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शंकराचार्य का बेहद आदर करता था टीपू सुल्तान..

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-अरुण प्रकाश मिश्र||

मैसूर की अधिकांश आबादी हिन्दू थी। टीपू सुलतान के दरबार में ऊंची से ऊंची पदवियां हिन्दूओं को मिली हुई थी। उसके दो मुख्यमंत्री पुर्निया और कृष्णराव ब्राम्हण थे, जिनमें पुर्निया उनका प्रधानमंत्री था। इन दोनों मंत्रियों का प्रभाव उस समय अत्यन्त बढ़ा हुआ था। इनके अलावा बेशुमार ब्राम्हण टीपू के दरबार में खास कर राजदूतों का काम करने और दरबार में लोगों का परिचय कराने नियुक्त थे।

एक बार मलाबार तट की हिन्दू नय्यर जाति के कुछ लोगों ने अपने ईसाई मत स्वीकार करने या न करने के विषय में टीपू सुलतान से सलाह मांगी। टीपू ने उत्तर दिया:

“राजा प्रजा का पिता होता है। इस हैसियत से मेरी आपको सलाह है कि आप लोग अपने पूर्वपुरुषों के मज़हब(यानी हिन्दू मज़हब) पर कायम रहें; और यदि आपको अपना मज़हब बदलने की इच्छा है ही, तो आप (ईसाई होने की जगह) अपने पितातुल्य राजा का मजहब स्वीकार करें।”

जगद्गुरु श्री शंकराचार्य के नाम टीपू का पत्र-

जगद्गुरु श्री शंकराचार्य का श्रृंगेरी में राज्य था। टीपू उस समय के श्रृंगेरी स्वामी जगद्गुरु श्री शंकराचार्य श्री सच्चिदानन्द भारती का बहुत अधिक आदर करता था। जगद्गुरु के नाम टीपू सुलतान के समय-समय पर भेजे हुए तीस से ऊपर पत्र इस समय मौजूद हैं जो अत्यंत मानसूचक शब्दों में लिखे हुए हैं।

मैसूर राज्य के पुरातत्त्व विभाग के डायरेक्टर द्वारा दो मूल पत्रों की फोटो, जो कन्नड़ भाषा में है।
पत्र का हिन्दी भाषान्तर इस प्रकार है:

(मोहर टीपू सुलतान)

श्रीमत् महाराज परमहंसादि यथोक्त विरुदांकित श्रृंगेरी श्री सच्चिदानन्द भारती जी महाराज की सेवा में टीपू सुलतान बादशाह का सलाम।
श्री महाराज के लिख कर भेजे हुए पत्र से सकल अभिप्राय विदित हुआ। आप जगद्गुरु हैं, सर्वलोक के क्षेम और सबकी स्वस्थता के हित आप तपस्या करते रहते हैं। ऐसे ही दया कर इस सरकार के क्षेम और उसकी उत्तरोत्तर अभिवृद्धि के लिए तीनों काल में तपस्या करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करने की कृपा कीजिए। आप-जैसे महापुरुष जिस देश में निवास करते हैं, उस देश में वर्षा अच्छी होती है, कृषि फूलती-फलती है और सदा सुभिक्ष रहता है। आप इतने अधिक दिनों तक परदेश में क्यों रह रहे हैं? जिस उद्देश्य से श्री महाराज वहां गए हैं, उसे शीघ्र अपने अनुकूल सिद्ध करके अपने स्थान को वापस आने की कृपा कीजिए।
ता. 29, महिना राजी साल सहर सन 1220 महम्मदी, तदनुसार परिधावी संवत्सर माघ कृष्णा चतुर्दशी, लिखा हुआ सुब्राउ मुन्सी हुजर।
(हस्ताक्षर टीपू सुलतान)

यह पत्र सन 1793 ई. का उस समय का लिखा हुआ है, जब कि जगद्गुरु किसी कार्यवश कुछ समय के लिए श्रृंगेरी मठ से बाहर पूना की ओर गये हुए थे। पत्र जगद्गुरु के एक पत्र के उत्तर में है। इस पत्र-व्यवहार से स्पष्ट है कि उस समय के जगद्गुरु श्री शंकराचार्य में और टीपू सुलतान में किस प्रकार का सम्बन्ध था।

टीपू के महल के अंदर अनेक हिन्दू पुरोहित और ज्योतिषी रहा करते थे, और टीपू की ओर से यज्ञ, हवन, जप इत्यादि किया करते थे। मरते दम तक टीपू ने ब्राम्हणों को दान दिए और हिन्दू ज्योतिषियों के आदेशानुसार यज्ञ हवन करवाए। भाद्रपद शुक्ला द्वितीया विरोधीकृत संवत्सर, अर्थात सन 1791 का जगद्गुरु को लिखा एक पत्र भी है जिसमें टीपू ने अपने खर्च पर जगद्गुरु से ‘शतचण्डी सहस्त्र पाठ’ की व्यवस्था कर देने की प्रार्थना की है।

नंजनगुंड, श्रीरंगपट्टन और मेलकोट इत्यादि के अनेक हिन्दू मंदिरों को टीपू ने अनेक बार नज़रें और जागीरें दीं। इनमें से बंगलोर में टीपू के जनाने महल के ठीक सामने श्रीवेंकटरामन्न स्वामी का मंदिर, महल से मिला हुआ श्रीनिवास का मंदिर, श्रीरंगपट्टन के महल के पास श्री रंगनाथ स्वामी का मंदिर और श्रीरंगपट्टन के और अनेक मंदिर आज तक टीपू के धार्मिक उदारता के साक्षी हैं।

टीपू के विषय में धार्मिक उदारता के विषय में इससे अधिक सबूत देने की आवश्यकता नहीं है। उस तरह के नरेश पर अपनी तुच्छ स्वार्थ-दृष्टि से झूठे कलंक लगाना उसके, उसके देश और उसकी जाति, तीनों के साथ अन्याय करना है।

[भारतीय इतिहास और अर्थशास्त्र के गौरवग्रँथ
भारत में अंग्रेजी राज-प्रथम खण्ड]
किताब पर आधारित लेख।

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