क्या केवल धर्म के आधार पर हिन्दुस्तान में रह पाएंगे शरणार्थी?

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– प्रियांशु।।

लगभग 72 साल पहले सन् 1947 में जब भारत के दो टुकड़े हुए थे तब ना जाने कितने मुसलमानों ने इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान के बजाए एक पंथनिरपेक्ष – गणतंत्र हिन्दुस्तान को चुना था। आजादी के बाद किए गए बंटवारे में केवल एक ही देश ऐसा था जो एक ख़ास धर्म के नाम पर बसाया गया और वो था पाकिस्तान लेकिन बावजूद इसके करोड़ों तरक्की पसंद मुसलमानों ने एक देश और मजहब में से देश को चुना था। पिछले सत्तर सालों में भारत की पहचान उसके संविधान से रही है जो प्रत्येक नागरिको को बराबरी का अधिकार देती है चाहे वो किसी भी धर्म या मजहब या क्षेत्र से हो।

मोदी – शाह की नेतृत्व वाली मौजूदा राजग सरकार ने आज यानी 09 दिसंबर को विपक्ष के तमाम विरोधों के बावजूद दुबारा से देश की संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएब) को पेश कर दिया गया। नागरिकता संशोधन विधेयक बिल,2019 के मुताबिक श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अफ़ग़ानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत में आए सभी गैर मुसलमानों को को ( जिसमे हिन्दू,सिख,जैन, पारसी और ईसाई समुदाय) को अवैध शरणार्थी नहीं माना जाएगा,बल्कि उन्हें भारतीय नागरिकता भी दी जाएगी।

लेकिन वहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश में सताए जा रहे सिया या अहमदिया मुसलमान, म्यांमार में सताए जा रहे अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान और श्रीलंका में धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे अल्पसंख्यक तमिल मुसलमान यदि धार्मिक रूप से सेक्युलर देश भारत, वासुदेव कुटुंबकम् वालेे देश भारत, पूरे विश्व को एक परिवार मानने वाले भारत की नागरिकता लेनी चाहे तो वो ऐसा नहीं कर सकते है।

यह विधेयक भाजपा के 2014 और 2019 के चुनावी वादों के मुद्दों में से एक था और राजग कि पिछली सरकार ने जनवरी में इस विधेयक को लोकसभा में पास भी करवा लिया था लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में भारी प्रदर्शन को देखते हुए उसे राज्यसभा में पास नहीं करवा पाई। बहरहाल पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इस बिल का पुनः विरोध शुरू हो चुका है।
देश की तत्कालीन सरकार इस विधेयक को पास करवाके दूसरे धर्मों की तुलना में किसी एक ख़ास समुदाय को निशाना बना रही है।

सरकार का यह फैसला कहीं न कहीं 1893 के शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए भाषण को गलत साबित करती है जिसमें उन्होंने कहा था ” मैं उस देश के बारे में बात कर गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं,जहां हर देश और धर्म के लोग अत्याचार सहने के बाद शरण लेते है”। यदि यह बिल लोकसभा और राज्यसभा में पास हो जाता है तो शायद विश्व पटल पर भारत की बुनियादी पहचान जिस संवैधानिक ढांचे और सेक्युलरिज्म से है वो खोखला साबित होगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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