सनी देओल जी एक बार फिर बोलो न-तारीख पे तारीख वाला प्रेरणादायक डायलॉग..

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-राजीव मित्तल।।

जी हाँ हिंदुस्तान के संपादकीय पृष्ठ के ऊपर के माले में छपे मैत्रेयी पुष्पा के लेख का सार हैदराबाद एनकाउंटर को ले कर यही है. उन्होंने कई तरह की पगडंडियों से गुजरने के बाद सीधे सीधे इस एनकाउंटर को सेल्यूट मार दिया यह कहते हुए कि अब इस देश की स्त्री को देश की न्यायिक व्यवस्था पर कोई भरोसा नहीं है. स्पष्ट नहीं कहा लेकिन गंध वही है..और हाँ यह भी कि इस एनकाउंटर से कानून और न्याय दोनों चेतेंगे..और वैसे तो अकेले इस एनकाउंटर से ही 90 फ़ीसदी रोग दूर हो जायेगा..

एक शिकस्ता कश्ती पे बैठ साहिल की तमन्ना इसे कहते हैं.. हैदराबाद में डॉक्टर के फोन का कनेक्शन टूटते ही उसकी बहन सीधे पुलिस के पास ही गयी थी और उसके बाद पुलिस की सक्रियता काबिले दाद ही कही जायेगी-क्यों पुष्पा जी..

देश में बलात्कार के ज़्यादातर मामलों में पीड़िता पुलिस के पास ही जाती है और किस राज्य की पुलिस ने इससे पहले 24 घंटे में न अदालत न तारीख और मामले का फैसला कर दिया पुष्पा जी..और हाँ पुष्पा जी इतना और बता दीजिये कि अब तक हुए किसी भी पुलिस एनकाउंटर को आपकी आत्मा सही ठहरा पायी है क्या..

वैसे आपकी आशावादिता का कायल होने को जी चाहता है कि इन चार “बलात्कारियों” के सुबह पांच बजे मरने से बलात्कारियों में खौफ पैदा होगा और न्यायपालिका अंगड़ाई लेने लगेगी..कुल मिला कर सारा खेल घृणा का है तो पुलिस क्यों, अपराधी को सीधे भीड़ को क्यों न सौंपा जाये.पुलिस की गोलियों, जीप के पेट्रोल और नाइट शिफ्ट के अलाउंस का खर्चा भी बचेगा और भीड़ को मजा लेने का मौका भी मिलेगा..आपने तो पुष्पा जी इस सरकार की सारी मेहनत पर पानी फेरते हुए अपने एक ही लेख से भारत वर्ष को विश्वगुरु के पद पर आसीन कर दिया..

हाँ एक बात और पुष्पा जी..क्या आप अभियुक्त के अपराधी सिद्ध होने-हवाने का एक भी मौका नहीं देना चाहेंगी?? तब तो आप पिछले साल सहारनपुर में माँ-बेटी के बलात्कार में सीबीआई द्वारा सिद्ध किये तीन “अपराधियों” वाला किस्सा भलीभांति जान लीजिये जिन्हें बाद में अदालत को इसलिए छोड़ना पड़ा क्यों कि कुछ समय असली अपराधियों ने वो गुनाह कबूल लिया था..आपका बस चलता तो आप तो उन तीन निर्दोषों को पकड़ते ही मार डालो का आदेश पारित कर देतीं..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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