राजीव गांधी और राजनीति के पेंच

Page Visited: 796
0 0
Read Time:13 Minute, 8 Second


-प्रकाश के राय॥

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कामकाज पर बहुत कुछ अच्छा और ख़राब कहा जा सकता है, लेकिन इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें कई त्रासदियों से गुज़रना पड़ा. पद संभालने के साथ उन्होंने इंदिरा गांधी के क़रीबी कद्दावर नेताओं को हाशिये पर डाला जिनमें प्रणब मुखर्जी और नरसिम्हा राव भी शामिल थे. उनके सहयोगियों में दो तरह के लोग ख़ास थे- एक समूह जो संजय गांधी का नज़दीकी रहा था (वीपी सिंह, वीसी शुक्ला, अरुण नेहरू आदि) तथा दूसरा समूह जो उनके स्कूल-कॉलेज के परिचित थे (अरुण सिंह, सुमन दूबे आदि).

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में जो क़त्लेआम हुआ, उसके सरगना संजय गांधी के ही चट्टे-बट्टे थे. उनसे कभी राजीव गांधी पीछा नहीं छुड़ा सके. जब पार्टी और सरकार के भीतर असंतोष उभरा, तो संजय गांधी गुट के लोगों ने ही विरोध का झंडा बुलंद किया- वीपी सिंह, अरुण नेहरू, वीसी शुक्ला आदि. दून स्कूल में साथी रहे अरुण सिंह ने भी संकट के समय साथ छोड़ दिया था.

उस समय के घटनाक्रम से परिचित लोगों को पता होगा कि तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह से राजीव गांधी के तनावपूर्ण संबंध रहे थे. सिंह भी संजय गांधी के नज़दीकी थे. साल 2015 में सेना में बड़े पद पर रहे लेफ़्टिनेंट जेनरल पीएन हूण ने अपनी किताब में दावा किया था कि 1987 में तत्कालीन सेनाध्यक्ष के सुंदरजी और सेना के उपाध्यक्ष एसएफ़ रोड्रिग्ज ने राजीव गांधी का तख़्तापलट की कोशिश की थी. लेकिन इस दावे में कोई दम मालूम नहीं पड़ता है. रोड्रिग्ज बाद में सेनाध्यक्ष भी बने थे. लेकिन, जानकारों की मानें, तो तब कुछ ऐसे लोग ज़रूर सक्रिय थे जो राष्ट्रपति पर सरकार को हटाने के लिए दबाव डाल रहे थे. मोहन गुरुस्वामी के अनुसार, इंडियन एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका यह काम एस गुरुमूर्ति और अरुण जेटली की सलाह पर कर रहे थे. इन लोगों ने एक पत्र भी तैयार कर लिया था जो राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को हटाते समय इस्तेमाल करते. गुरुस्वामी कहते हैं कि अरुण शौरी ने इसका ज़ोरदार विरोध किया और इन्हें पीछे हटना पड़ा. इस पूरे प्रकरण में सेना की कोई भूमिका नहीं थी.

इसी बीच शाहबानो प्रकरण से और बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर राजीव गांधी दोनों समुदायों की कट्टरपंथी जमातों के हाथ में खेल चुके थे. पद संभालने के एक साल के भीतर वे हिंदुस्तान की सियासत के चक्रव्यूह में फंसाये जा चुके थे. उनसे यह सब करानेवाले बहुत जल्दी ही उन्हीं पर वार करनेवाले थे.

बहरहाल, समाजवादियों और पूर्व कांग्रेसियों के जनता दल का गठन हुआ, जो 1989 में कम्यूनिस्टों और संघियों के समर्थन से सत्तारुढ़ हुआ. वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनते ही लालकृष्ण आडवाणी की सलाह पर जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बना कर भेजा जिनके जाते ही वहां तबाही का हौलनाक सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है. जगमोहन भी संजय गांधी के बेहद क़रीबी रहे थे और आपातकाल में दिल्ली में क़हर बरपाने के लिए कुख्यात थे. आपातकाल के एक और खलनायक माने जानेवाले अधिकारी नवीन चावला को वाजपेयी सरकार के दौरान अहम पद मिले और वे बाद में देश के निर्वाचन आयुक्त भी बने.

ख़ैर, लिट्टे विद्रोहियों ने 1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी, पर यह सवाल आज भी बना हुआ है कि क्या हत्या के पीछे कोई बड़ा षड्यंत्र था जिसमें कुछ बड़े भारतीय नेता और अधिकारी शामिल थे. जैन कमीशन की रिपोर्ट में कुछ लोगों पर उंगली उठायी गयी है. राजीव गांधी की त्रासदी को ठीक से समझने की ज़रूरत है और उस समझ से सबक लेने की भी ज़रूरत है.

इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के मालिक रामनाथ गोयनका द्वारा तत्कालीन राष्ट्रपति पर राजीव गांधी को हटाये जाने के दबाव के मसले पर कुछ और बातें जोड़ना जरूरी है. गोयनका पर वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीज की एक अहम किताब है. जिन्हें दिलचस्पी हो, वे जरूर पढ़ें. वर्गीज कुछ समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सलाहकार भी रहे थे. इस किताब की समीक्षा करते हुए वीर सांघवी ने भी बहुत अच्छी जानकारियां दी थीं. सांघवी भी संपादक रह चुके हैं और राडिया टेप विवाद में चर्चित भी हुए थे. खैर, राजीव गांधी के जमाने में गोयनका अपने अख़बार के जरिये धीरूभाई अंबानी के खिलाफ अभियान छेड़े हुए थे. सांघवी ने लिखा है कि इसमें अख़बार का संपादकीय विभाग उतना सक्रिय नहीं था, जितनी सक्रिय गोयनका की अपनी ख़ास मंडली थी. इस मंडली में उनके अकाउंटेंट और सलाहकार एस गुरुमूर्ति, बॉम्बे डाइंग के नुस्ली वाडिया, एक्सप्रेस से बाहर के एक पत्रकार मानेक डावर, अंबानी-विरोधी कारोबारी जमनादास मूरजानी प्रमुख थे. गुरुमूर्ति इन दिनों दक्षिण भारत में संघ-भाजपा राजनीति के प्रमुख सूत्रधार हैं तथा रिज़र्व बैंक में निदेशक हैं.

जैसा कि सांघवी ने भी लिखा है, और मेरी भी सहमति है कि सीधे तौर पर गोयनका को संघ-भाजपा का आदमी बताना ठीक नहीं होगा, लेकिन उनके रवैये से सिर्फ और सिर्फ भाजपा को राजनीतिक फ़ायदा मिला. एक्सप्रेस की हड़ताल तुड़वाने में उन्हें संघ के काडरों की मदद लेने से परहेज़ नहीं था. उनके सबसे करीबी दोस्त नानाजी देशमुख और ग्वालियर की राजमाता थीं. गुरुमूर्ति उनके मुख्य सलाहकार थे. उनके एक और सलाहकार और डॉक्टर जेके जैन थे जिन्होंने बाद में जैन टीवी भी शुरू किया था. उनके सबसे मशहूर संपादक अरुण शौरी थे. अरुण जेटली उनके वकील थे, जिन्हें वीपी सिंह सरकार के तहत कानूनी काम भी मिले थे. गोयनका को जाननेवाला कोई भी बता सकता है कि वे कम्युनिस्टों को पसंद नहीं करते थे.

ऊपर जिस पत्र (जो राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री को भेजा जाना था) का ज़िक्र हुआ है, बकौल सांघवी, वह पत्र गुरुमूर्ति और मुलगावकर ने लिखा था. पत्रकारिता के तमाम मानदंडों को शीर्षासन कराते हुए गोयनका के अख़बार ने वह पत्र स्कूप के रूप में छाप दिया. लेकिन, उधर एक मज़ेदार चीज हो चुकी थी. राष्ट्रपति ने उसमें बदलाव करके प्रधानमंत्री को भेजा था. राजीव गांधी ने दिल्ली के सुंदर नगर स्थिर एक्सप्रेस के गेस्ट हाउस पर छापा डलवा दिया और उसमें वह चिठ्ठी पकड़ा गयी. चिठ्ठी में मुलगावकर की हस्तलिपि में कुछ फ़ेर-बदल किया गया था. अपने कार्यकाल के आख़िरी एक-डेढ़ साल में राजीव गांधी सरकार ने बेमतलब एक्सप्रेस पर इतना दबाव बनाया कि वह अख़बार सरकार विरोध का केंद्र बन गया. लेकिन अखबार भी अब अख़बार न रहकर सरकार के खिलाफ पर्चाबाज़ी का जरिया बन गया था.

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गोयनका के रिलायंस विरोध के साथ सरकार के वरिष्ठ मंत्री वीपी सिंह भी जुगलबंदी कर रहे थे. वे और उनके सचिव कंपनी के खिलाफ जांच-पर-जांच बिठाये जा रहे थे. यह कहानी फिर कभी कि कैसे अंबानी भाईयों ने अपनी चतुराई से विमल और बॉम्बे डाइंग के झगड़े को सरकार के भीतर की उठापटक में बदल दिया और खुद किनारे खड़े होकर मजे लेने लगे. इस लड़ाई में गोयनका धीरूभाई का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके. अब उन्हें घमंड की भरपाई के लिए सरकार को हटाने का काम लेना पड़ा. यह भी मज़ेदार है कि इंदिरा गांधी के आख़िरी दिनों में वे उन्हें पसंद करने लगे थे और राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर संतोष जाहिर किया था. धीरूभाई भी उनके एक समय में बड़े घनिष्ठ थे, पर बात किसी बात पर बिगड़ गयी थी.

खैर, गोयनका के इस कथित साहसी पत्रकारिता में यह भी हुआ कि तांत्रिक चंद्रास्वामी उनके घरेलू मित्र बन गये. बोफ़ोर्स के विवाद के समय आल्तू-फ़ाल्तू सनसनी जो एक्सप्रेस में छपता था, वह इसी चंद्रास्वामी के मार्फ़त आता था. बोफोर्स का असली मामला तो द हिंदू ने उजागर किया था, एक्सप्रेस उस पर नमक-मिर्च लगाता था.

एक आख़िरी बात वीपी सिंह के बारे में. अमिताभ बच्चन के इलाहाबाद के सांसद के तौर पर इस्तीफा देने के बाद वीपी सिंह ने जनमोर्चा के गुलाबी पताका के तले उपचुनाव लड़ा था. राजा माण्डा ने कहा था कि सादगी से चुनाव लड़ेंगे. तब एक्सप्रेस के लिए ही रिपोर्टिंग कर रही विद्या सुब्रहम्ण्यम ने उस चुनाव के बारे में बहुत दिलचस्प ब्यौरा लिखा है. भले ही वीपी सिंह ने संघ-भाजपा को उस चुनाव से अलग रखा हो, पर चुनाव का साजो-सामान संघ-भाजपा ने मुहैया कराया था. हुआ यूं कि तब रिपोर्ट भेजने के लिए डाकखाने जाना होता था. वीपी सिंह के साथ खड़े इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली दफ्तर से विद्या को कहा गया कि वे भाजपा के नेता केसरीनाथ त्रिपाठी के घर से फोन पर रिपोर्ट फ़ाइल कर दें. जब वे नेता के यहां पहुंची तो उन्होंंने देखा कि वहां एक कमरे में वीपी सिंह के प्रचार का सब सामान रखा हुआ है. त्रिपाठी जी बाद में उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हुए और आजकल वे बंगाल में राज्यपाल हैं. विद्या ने लिखा है कि बहुत बाद में संघ के गोविंदाचार्य ने उन्हें बताया था कि कैसे संघ ने वीपी सिंह के उपचुनाव की ठोस तैयारी की थी.

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram