एनकाउंटर के नीचे क्या छिपाया पुलिस ने

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वीरेंदर भाटिया।।

केस शुरू होने से पहले केस बन्द करने की जल्दी पुलिस को कभी नही होती। अदालती धींगा मुश्ती से आजिज किसी पुलिस ने जन भावना के मध्यनजर किसी का एनकाउंटर कर दिया हो यह इतिहास में कभी सुना नही गया। पुलिस को जनभावना रौंदने की ट्रेनिंग होती है। जनभावना के पक्ष में एनकाउंटर करने की जल्दी कभी नही रही उन्हे।

ब्लात्कार का एक पूरा मनोविज्ञान है साहेब। लड़की बलात्कारियों को यदि नही जानती तो बलात्कारी अपनी हवस मिटाकर भागने की जल्दी में होता है। वह कत्ल की जघन्यता नही करता। इस केस में बलात्कारी लडक़ी के पूर्व परिचित नही हैं। ब्लात्कार का मनोविज्ञान यह नही कहता कि रेपिस्ट किसी लड़की को शराब पिलायेंगे। आनंद के लिए सेक्स औऱ हवस के लिए ब्लात्कार होता है। शराब यदि लड़की के पोस्टमार्टम में आई है तो लड़को की मेडिकल के साथ मिलान होनी चाहिए। ब्लात्कार का एक औऱ बड़ा वजनी मनोविज्ञान है कि कोई भी लड़का खुद से ताकतवर या खुद से बड़े रसूख वाली लड़की से ब्लात्कार की हिम्मत सरे आम नही कर सकता। इसीलिए अक्सर लोग बच्चीयों को हवस का शिकार बनाते हैं । टोल प्लाजा से लड़की को ये लुंज पुंज लड़के किडनैप करके ले गए। उन्हें खाली जगह भी मालूम थी जहां रेप करना था। लड़की को मार दिया जब तब भी डेड बॉडी से रेप क़िया। मतलब क्या बोल रहे हैं आप। सेक्स मनोविज्ञान से उलट सब कुछ? कोई गलती से मर गया आपसे तो आप रेप कर सकते हैं क्या उस वक्त । डर में किसी ने आजतक सेक्स किया है क्या। 5 बजे लडक़ी मोपेड़ खडी करके कैब करके गयी है। फिर 9 बजे लौटी है तो मोपेड पंक्चर थी। एक शुरुआती खबर यह कहती है कि लड़की पर कई दिन से नजर रखी जा रही थी। उसके बाद कहानी सीधे अकस्मात ब्लात्कार पर आकर खड़ी हो गयी।

साहब। कहानी के नीचे छिपी कहानी तलाशिये। जिन लड़को को ब्लात्कार के आरोप में उठाया गया है औऱ केस शुरू होने से पहले उन्हें खामोश कर दिया गया है, उसके पीछे कहानी कोई औऱ भी निकल सकती है। मेरी बलात्कारी से कोई सहानुभूति नही। कोर्ट तक केस जाने तक वे बोल देते शायद कि हमे तो डेड बॉडी ठिकाने लगाने को कहा गया। या कुछ और। किसी रसूखदार बाप के बेटे की करतूत भी हो सकती है जिसे इस तरीके से परिणति पर पहुंचा दिया गया हो।

अब आप अदालती फैसलो पर आ जाईये। अदालतों पर तो आपको बड़ा विश्वास है। होना भी चाहिए। अदालत चलती तो दसवीं पास आई ओ की कहानी पर ही है । ज्यादा दूर क्यो जाना। इसी केस को देख लेना। फर्जी है ना इंकॉउंटर लेकिन इसी केस में इंकॉउंटरर वाले पुलिस की बनाई फर्जी कहानी पर बरी जाएंगे।

अदालते एक एक केस में 7 साल लगा दें तो भी हमें अदालतों को अच्छा कहना चाहिए । कहना ही पड़ेगा । कोई चारा नही है । लेकिन गुजरात बेकरी रेप केस, भंवरी देवी रेप केस में क्या हुआ। गुजरात के तमाम केस ही उठा लें। । भँवरी देवी के1992 के केस में बलात्कारी निचली कोर्ट से बरी हो गए। जज ने कहा कि ऊंची जाति का आदमी छोटी जाति की औरत से ब्लात्कार नही कर सकता। बड़े अजीब तर्क और भी दिए। केस हाई कोर्ट गया। नवीन जानकारी मिलने तक जानकारी यह है कि हाई कोर्ट में उस केस की एक पेशी पड़ी है अब तक। न्यायालयों ने क्या सुधार कर लिया तब से अब तक । आप सोचिए।

राम रहीम के केस में 16 साल बाद न्याय मिला। धारा 376, 302 का आरोपी लगातार जमानत पर घूमता रहा। हमारे तो सामने विक्टिम पक्ष रोता रहा, लुटता रहा है। निर्भया की मां सात साल से कह रही है कि जब जुर्म तय हो गया, कबूला भी गया फिर भी देरी क्यो।

सजा का अर्थ यह है कि किसी ने संविधान में वर्णित अपनी आजादी का दुरुपयोग किया तो उसकी आज़ादी कुछ समय के लिये छीन ली जाएगी। जघन्यता की तो उम्र कैद। निर्दयता पूर्वक जघन्यता की तो उसे मरना पड़ेगा। निर्भया तो निर्दयता पूर्वक जघन्यता में 2012 में मर गयी। हत्यारे आजतक जिंदा क्यो हैं। वे मान भी चुके हैं जुर्म।

हम कदापि नही चाहते कि पुलिस इस तरह न्याय करे। हम चाहते हैं कि सड़ चुकी न्याय व्यवस्था में आमूल चूल सुधार हो। चल रहा ढांचा तो बेकार हो चुका है। जज खुद को परमात्मा समझते हैं। उनकी आंख के नीचे रिश्वतखोरी चलती है । उनकी कलम रोज फ़ैसले लिखती है न्याय कुचलती है। ऐसे सिस्टम में आधा देश यदि इंकॉउंटर को सही कह रहा है तो न्याय के ठेकेदार शरम करें कुछ।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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