बच्चों का मानसिक  बलात्कार..

बच्चों का मानसिक बलात्कार..

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निशान्त राणा।।

बच्चे के पैदा होने के दिन से भारतीय समाज में बच्चों के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना शुरू कर देता है।
जब बच्चे के किसी कार्य से माता-पिता शिक्षक आदि को यदि जरा भी तकलीफ या जरा भी जिम्मेदारी बढ़ी महसूस होती है केवल तब ही बच्चे से पूर्ण व्यक्ति होने के अंदाज में डांटा फटकारा जाता है। अन्यथा हर एक स्थिति में बच्चों की आधिकारिक स्थिति व समझ को कुत्ते बिल्लियों से भी परे ही माना जाता है। कुल मिलाकर किसी भी क्षण बच्चे को पूर्ण मनुष्य माना ही नहीं जाता है।

उसमें भी यदि बच्चा लड़की हो, या शोषित वर्ग से आता हो तब तो उनका अस्तित्व होना न होना एक बराबर है।

बच्चे की सारी जिज्ञासाएं रोक कर जब आप उसे अध कच्ची नींद से उठा कर ऐसे स्कूल में भेज रहे होते है जहां उसे पूरे दिन बैठा रहना है, ऐसी चीजे सीखनी समझनी है जिनकी तरफ बढ़ना उसकी स्व रुचि से नहीं हुआ है तब आप अपने बच्चे को मानसिक पंगु बना रहे होते है।
बच्चे को जब आप स्वत: खोजना, समझना , सीखना जिज्ञासाओं के साथ बढ़ने का माहैल उपलब्ध न करा कर, नौकरी आदि के लिए बाजारू शिक्षा में धकेल रहे होते है जहां उसे अपने साथ वाले बच्चों के साथ मैत्री भाव, सहयोगात्मक भाव न रख कर उनसे निरंतर प्रतियोगिता करनी है, जिसमें चाहे सभी कितनी ही अच्छी दौड़ लगा ले लेकिन रेस में जैसा कि होता है आगे रहना कुछ एक को ही है।
बच्चे के जीवन का समय कीमती समय जब हम इस तरह के दवाब, पीड़ाओं बेमतलब की जबरदस्ती करवाने वाली मेहनत से गुजरवाते है तब हम उनके साथ मानसिक बलात्कार कर रहे होते है, अपनी हिंसा गुणात्मक रूप से बच्चों के ब्रेन में बलात्कारी ढंग से भर रहे होते है।

जब हम लड़के और लड़की के पालन पोषण – उनके खाने पीने, कपड़े पहनने, काम करने, अधिकारों में अंतर कर रहे होते है उसी पल से हम लड़की केवल भोग्या है, लड़के को भोग करना है जैसी मानसिकता तैयार कर देते है।
हमारे यहां बच्चों को पालन करने में ऐसा स्पेस ही नहीं छोड़ा जाता जहां बच्चों के ब्रेन के साथ जबरदस्त रूप से छेड़ छाड़ न की जाती है, मानो की धरती पर जीवन इसी सब कार्य के लिए हुआ हो, आने वाली पीढ़ियों का जीवन नष्ट या नरकमय बनाने में योगदान नहीं दिया तो जीवन व्यर्थ चला जाना है। हमारा जीवन जीने का कोई तरीका ट्रेनिंग ऐसी है ही नहीं बच्चों में बाकी मनुष्यों से अलगाव न पैदा करती हो, प्रेम पनपने की चिन्दी भर जगह की भी भ्रूण हत्या न कर देती हो।
जब हम बच्चों में जातीय गर्व भर रहे होते है उसी पल हम उन्हें दूसरों से अलग कर रहे होते है, उनके अंदर द्वेष भर रहे होते है, दूसरे लोगों को दोयम मानने की मानसिकता भर रहे होते है।

बच्चियों को बचपन से ही चूड़ी, चुन्नी, सिंदूर, पायल, बिछवा, कपड़ो के ढंग के साथ असुरक्षात्मक मानसिकता से बांध दिया जाता है। हमारे मानसिक बलात्कार इतने बारीक और चालाकी पूर्ण होते है कि केवल एक दरवाजा इस तरीके से खुला छोड़ा जाता है जिसमें व्यक्ति बचाव में भागता तो है लेकिन उसके लिए बिछाया हुआ एक अन्य जाल ही होता है जिसमें वह स्वतंत्रता के भ्रम में गुलामी वाला जीवन ही जीता है, स्वयं उसे महानता के रूप में प्रयोजित करता है।
महिलाएं को पूरा जीवन इस तरह कंडीशन किया जाता है कि उसे अपने आपको इन्ही में सुरक्षित महसूस करने का विकल्प केवल छोड़ दिया जाता है।
मतलब बचपन से लेकर अब तक केवल शोषण ही शोषण दोयम दर्जा और यहां आकर कुछ अलग है का भ्रम। शोषण करने के, बलात्कार करने के ऐसे तरीके जिसमें शोषित को पता ही न चले कि उसके साथ कुछ गलत भी हो रहा है, इतने गजब अमानवीय धूर्ततापूर्वक तरीके शायद ही किसी समाज में देखने को मिलते हो।

बाकी छोड़िए हमने तो शादी के नाम पर शारीरक बलात्कार, वेश्या वृति के लिए एक संस्था ही तैयार कर कर दी है, आप इसके नियमों के तहत वह सब कीजिए जो करना है उल्टा सम्मान आपको दिया जायेगा।

जिस समाज में मानसिक बलात्कारों की एक पूरी श्रंखला बनी हुई हो वह समाज हर स्तर पर कुंठित व हिंसक न होगा तो क्या होगा। ऐसे समाज में शारीरिक बलात्कारी पैदा नहीं होंगे तो क्या होंगे।

आप इस सब को समाज को कोसना कह सकते है लेकिन मैं इसे बीमारी का देखना या बीमारी को डाइग्नोज़ करना कहता हूँ। अभी तो हम बीमारी को महान बीमारी, विश्व गुरु बीमारी, दुनिया की सबसे अनूठी बीमारी मानने में ही फले फूले जा रहे है, मानसिक बीमारियों को पूजने में ही लगे हुए है। महाराज बीमारी को बीमारी मानिए तो सही इलाज अपने आप चल कर समाज में आ जायेगा।

किसी भी बीमारी का इलाज बीमारी वाले भाग को सुन्न कर देना या पैन किलर ले लेना नहीं होता है। चूंकि हम मानिसक बीमार है, हर पल तरह तरह के बलात्कारों को अपने जीवन में झेलते और करते आते है। यदि हम यह सोचते है कि हम जोर से चिल्लाने से, कठोर दंड आदि मांगने से अपने आप को छिपा ले जाएंगे या बचा ले जाएंगे तो हम रह रह कर सिर्फअपनी प्रताड़नाएं ही प्रदर्शित कर रहे होते हैं।
महिलाओं, बच्चों के मानसिक बलात्कार करने को हम महान सभ्यता के नाम पर गौरान्वित होते रहेंगे तब तक कड़े कानूनों, दंड फंड की मांग भी करते ही रहेंगे दोहरे चरित्र को छिपाने के यही सब उपाय होते है।

हम वास्तव में इलाज चाहते है तो जड़ें निरंतर खोदती रहनी होगी तब तक खोदते रहनी होगी जब तक सामाजिक बीमारियों का मूल नहीं पकड़ लेते। अब हम बीमारी के उस स्तर पर भी नहीं है जहां पेन किलर फौरी राहत दे देता हो, इलाज तो बहुत दूर की बात है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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