ऐ मेरे वतन के लोगों जरा याद करो..

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– नवीन शर्मा||

ऐ मेरे वतन के लोगों जरा याद करो कर्बानी .. देशभक्ति गीत लता मंगेशकर की आवाज में सुनना एक अलग ही जज्बा पैदा करता है। यह गीत जिस व्यक्ति की कलम से निकला था उन्हें हम कवि प्रदीप के नाम से जानते हैं। यह गीत उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा था। लता मंगेशकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में यह गीत गाया था जिसका आकाशवाणी से सीधा प्रसारण किया गया। गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू के आंख भर आए थे।बाद में कवि प्रदीप ने भी ये गाना जवाहरलाल नेहरू के सामने गाया था।

गीत का राजस्व युद्ध विधवा कोष में दिया

कवि प्रदीप ने इस गीत का राजस्व युद्ध विधवा कोष में जमा करने की अपील की। मुंबई उच्च न्यायालय ने 25 अगस्त 2005 को संगीत कंपनी एचएमवी को इस कोष में अग्रिम रूप से 10 लाख रुपये जमा करने का आदेश दिया।

मूल नाम ‘रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी’ था

कवि प्रदीप का मूल नाम ‘रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी’ था। उनका जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के उज्जैन में बदनगर मे हुआ। बचपन से ही हिन्दी कविता लिखने में रूचि थी।कवि प्रदीप की शुरुआती शिक्षा इंदौर के ‘शिवाजी राव हाईस्कूल’ में हुई, जहाँ वे सातवीं कक्षा तक पढ़े। इसके बाद की शिक्षा इलाहाबाद के दारागंज हाईस्कूल में संपन्न हुई। इसके बाद इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। दारागंज उन दिनों साहित्य का गढ़ हुआ करता था। वर्ष 1933 से 1935 तक का इलाहाबाद का काल प्रदीप जी के लिए साहित्यिक दृष्टीकोंण से बहुत अच्छा रहा। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की एवं अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्‌यक्रम में प्रवेश लिया। विद्यार्थी जीवन में ही हिन्दी काव्य लेखन एवं हिन्दी काव्य वाचन में उनकी गहरी रुचि थी।आपने 1939 में लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक तक की पढ़ाई करने के पश्चात शिक्षक बनने का प्रयत्न किया लेकिन इसी समय उन्हें मुंबई में हो रहे एक कवि सम्मेलन का निमंत्रण मिला।

हिमांशु राय की सलाह पर नाम बदला

बांबे में द्विवेदी जी परिचय बांबे टॉकीज़ में नौकरी करने वाले एक व्यक्ति से हुआ। वह रामचंद्र द्विवेदी के कविता पाठ से प्रभावित हुआ तो उसने इनके बारे में हिमांशु राय को बताया। उसके बाद हिमांशु राय ने उन्हें बुलावा भेजा। वह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने 200 रुपए प्रति माह की नौकरी दे दी। हिमांशु राय का ही सुझाव था कि रामचंद्र द्विवेदी नाम बदल लें। उन्होंने कहा कि यह रेलगाड़ी जैसा लंबा नाम ठीक नहीं है, तभी से रामचंद्र द्विवेदी ने अपना नाम प्रदीप रख लिया।

इसलिए बने प्रदीप से कवि प्रदीप

प्रदीप से ‘कवि प्रदीप’ बनने की कहानी भी बहुत रोचक है। उन दिनों अभिनेता प्रदीप कुमार का बहुत नाम था। अब फिल्म नगरी में दो प्रदीप हो गए थे एक कवि और दूसरा अभिनेता। दोनों का नाम प्रदीप होने से डाकिया प्राय: डाक देने में गलती कर बैठता था। एक की डाक दूसरे को जा पहुंचती थी। इसी दुविधा को दूर करने के लिए प्रदीप अपना नाम ‘कवि प्रदीप’ लिखने लगे । इससे चिट्ठियां सही ठिकाने पर पहुंचें लगीं।

अंग्रेजी हुकूमत ने निकाला गिरफ्तारी का वारंट

कवि प्रदीप की पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म बंधन से बन गई थी। 1943 की गोल्डेन जुबली हिट फिल्म किस्मत के गीत “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है। दूर हटो… दूर हटो ऐ दुनियावालों हिंदोस्तान हमारा है ने उन्हें देशभक्ति गीत के रचनाकारों में अमर कर दिया। इस गीत के अर्थ से झलक रही आजादी की घोषणा से क्रोधित तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए। इससे बचने के लिए कवि प्रदीप को भूमिगत होना
यूँ तो कवि प्रदीप ने प्रेम के हर रूप और हर रस को शब्दों में उतारा, लेकिन वीर रस और देश भक्ति के उनके गीतों की बात ही कुछ अनोखी थी।

चल चल रे नौजवान’
उनकी पहली फिल्म थी कंगन जो हिट रही। उनके द्वारा बंधन फिल्म में रचित गीत, ‘चल चल रे नौजवान’ राष्ट्रीय गीत बन गया। सिंध और पंजाब की विधान सभा ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी और ये गीत विधान सभा में गाया जाने लगा। बलराज साहनी उस समय लंदन में थे, उन्होने इस गीत को लंदन बी.बी.सी. से प्रसारित कर दिया। अहमदाबाद में महादेव भाई ने इसकी तुलना उपनिषद् के मंत्र ‘चरैवेति-चरैवेति’ से की। जब भी ये गीत सिनेमा घर में बजता लोग वन्स मोर-वन्स मोर कहते थे और ये गीत फिर से दिखाना पङता था।
उनका फिल्मी जीवन बाम्बे टॉकिज से शुरू हुआ था, जिसके संस्थापक हिमाशु राय थे। यहीं से प्रदीप जी को बहुत यश मिला। कवि प्रदीप गाँधी विचारधारा के कवि थे। प्रदीप जी ने जीवन मूल्यों की कीमत पर धन-दौलत को कभी महत्व नही दिया।
11 दिसम्बर 1998 को 83 वर्ष के उम्र में इस महान कवि का मुम्बई में देहांत हो गया | कवि प्रदीप की दो बेटिया सरगम ठाकर और मितुल प्रदीप है जिन्होंने बाद में कवि प्रदीप फाउंडेशन की स्थापना की| कवि प्रदीप की याद में एक अवार्ड “कवि प्रदीप सम्मान” भी दिया जाता है |
रचनाएँ :
प्रसिद्ध गीत
• कभी कभी खुद से बात करो .
• आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ .
• साबरमती के सन्त .
• पिंजरे के पंछी रे .
• हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के .
• कभी धूप कभी छाँव
• गा रही है ज़िंदगी हर तरफ़ .
• मेरे जीवन के पथ पर .
• हम तो अलबेले मज़दूर .
• न जाने आज किधर .
• धीरे धीरे आ रे बादल .
• ऊपर गगन विशाल .
• मेरे मन हँसते हुए चल .
• पिंजरे के पंछी रे .
• देख तेरे संसार की हालत .
• तुमको तो करोड़ो साल हुए .
• किस बाग़ में मैं जन्मा खेला .
• हमने जग की अजब तस्वीर देखी .
• चल अकेला चल अकेला चल अकेला .
• उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम .
• अमृत और ज़हर दोनों हैं सागर में एक साथ .
• होने लगा है मुझ पे जवानी का अब असर .
• चलो चलें मन सपनो के गाँव में .
• मैं एक नन्हा सा मैं एक छोटा सा बच्चा हूँ .
• चरागों का लगा मेला ये झांकी खूबसूरत है .
• अपनी माँ की किस्मत पर मेरे बेटे तू मत रो .
• खिलौना माटी का

kavi pradeep

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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