देश के राफ़ेल डील पर प्रधानमंत्री मोदी के इस्तीफ़े का इंतज़ार है..

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प्रशांत टण्डन॥

अप्रेल,1987 में स्वीडिश रेडियो ने खुलासा किया था कि बोफोर्स सौदे में बिचौलिया था और कमीशन दी गई थी. इसके बाद देश की राजनीति में तूफान खड़ा हो गया और राजीव गांधी चुनाव हार गए थे. सरकारे उनकी बनी जिन्होने आरोप लगाये थे, बरसों मुकदमा चला लेकिन राजीव गांधी पर आरोप सिद्ध नहीं हो पाये. बोफोर्स तोप बनाने वाली कंपनी नोबेल इंडस्ट्रीज़ आज भी ब्लैकलिस्टेड है.

घूस लेने के आरोप कभी भी साबित नहीं हो पाये, बोफोर्स घोटाले के लगभग सभी किरदार अब इस दुनिया में नहीं है इसके बावजूद तीन दशक बाद आज भी गांधी परिवार को इसका बोझ उठाना पड़ता है.

राफ़ेल में तो फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद जिन्होने समझौते में हस्ताक्षर किये थे उन्होने ही कह दिया कि बिचौलिया या पार्टनर प्रधानमंत्री मोदी ने खुद तय किया था. अनिल अंबानी की कंपनी को बीच मे लाने का फैसला प्रधानमंत्री मोदी का था और इसमे फ्रांस की सरकार और राफ़ेल बनाने वाली कंपनी डास्सौ का कोई रोल नहीं था, उन्हे दूसरा विकल्प ही नहीं दिया गया.

इस बात की गंभीरता इसलिये ज्यादा है कि आरोप की पुष्टि राफ़ेल करार के दूसरे पक्ष की तरफ से हुई है जो उस वक़्त फ्रांस के राष्ट्रपति थे. ओलांद के मीडियापार्ट वेबसाइट को दिये बयान के बाद अब तो इसमे जांच की क्या गुंजाइश बचती है? अब ये न विपक्ष का आरोप है और न किसी मीडिया का खुलासा. ओलांद ने सरकार के बचाव में दिये गए अब तक के सभी बयानों को झूठा साबित कर दिया है.

आरोप जब राजनीति और सरकार में बैठे उच्च पदो पर बैठे लोगो पर लगे हों तब कानून से ज्यादा नैतिकता का तक़ाज़ा होता है. हाल फिलहाल की राजनीति में भी आडवाणी और सोनिया गांधी ने इसकी मिसाल कायम की है. जैन हवाला कांड में आरोप लगाने के बाद आडवाणी ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दिया था और जब तक क्लीन चिट न मिल जाये तब तक चुनाव न लड़ने का फैसला किया था. सोनिया गांधी ने भी NAC की अध्यक्षा होने के नाते लाभ के पद का आरोप लगा था. आरोप के अगले दिन ही उन्होने लोकसभा की सदस्यता और NAC दोनों से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ा था.

नरेंद्र मोदी को अपनी राजनीतिक साख और पद की गरिमा बचाने के लिये प्रधानमंत्री पद से फौरन इस्तीफा दे देना चाहिये – दूसरे विकल्प उनके अपने, प्रधानमंत्री पद, बीजेपी और एनडीए सभी के लिये बहुत तकलीफदेह साबित होंगे.

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