पाकिस्तान में हिंदू कैसे रहते हैं..

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मैंने 2004 में कराची का दौरा किया था जहां मुझे पॉश क्लिफ्टन क्षेत्र में एक बड़ा मंदिर मिला। उस मंदिर के बाहर पठानी सूट में एक व्यक्ति खड़ा था। उसका नाम जयंती रत्न था और वह एक छड़ी चलाते हुए मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश कर रही बड़ी भीड़ का “जय शिव शंकर” के नारों के साथ सर्वेक्षण कर रहा था। इस अवसर पर, उसने अपनी छड़ी क्षैतिज रूप से कुछ लोगों की छाती पर रखकर वहीं रोक दी और उनसे कहा – “मुसलमानों को अनुमति नहीं है,”। उसने मुझे भी रोका। “क्या आप हिंदू हैं,”उसने मुझसे कहा”, “मुसलमानों को अंदर जाने की अनुमति नहीं है।”

मैंने उसे अपना भारतीय पासपोर्ट दिखाया। अब वह उलझन में था। उसने कहा, “ईसाईयों को भी अनुमति नहीं है। लेकिन फिर आप एक भारतीय हैं,”। अब वह इस समस्या को हल करने के लिए मन ही मन बुदबुदाने लगा।

यह अपरिहार्य था कि वह मुझे पास कर देगा। और मैंने उससे पूछा, “क्या कराची के एक मंदिर के बाहर एक आदमी को खड़े होकर मुसलमानों को वहां से दफा होने के लिए कहना खतरनाक नहीं था”? “बिल्कुल नहीं,” उसने कहा, “मैं यहां पैदा हुआ था। मैं यहां हूं। मैं अपने आस्था और विश्वास की सेवा करने के अपने अधिकार हमेशा का प्रयोग करूंगा।”

अगले दिन! लक्ष्मी नारायण मंदिर के बाहर, चार पाकिस्तानी लड़कियों को बानी नामक एक व्यग्र गुजराती महिला द्वारा गेट पर रोक दिया गया था। “मुसलमानों को अनुमति नहीं है,” बानी ने उन्हें गुस्से से कहा।
“हम सिर्फ घूमना और देखना चाहते हैं,” रूमी, लड़कियों में से एक ने कहा।
“फिर चिड़ियाघर जाओ,” बानी ने जवाब दिया।

लड़कियों ने बीच में फिर से गुहार लगाई। “हम सिर्फ प्रार्थना करना चाहते हैं,” उनमें से एक ने कहा। मंदिर के अंदर से, हीराकुमारी, एक युवती, जो बानी की ही एक संबंधी थी। वह लड़कियों के ऊपर चिल्लाती है, और कहती है, “जाओ अपने भगवान से प्रार्थना करो। तुम गायों को खाओ, हमारे देवताओं का मज़ाक बनाओ, पूछो कि क्या हमारे देवताओं को ठंड नहीं लगती है …” लेकिन हिराकुमारी ने मुझे बताया कि वह पाकिस्तान के मुसलमानों से प्यार करती थी, और उसका मानना था कि अगर बात मुसलमानों पर आ गई तो वो ही उनके जीवन के बाकी हिस्सों में उन्हें खिलाएंगे। उसने ये भी कहा कि पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा जगह है जिसे वह अपना घर बुलाती है लेकिन वह मुसलमानों को मंदिर के अंदर कैसे जाने दे सकती हैं?”

पाकिस्तान के सरकारी आंकड़े के अनुसार, वहां हिंदुओं की संख्या, कुल आबादी का 2% से भी कम है, लेकिन जो हिंदू वहां रहते हैं, वे अपनी संख्या को इससे दो गुना ज्यादा बताते हैं, इसीलिए मोटे तौर पर पाकिस्तान में हिन्दुओं की कुल आबादी चार मिलियन से आठ मिलियन के बीच होती है।

उनमें से 95 प्रतिशत से अधिक सिंध प्रांत में रहते हैं, मुख्यतः गरीब किसान और मजदूर। उनमें से कुछ बहुत अमीर हैं, और वहां बिना जोख़िम उठाए अमीर होने की पूरी अनुमति है। जैसे फ़ैशन डिज़ाइनर दीपक पेरवानी जिन्होंने अपने दाहिने हाथ पर एक गणेश का टैटू बनवाया था। भारत-पाक विभाजन के बारे में उनका विश्लेषण था, “भारतीय अपनी जान बचाने के लिए सलवार नहीं काट सकते और पाकिस्तानी चूड़ीदार को नहीं काट सकता।”

उन्होंने मुझे बताया कि कराची के हिंदुओं ने बस बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पाकिस्तान में खुद को असुरक्षित महसूस किया था। लेकिन कभी चीन में पाकिस्तान के सांस्कृतिक राजदूत रहे पेरवानी को पाकिस्तानी हिंदू होने का थोड़ा मलाल भी था। पाकिस्तान में सिंधी समुदाय छोटा था जिसके कारण उनको शादी के लिए उपयुक्त लड़की खोजना आसान नहीं था । पेरवानी ने बताया कि उनलोगों को, “लड़की को आयात करना पड़ता है”, और वह इसपर काफ़ी अच्छे से कार्यरत है। फिर एक बेहद सौहार्दपूर्ण और कुशल महिला दीपक पेरवानी की मां रेणु ने कहा, “भारत के लोग नहीं चाहते कि उनकी बेटियां शादी करके पाकिस्तान में रहें। और वहां के लोगों में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अलग मानसिकता बन गई है।”
अपने बेटे के लिए विकल्प का ना होना, उनकी आँखें थोड़ी गंभीर कर गईं। लेकिन फिर उन्होंने कहा, “मैं अपने घर में एक मुस्लिम लड़की को बहू के रूप में कभी स्वीकार नहीं करूंगी।”

(मनु जोसेफ की आगामी पुस्तक से)
(हिंदी अनुुवाद – प्रियांशु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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