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राजस्थान: भामाशाह योजना में घोटाले, गहलोत सरकार बनी मूक दर्शक..

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-दिलीप खान।।

राजस्थान स्वास्थ्य घोटाला-1: कांग्रेस जिसे बीजेपी का घोटाले मानती है, वो गहलोत सरकार में भी बदस्तूर जारी है


राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ने 2014 में भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू करने का ऐलान किया. 13 दिसंबर 2015 से पूरे राज्य में ये योजना लागू है. इसके तहत सामान्य बीमारियों के लिए प्रत्येक पात्र को हर साल 30,000 रुपए, गंभीर बीमारियों के लिए 3 लाख रुपए का बीमा कवर मुहैया कराया जाता है. 1401 बीमारियों को इसके दायरे में रखा गया है. भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना में जांच, इलाज, डॉक्टर की फीस और ऑपरेशन सब सामिल हैं. सिंधिया सरकार की ये बेहद महत्वाकांक्षी योजना थी और उन्होंने लगातार ये दावा किया कि इससे ग़रीबों को इलाज करने में आसानी हुई है. सरकारी वेबसाइटों पर 6 मरीजों के बयान भी दर्ज हैं जिन्होंने इस योजना का ‘शुक्रिया’ अदा किया है.
लेकिन, जबसे राजस्थान में ये योजना लागू हुई, तबसे अगर सबसे ज़्यादा ‘शुक्रिया’ कोई अदा कर सकता है तो वो हैं इस योजना की ज़द में आने वाले अस्पताल, जिनके लिए ये योजना लूट का ज़रिया बन गई. एशियाविल हिंदी के पास इस योजना में हुई अनिमितताओं के पुख़्ता दस्तावेज़ हैं और अगले कुछ दिनों तक इस पर सीरीज़ में स्टोरीज़ आप पढ़ सकते हैं.
29 जुलाई को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विधानसभा में कहा, “जैसे ही भामाशाह योजना की शुरुआत हुई, इसके क्रियान्वयन और काम-काज को लेकर नियमित शिकायतें होती रहीं. इन शिकायतों की जांच के लिए मंत्रियों का एक समूह गठित किया जाएगा.” गहलोत ने इस योजना की आलोचना करते हुए कहा कि अगर राज्य में 1,000 ऑपरेशंस हो रहे हैं तो उनमें से 900 एक ही ज़िले में हो रहे हैं. चुनाव के वक़्त भी अशोक गहलोत ने इस योजना में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए वसुंधरा राजे सिंधिया की बीजेपी सरकार की घेराबंदी की थी, लेकिन गहलोत को मुख्यमंत्री बने अब 8 महीने से ज़्यादा हो चुके हैं और इस दौरान भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना में हो रही गड़बड़ियों का सिलसिला घटने के बजाए और बढ़ गया है.
किस-किस तरह के घपले?

  1. अस्पताल फ़र्ज़ी बिल के सहारे बीमा रक़म क्लेम कर रहा है
  2. जिस अस्पताल में आईसीयू है ही नहीं, वहां भी मरीज़ों को आईसीयू में भर्ती हुआ दिखाया जा रहा है
  3. मरीज़ों की सर्जरी नहीं होने पर भी अस्पताल सर्जरी का क्लेम कर रक़म वसूल रहा है
  4. एक ही एक्सरे को कई मरीज़ों के एक्सरे के रूप में पेशकर बीमा क्लेम करने की कोशिश हो रही है
  5. बीमा की ज़द में आने वाले मरीज़ों से अस्पताल ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से पैसे ऐंठ रहा है
  6. एक सर्जरी होने पर अस्पताल दो-तीन सर्जरी का क्लेम कर बीमा के पैसे वसूल रहा है
  7. अस्पतालों की मिली-भगत से नाम बदलकर अपात्रों का इलाज़ किया जा रहा है
  8. सरकारी बीमा कंपनी द्वारा ठोस साक्ष्य पेश किए जाने के बावजूद सरकारी अधिकारी निजी अस्पतालों के पक्ष में फ़ैसले दे रहे हैं
  9. कुत्ते और सांप काटने की संख्या में बेहताशा बढ़ोतरी दिखाकर ऐसे मरीज़ों को अस्पताल फर्जी तरीक़े से ‘भर्ती’ बताकर बीमा की रक़म वसूल रहे हैं
  10. एक ही दिन भर्ती होने वाले मरीजों को कई दिनों तक भर्ती दिखाया जा रहा है
  11. फ़र्ज़ीवाड़ा करने वाले अस्पतालों को डि-इमपैनल करने के नियमों को सख़्त बनाने के बजाए इसमें और ढील दी जा रही है.
    ऊपर जिन घपलों का ज़िक्र किया गया है उनमें से ज़्यादातर पिछली सरकार के समय से ही चालू है, लेकिन इन पर सख़्ती दिखाने का दावा करने वाली गहलोत सरकार के शासन में निजी अस्पतालों का मंसूबा ज़रा भी कमज़ोर नहीं हुआ. अलबत्ता बीमा की रक़म में हो रही लूट से अस्पतालों के पेट तो ख़ूब भर रहे हैं, लेकिन बीमा कराने वाले आम लोगों की जेब पर इसका बोझ बढ़ा दिया गया. जब योजना की शुरुआत हुई थी तो पहले साल यानी 2015-16 में 96 लाख परिवारों ने प्रीमियम के तौर पर सालाना 370 रुपए भरे. दूसरे साल यानी 2016-17 में इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ. लेकिन, वसुंधरा राजे सिंधिया ने जब 2017-18 में योजना का दूसरा चरण शुरू किया तो प्रीमियम की रक़म 370 रुपए से बढ़ाकर सीधे 1,263 रुपए कर दी गई. तमिलनाडु और महाराष्ट्र में ये आंकड़ा इससे आधा है.
    लेकिन, बीमा के तहत क्लेम की गई रक़म को देखा जाए तो हर साल इसमें बढ़ोतरी देखने को मिली है और इस बढ़ोतरी में पात्रों से ज़्यादा अस्पतालों के वारे-न्यारे हुए हैं.
    2015-16 में भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 327 करोड़ रुपए का क्लेम पेश हुआ, 2016-17 में ये आंकड़ा बढ़कर 671 करोड़, 2017-18 में 1,100 करोड़ और 2018-19 में बढ़कर 1,526 हो गया. अनुमान के मुताबिक़ 2019-20 में ये आंकड़ा बढ़कर 1,912 करोड़ हो जाएगा. जबसे कांग्रेस की सरकार बनी है, तबसे इस योजना के अंतर्गत आने वाले परिवारों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी गई है. गहलोत सरकार के दौरान देखा जाए तो उनके श 13 दिसंबर 2018 के बाद पहली तिमाही में इसमें 95.42 लाख परिवार थे, दूसरी तिमाही में इन परिवारों की संख्या बढ़कर 96.87 लाख हो गई. तीसरी तिमाही की अनुमानित संख्या 97.93 लाख है.
    ग़रीब परिवारों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलने को सरकार की क़ामयाबी में गिना जा सकता है, लेकिन दस्वातेज़ बताते हैं कि निजी अस्पतालों ने इस योजना की आड़ लेकर करोड़ों रुपए का घपला किया है. अगर सरकारी और निजी अस्पतालों द्वारा बीमा रक़म की वसूली के आंकड़ों को देखा जाए तो चौंकाने वाली तस्वीर उभरकर सामने आती है. 2015-16 में 51 फ़ीसदी क्लेम निजी और 49 फ़ीसदी क्लेम सरकारी अस्पतालों ने पेश किए. लेकिन दूसरे साल में ही पता चल गया कि निजी अस्पतालों के लिए ये वसूली का बढ़िया ज़रिया है. 2016-17 में क्लेम की गई कुल बीमा रकम में निजी अस्पतालों की हिस्सेदारी 70 फ़ीसदी, 2017-18 में 83 फ़ीसदी और 2018-19 में 85 फ़ीसदी तक पहुंच गई.
    कांग्रेस ने जिस तरह चुनाव के दौरान भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना में घपलेबाज़ी का मुद्दा उठाया, उसके बाद लग रहा था कि अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनते ही इस पर अंकुश लगेगी, लेकिन सरकारी दस्तावेज़ कुछ और ही बयां करते हैं. 1 जनवरी 2019 को द न्यू इंडिया एश्योरेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीमा कंपनी) ने करौली के पारस अस्पताल को डी-इमपैनल करने का नोटिस भेजा. अस्पताल पर आरोप था कि उसने सर्जरी किए बग़ैर फ़र्ज़ी दस्तावेज़ सौंपकर बीमा की रकम क्लेम की है. अपील के बाद राजस्थान स्टेट हेल्थ एश्योरेंस एजेंसी के सीईओ डॉक्टर समित शर्मा की अगुवाई में उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक हुई. बैठक में ये पाया गया कि लैप्रोस्कोपिक प्रोसिज़र का मरीज़ के शरीर पर निशान नहीं मिले, लेकिन अस्पताल को डी-इनपैनल करने के बजाए, बीमा कंपनी के दावों को नकार दिया गया. एशियाविल हिंदी के पास बैठक का दस्तावेज़ मौजूद है.
    इसी तरह 17 दिसंबर 2018 को गीतांजलि मेडिकल कॉलेज अस्पताल, उदयपुर को इसी तरह का नोटिस दिया. आरोप अलग थे. अपील समिति ने फिर से वही फ़ैसला सुनाया. 15 फ़रवरी 2019 को रेगन अस्पताल, जयपुर को एक दिलचस्प केस में नोटिस भेजा गया. इस अस्पताल ने एक ही एक्सरे को 14 मरीजों का एक्सरे बताकर बीमा क्लेम कर दिया. 18 मार्च 2019 को फिर से समित शर्मा की अगुवाई में बैठक हुई. अस्पताल ने बताया कि मशीन ख़राब हो गई थी. समिति ने मान लिया. अस्पताल पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. ये तीनों अस्पताल अब भी बीमा के लिए इमपैनल्ड हैं.
    भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना में गड़बड़ियों को लेकर मीडिया के अलग-अलग हिस्सों में टुकड़ों में दर्जनों रिपोर्ट्स प्रकाशित हुई हैं, लेकिन ना सरकार पर कोई असर पड़ा और ना ही अस्पतालों पर. एशियाविल हिंदी के पास इसमें हुई गड़बड़ियों के पुख़्ता काग़ज़ात हैं. अगली किश्त में आप पढ़ेंगे किस तरह अस्पतालों ने फर्जीवाड़ा कर बीमा क्लेम किया और किस तरह अपीलीय अधिकारियों ने बीमा कंपनी के दावे को सही मानने के बावजूद ‘तकनीकी’ आधार पर अस्पताल पर कार्रवाई से इनकार कर दिया.

(एशिया विल से साभार)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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