पुलिस वालों द्वारा राहजनी के संकेत मिलते हैं विवेक तिवारी की हत्या के पीछे

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-सुरेंद्र ग्रोवर॥

लखनऊ में हुई विवेक तिवारी की हत्या न तो फेक एनकाउंटर है और न ही सेल्फ डिफेन्स में चलाई गई गोली से हुई मौत. इस मामले को ग़ौर से देखने  पर पता चलता है कि मामले के पीछे कुछ पुलिस वालों द्वारा रात के अंधेरे में की जाने वाली सशस्त्र राहजनी के संकेत मिलते हैं.

तथ्यों पर ध्यान दीजिये.

 दोनों हत्यारे पुलिसकर्मी उस वक़्त ड्यूटी पर नहीं थे, अगर वे उस समय गश्त पर होते तो थाने के रोजनामचे में दर्ज होता कि वे फलाने इलाक़े में गश्त पर तैनात किये गये हैं. इसके साथ ही उनकी रवानगी दर्ज होती. जोकि नहीं है..

 दोनों हत्यारे पुलिस वाले वर्दी में नहीं थे.

 ये ग़ैरक़ानूनी हथियारों से लैस थे.

यह तीन मोटे मोटे तथ्य इन दोनों हत्यारों की मंशा स्पष्ट करते हैं कि इनका इरादा लूटपाट करने का था और दोनों ने विवेक तिवारी को अपना शिकार बनाने का प्रयास किया था जिसे विवेक भाँप गया और उसने गाड़ी नहीं रोकी.. हो सकता है कि इन राहजनों से बच निकलने की कोशिश में लुटेरों की बाइक पर उसकी गाड़ी लग गई हो.. जब राहजनों ने उसे बच निकलते देखा तो उस पर फ़ायर कर दिया.. इन राहजनों के पास उस वक़्त इतना मौक़ा नहीं था कि पलक झपकने जितने समय में जेब से पिस्टल निकाल फ़ायर कर पाते यानि पिस्टल पहले से हाथ में थी जिसे दिखला कर ही विवेक तिवारी की गाड़ी रोकने की कोशिश की गई पर तिवारी के विवेक ने उसे रूकने न दिया और हत्यारों ने उस पर गोली चला दी.

स्थानीय निवासियों का भी कहना है कि यह दोनों सिपाही रोज रात को आने जाने वालों को रोक वसूली करते थे और इनके सबसे बड़े शिकार युगल जोड़ी होती थी, भले ही वे भाई बहन ही क्यों न हो.

यूपी पुलिस भी इस मसले को अलग दिशा में ले जा यही है और मीडिया भी इसे सही नज़रिये से नहीं देख पा रहा, जबकि ज़रूरत है असल तथ्यों के मद्देनज़र जाँच करने की.

इस मामले की यदि सीबीआई जाँच करवाई जाये तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा और लेखक द्वारा सामने लाये गए तथ्यों की पुष्टि भी हो जाएगी.

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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