कांग्रेस के बड़े नेताओं को सबक सिखाना चाहते हैं राहुल गांधी

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-शकील अख्तर॥

राहुल गांधी ने कांग्रेस को ठीक से झकझोर दिया है। हवा में उड़ते पत्तों की तरह कांग्रेसी नेताओं की समझ में नहीं आ रहा है कि उनका क्या होगा। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं को पार्टी की चिन्ता नहीं है उन्हें फिक्र यह है कि वे अब गणेश परिक्रमा किस की करेंगे। राहुल भी जानते हैं कि आरामतलबी के शिकार इन कांग्रेसी नेताओं के भरोसे पार्टी फिर से खड़ी नहीं होगी। तो ऐसे में उन्हें उनकी हैसियत क्यों न दिखा दी जाए! कांग्रेस मूलत: तीन स्तंभों पर खड़ी पार्टी है। एक पार्टी का नेतृत्व यानी गांधी नेहरू परिवार, दूसरे कार्यकर्ता और तीसरे देश भर में फैले पार्टी के सिम्पेथाइजर (हमदर्द)। राहुल मूलत: अपने कार्यकर्ताओं को ही संदेश देना चाहते हैं कि कांग्रेस को बचाने के लिए उन्हें ही मजबूती से खड़ा होना होगा। राहुल पिछले 15 साल से देश भर में घूम रहे हैं। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की ताकत देखी है।

बुंदेलखंड के गांव में एक नौजवान कार्यकर्ता राहुल को अपने कच्चे घर में ले गया। वहां उसने आवाज लगाई बऊ ( दादी के लिए वहां का आम संबोधन ) बब्बा (दादा) की संदूकची कहां हैं? अंदर से धोती से सिर ढांके दोहरी कमर की बुजुर्ग महिला एक छोटी सी बक्सिया लेकर आई। राहुल आश्चर्य में कि इसमें क्या है? बुजुर्ग महिला ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा कि जे पंडत जी संपत्ति है। पंडित जी मतलब नौजवान के दादा और महिला के स्वर्गीय पति। कांपते हाथों से महिला ने संदूकची खोली। राहुल भावुक हो गए। अंदर बड़े सलीके से खादी की एक धोती, कुर्ता, एक अंगोछा और गांधी टोपी रखी थी। और इन सबके उपर एक तिरंगा। भावना के आवेग में बऊ की आवाज अवरुद्ध होने लगी बोलीं जई पैन के झंडा लेकर कांग्रेस की रैली में जाते थे।

यही कांग्रेस की संपत्ति है। यही राहुल की ताकत है। आज जब लगातार दूसरी बार कांग्रेस की इतनी बुरी तरह हार हुई है और उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े राज्यों में उसे सत्ता से बाहर हुए तीस साल हो रहे हैं तब भी शायद
ही देश में कोई ऐसा गांव हो जिसमें एकाध ऐसा समर्पित कांग्रेस परिवार न हो। हालांकि ऐसे लोग लगातार कम और कमजोर होते चले जा रहे हैं। मगर अभी भी बचे हैं।

ऐसी ही कहानी पार्टी के समर्थकों (सिम्पेथाइजर) या वोटरों की है। भयानक हार में भी 12 करोड़ से ज्यादा वोट कांग्रेस को मिले हैं। राहुल जानते हैं कि ये वोट उन मूल्यों और उसूलों के लिए हैं जिन पर कांग्रेस खड़ी है। और राहुल अपने नेताओं से बात तक न करके इन्हीं कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संदेश दे रहे हैं कि जिन समावेशी मूल्यों के लिए तुम समर्थन दे रहे हो मैं उनके लिए ही लड़ रहा हूं।

राहुल किससे लड़ रहे हैं। और क्यों इस लड़ाई को इतना लंबा तान रहे हैं? इसलिए क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर उनकी मांग के अनुरूप कोई गांधी परिवार के बाहर का व्यक्ति जिम्मदारी संभाल भी लेता है तो ये कार्यकर्ता और सिम्पेथाइजर उन्हीं में कांग्रेस देखेंगे। पहले भी कई बार यह बात साबित हो चुकी है कि कांग्रेस में पावर वहीं रहती है जहां गांधी नेहरू परिवार होता है। इंदिरा जी ठीक पचास साल पहले यह सफल प्रयोग करके देख चुकी हैं। कांग्रेस के विरोध में ही राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करके अंतरात्मा की आवाज पर उसे जिता भी चुकी हैं। 1969 में इंदिरा गांधी ने बता दिया था कि जहां परिवार है कांग्रेस वहीं है। कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार थे नीलम संजीव रेड्डी और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके खिलाफ वीवी गिरि को चुनाव लड़वाकर उन्हें राष्ट्रपति बनवा दिया। पुराने कांग्रेसी नेताओं ने इस हार से बौखलाकर इंदिरा गांधी को ही पार्टी से निकाल दिया मगर कार्यकर्तओं ने इंदिरा को ही अपना नेता माना। उस समय कांग्रेस के बड़े नेता मोरारजी देसाई, संजीव रेड्डी, निर्जलिंगप्पा, एसके पाटिल , कामराज इंदिरा जी को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहते थे। नेताओं के इस ग्रुप को सिंडिकेट कहा जाता था। मगर इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके ऐसा पांसा फैंका कि सारी बाजी पलट गई। कांग्रेस का सत्तर साल का इतिहास यही बताता है कि गांधी परिवार के बिना फिलहाल कांग्रेस की गति नहीं है।

हालांकि कांग्रेस के 134 साल के इतिहास में तो ज्यादातर गांधी, नेहरू परिवार के बाहर के ही नेता अध्यक्ष रहे। और आजादी के बाद 30 साल तक भी बाहर के नेता रहे मगर 1980 के दशक से कांग्रेसी सत्ता का केन्द्र यह
परिवार ही बना रहा। 1992 से 1998 तक जब पीवी नरसिंम्हा राव और सीताराम केसरी पार्टी के अध्यक्ष रहे तब भी कांग्रेसी 10 जनपथ के आसपास ही घूमते
रहते थे। 1998 में सोनिया गांधी के कांग्रेस का नेतृत्व संभालने के पहले तक कांग्रेसी नेता चाहे प्रधानमंत्री नरसिम्हा से या बाद में केसरी से फायदे जो चाहे उठाते रहें मगर अपना नेता वे सोनिया को ही मानते रहे।
कांग्रेस के इस इतिहास को राहुल जानते हैं। और यह भी जानते हैं कि दो साल पहले उन्हें अध्यक्ष बनाने का कांग्रेस के कौन कौन नेता विरोध करते रहे हैं। कांग्रेस के मुख्यालय में पिछले पांच साल से बैठे बड़े पदाधिकारियों में से कितने ही नेता ऐसे हैं जो राहुल के खिलाफ गुपचुप अभियान चलाते रहे हैं।

आज राहुल को मौका मिला है तो वह सबके सामने यह बात लाना चाहते हैं कि पार्टी कैसे चलेगी यह उन्हें कोई नहीं बताए। यहां इस क्रुएशल मोड़ पर जो लोग धीमे स्वर में प्रियंका गांधी की बात कर रहे हैं उन्हें नहीं मालूम
कि राहुल ने सीडब्ल्यूसी में इस्तीफा देते हुए जो यह कहा कि “प्रियंका का नाम मत लेना” वह प्रियंका के कहने से ही बोला था। प्रियंका जानती थीं कि राहुल के इस्तीफे के बाद कांग्रेसी उनसे अपीलें करने लगेंगे। राहुल के
इस्तीफे का गम इन्हें कम होगा प्रियंका के आने की संभावना से खुश ज्यादा होंगे। कांग्रेसियों को अपना भविष्य प्रियंका में ही नजर आता है। मगर फिलहाल प्रियंका राहुल को ही अध्यक्ष बनाए रखने की कोशिशों में लगी हैं। और परिवार को नजदीक से जानने वाले जानते हैं कि राहुल अगर किसी की बात मानते हैं तो वह छोटी बहन प्रियंका की ही। प्रियंका खुद ज्यादा जिम्मेदारी लेने के लिए भी तैयार दिख रही हैं मगर अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ। और यही वह फार्मूला है जो राहुल को वापस काम पर ला सकता है।
Shakeel Akhtar

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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