मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं

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-त्रिभुवन||
अगले साल होने वाले आम चुनाव नज़दीक आ रहे हैं और देश का राजनीतिक परिदृश्य बहुत ही रोचक हो गया है। ख़ासकर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी ने इस परिदृश्य में कई रंग भर दिए हैं। मैं प्रसिद्ध टीवी शो “टाॅम ऐंड ज़ेरी” का बहुत शौकीन रहा हूं और मेरे बच्चों ने यह शो मुझे बहुत ही दिखाया है। आज ऐसा लगता है कि टॉम सिर्फ़ टॉम नहीं रह गया है। उसने जे़री की तेजतर्रार बुद्धि का भी हरण कर लिया है और जे़री बेचारा टॉम की तरह बुद्धू बनकर रह गया है। वह बार-बार कोशिशें करता है, लेकिन टॉम कितनी चतुराई से अपनी ग़लतियों पर पर्दा डालकर जे़री को छका देता है। लगता है, भारतीय राजनीति के टॉम और जे़री को देखकर “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” जैसे महान इंजीनियर भी हँस रहे हैं!

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं; क्योंकि देश के प्रतिपक्ष का सबसे बड़ा नेता और जो युवा और सुशिक्षित भी है, उनका नाम ठीक से उच्चारित नहीं कर सकता। एक भाषण में पांच बार कोशिश करके भी। देश के प्रधानमंत्री इस युवा नेता को यह चुनौती दे रहे हैं कि वह देश के उस प्रतिष्ठित इंजीनियर का नाम बोलकर दिखा दें, जिसे उनके पिता के नाना की सरकार ने 1955 में भारत रत्न दिया था।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं; क्योंकि 133 साल पुरानी एक पार्टी का 48 वर्षीय युवा नेता एक नाम भी ठीक से नहीं ले सकता और जो उसका उपहास उड़ा रहा है और जिसे अपने उच्चारण का बहुत भरोसा है, वह हर शब्द ही अनुनासिक बनाकर बोलता है। वह “मित्रो” को अपने हर भाषण में “मित्रों” कहता है और संबोधन अभिव्यक्ति का नियम भूल जाता है, जो कि इस देश के हर सरकारी स्कूल की तीसरी कक्षा से पढ़ाई जाती है। हालांकि बहुत से लोग यहां भी “मित्रो” और “मित्रों” को लेकर लंबी बहस कर सकते हैं, क्योंकि हमारे यहां उच्चारण कोई गंभीर विषय ही नहीं है।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं; क्योंकि एक आदमी जो बिना देखे पढ़ने का दावा करता है, वह मिसिज़ सिरीसेना के Mrs हिज्जों को मिसिज़ के बजाय पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने एमआरएस पढ़ता है और अपनी ग़लती भी नहीं सुधारता। इसे कहते हैंं आत्मविश्वास। वह तक्षशिला को बड़े गर्व से बिहार में बता देते हैं और झेंपते भी नहीं हैं। वे चंद्रगुप्त मौर्य को गुप्तकाल का योद्धा घोषित करते हैं और तालियां बटोरते हैं। मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं; क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि 1947 में एक “रुपीया” एक डॉलर के बराबर हुआ करता था, जबकि दुनिया जानती है कि उन दिनों डॉलर नहीं, पाउंड अंतरराष्ट्रीय मुद्रा थी और एक रुपया करीब 30 सेंट के बराबर हुआ करता था।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं; क्योंकि देश का एक बहुत बड़ा नेता बता रहा है कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी गुजराती थे। और तो और मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं; क्योंकि बिना काग़ज़ पर लिखा हुआ देखेे निधड़क बोल रहे नेताजी इतिहास की यादें ताज़ा करते हुए बता रहे हैं कि बिहार के बहादुर लोगों ने सिकंदर के दांत खट्‌टे कर दिए थे। मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या अपना सिर खुजा रहे हैं कि आखिर उनके समय तो इतिहास में यही पढ़ाया जाता था कि सिकंदर को पौरस ने झेलम के पास ही रोक दिया था और वह वहीं से वापस लौट गया था। उसे तो गंगा पार करने की भी नौबत नहीं आई।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं; क्योंकि मोहनलाल गांधी और लाल दरवाज़ा तो सामान्य बातें हैं, लेकिन अगर 1885 में बने किसी दल को 1857 में हुई क्रांति में ग़लत भूमिका के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए तो शायद इस बात पर ठहाका भी लगाया जा सकता है।

लेकिन मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या ज़ोर-ज़ोर से हँस रहे हैं; क्योंकि इतनी चूकें करने के बाद भी एक नेता का विश्वास नहीं डिगता और वह मैदान में पूरे आत्मविश्वास से डटा रहता है और दूसरा अकबर रोड के अपने शयनकक्ष में हिन्दी के कुछ उद्घोषकों के सामने पहली कक्षा के किसी बच्चे की तरह “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” रट रहा है, क्याेंकि उसे गली के सबसे बदमाश बच्चे ने एक उच्चारण भर की चुनौती देकर मॉनिटर बनने से मानो रोक दिया है!

आप कल्पना कर सकते हैं कि राहुल गांधी की रातें इन दिनों कैसे गुजर रही होंगी : “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” का समवेत पाठ करते हुए! कमरे में घूम-घूमकर! मैं कल्पना कर सकता हूं, क्योंकि तीसरी कक्षा में “मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या” जी का पाठ मेरी किताब में भी था और मेरे लिए इसे उच्चारित करना एक टेढ़ी खीर था।

(वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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