न वकील, न दलील, मारे गए जलील..

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-कुमार सौवीर।।
अगर आप इस जीवन-दर्शन को स्वीकार कर चुके हैं तो यकीन मानिए मौत अब आपके, आपके घर और परिवार-कुटुम्ब के दरवाजे तक पहुंच चुकी है।
हम हैदराबाद गैंगरेप के चारों आरोपियों को आज पुलिस एनकाउंटर में मौत के हवाले किये जाने की पुलिसिया कार्रवाई पर बात कर रहे हैं। जहां महिलाएं पुलिसवालों को राखी बांध रही हैं, मिठाई बांटी जा रही है, पुलिस के समर्थन में नारे लग रहे हैं।
दरअसल, हम लोग जोश में हैं, खुश है। इसीलिए हम समझना भी नहीं चाहते कि किसी भी घटना का सीन-रीक्रिएट करने की आवश्यकता क्यों है, कब है, कैसे है। अभियुक्तों को किस तरह खुला छुट्टा भागने जैसा माहौल दिये जाने का कारण क्या है? उन्हें कड़ी सुरक्षा में रखने की जरूरत क्यों नहीं समझी गयी? खासतौर से तब जब इन अभियुक्तों को अदालत ले जाते वक्त गुस्साए लोगों ने भारी पथराव किया था। पुलिस को उन्होंने चारों को ले जा रही गाडिय़ों को चारों तरफ से घेर रखा था।
इसके पहले भी सम्भल में जेल ले जाते वक्त तीन अपराधियों ने दो पुलिसवालों की हत्या की थी और पुलिस गाड़ी तोड़ कर भाग निकले थे। घटना के बाद डीजीपी ने उस पर अपनी एसटीएफ लगा दी। नतीजा यह हुआ कि उनमें से दो को पुलिस ने एनकाउंटर में मार डाला, तीसरा अभी फरार है। रामपुर में बलात्कार के अभियुक्त को एक जोशीले दारोगा ने दोनों घुटने में घुटनों में गोली मार दी। ऐसा ही कई जगह पर लगातार होता जा रहा है।
तो फिर ऐसी हालत में अदालत की जरूरत क्या है? वकील क्या कर रहे हैं? अभियोजन क्या करेगा? जब सब कुछ पुलिस को ही करना है और सारे सबूत गवाह फैसला सब पुलिस ही करेगी तो फिर बारी बाकी सब औपचारिकताओं की आवश्यकता क्या है ?
करीब बीस साल पहले तब के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने सोनभद्र जाकर पुलिसवालों को ललकारा था कि नक्सली हमला करे, तो तुम एक पर तीन को मारो। अंजाम पता है आपको? सैकड़ों की तादात में लोग मारे मारे गए थे पुलिस हाथों। खुली छूट दे दी गयी थी।
और हैरत की बात है कि हैदराबाद के इस कांड पर आज खुद वकील भी खुश हैं। कई ने तो यहां तक लिख डाला है कि जी ठण्डा हो गया, सुकून मिल गया, अब मानवाधिकार की चिंता मत करो, पत्रकारों को मत सुनो।
मत मानो। हम तो पत्रकार हैं। हमें तो अपने गिरहबान पर कींचड फेंके जाने की आदत है। लेकिन हम आपको आगाह करते हैं, तो आप हमारी आवाज को चिल्लपों मानते हैं। मानते रहिये। लेकिन एक बार अपने गिरहबान में झांकिये जरूर कि इस तरह की मौतों को आप कब तक बर्दाश्त कर पायेंगे। खास तौर पर तब, जब पुलिस की ऐसी हरकतें राज-सत्ता को कुचल देगी, निरंकुश हो जाएगी।
पुलिस को पुलिस ही रहने दीजिए, उसे यमदूत मत बनाइये।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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