राजस्थान: कांग्रेस का नहीं बल्कि पोपाबाई का राज..

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प्रदेश में रिश्वतखोरी और अराजकता चरम पर
अशोक गहलोत का प्रशासन से नियंत्रण खत्म

-महेश झालानी॥

राजस्थान में एक बार फिर से पोपाबाई का राज कायम होगया है । अशोक गहलोत जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब भी पोपाबाई ने राज पर कब्जा कर लिया था । वहीं स्थिति फिर पैदा होगई है । प्रशासन से गहलोत की पकड़ लगभग समाप्त होगई है और राज भगवान के भरोसे चल रहा है । अफसर, मंत्री और जन प्रतिनिधि निरंकुश होकर जनता को निर्मम तरीके से गन्ने के माफिक निचोड़ रहे है ।

कोई ऐसा विभाग नही जहां रिश्वत और लूटपाट का बोलबाला नही हो । पीसीसी से लेकर सरकारी दफ्तरों में दलाल काबिज होते जा रहे है । एसीबी, पुलिस, जेडीए, परिवहन, आबकारी और चिकित्सा विभाग तो पूरी तरह भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है । जन सम्पर्क विभाग के बारे में कुछ भी कहना बेकार है । लूट का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है यह महकमा । फर्जी विज्ञापनों के जरिये सरकार की बेरहमी खाल उतारी जा रही है । आयुक्त भी मजे में तो मंत्री भी । पूरे प्रदेश में अफसर और मंत्रियो की निरंकुशता से त्राहि त्राहि मची हुई है । जब तक गहलोत अपने निवास और कार्यालय से डकैतों को धक्का मारकर बाहर नही करेंगे, तब तक मुख्यमंत्री की इसी प्रकार बदनामी होती रहेगी ।

भ्रष्टाचार का ऐसा तांडव पहले कभी देखने को नही मिला । यही वजह है कि छह माह पहले काबिज हुई कांग्रेस लोकसभा चुनाव में क्लीन बोल्ड होगई । सारे खिलाड़ी जीरो पर आउट होगये । महारानी से तो साल-दो साल में लोग परेशान हुए थे । लेकिन गहलोत छह माह में ही जनता के लिए विलेन साबित हो रहे है । इस बात की होड़ मची हुई कि कौन ज्यादा जनता को लूट सकता है । हारने से गहलोत और कांग्रेसियों को सबक लेना चाहिए था । सबक लेना तो दूर रहा, ये पहले से ज्यादा आक्रमक और अमर्यादित होगये है ।

मुख्यमंत्री का अधिकांश समय पायलट को निपटाने में व्यतीत हो रहा है । बेटा बुरी तरह से पराजित क्या होगया, गहलोत की बौखलाहट बढ़ती ही जा रही है । मुख्यमंत्री बनने के बाद से उनकी बौखलाहट भी बढ़ी है और क्रोध भी। बात बात में उत्तेजित होना गहलोत का स्वभाव बन गया है ।अराजकता में गहलोत ने महारानी को मीलों पीछे छोड़ दिया है । आम जनता की ना तो कहीं सुनवाई हो रही है और ना ही उनके खतों का जवाब दिया जा रहा है । अपंग और अपाहिज प्रशासन से जनता को कोई राहत मिलेगी, इसकी उम्मीद करना बेमानी है । कराहती हुई जनता आखिर जाए तो जाए कहां ?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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