होंने उस समय के सबसे तेज़ गेंदबाज़ों फ़्रेडी ट्रूमेन, वेस हॉल, चार्ली ग्रिफ़िथ और ग्राहम मेकेन्ज़ी को बख़ूबी खेला बल्कि छह शतक भी लगाए।

पटौदी की नवाबी उनके स्वभाव में नहीं, बल्कि विदेशियों के मुकाबले मैदान पर उतरने में दिखती थी। कॉलर ऊंची  कर, दुनिया की बेहतरीन टीमों के मुकाबले खेलते वक्त मैदान में अकड़ के साथ खड़ा होना पहली बार टाइगर पटौदी ने ही सिखाया था। वे अपने ज़माने के ज़बरदस्त स्टाइल आइकॉन थे। एक बार जब इंग्लैंड के खिलाफ़ जब वह चार रनों पर आउट हो पैवेलियन लौट रहे थे, तो कमेंट्रेटर बॉबी तल्यार ख़ाँ ने तल्ख टिप्पणी की थी- ”पटौदी 96 रनों से शतक चूक गए।”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “जब 96 रनों से शतक से चूक गए थे नवाब मंसूर अली खां उर्फ ‘टाइगर’ पटौदी

  1. अबतक कितने भारतीय बल्लेबाजोने यह मुकाम हासिल किया है?
    लव यू नवाबसहाब…..

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