बकरवाल कौन हैं..

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-नारायण बारहठ||

कोई शिकस्त उन्हें वादी ए कश्मीर तक ले गई
कश्मीर में तीन नस्लीय समूह है -कश्मीरी ,डोगरी और गुज्जर

लेकिन वे जो जबान बोलते है वो न कश्मीरी से मिलती है न डोगरी के करीब है।
जम्मू -कश्मीर में गुज्जर और बकरवाल गोजरी भाषा बोलते है। यह राजस्थानी के निकट है।
जम्मू में शौकत जावेद गुज्जर बिरादरी से है। वे आवाज ए गुज्जर पत्रिका के सम्पादक भी रहे है। वे कहते है ‘ गुज्जर और बकरवाल जंग हारने के बाद इस इलाके में आ गए।उनकी भाषा में राजस्थानी जबान का प्रभाव है।

जम्मू कश्मीर में कोई दस बारह लाख गुज्जर है। बकरवाल भी गुज्जर है। चूँकि वे सदियों से बकरी पालन कर जीवन बसर करते है। इसलिए उन्हें बकरवाल कहा जाता है। गुजरो और बकरवालो में परस्पर शादिया

होती है।जावेद कहते है ‘आपको उनमे वो सब सर नेम मिलेंगे जो राजस्थान के गुजरो में मिलते है।
गौर वर्ण ,लम्बी कद काठी ,मजबूत देह और अमन पसंदी उनकी पहचान है। जावेद बताते है आपको कोई भी बकरवाल छह फुट से कम नहीं मिलेगा।वे डेरो में रहते है। कुछ डेरे पक्के है ,कुछ कच्चे। जम्मू क्षेत्र में कच्चे डेरे है। लेकिन कश्मीर में अब डेरे पके हो गए है।जावेद के मुताबिक गुज्जरो की आबादी में बकरवालो की संख्या तीन चार लाख होगी।

वादी में मौसमें सर्दा आते है बकरवाल अपने माल मवेशियों के साथ जम्मू इलाके में आ जाते है। फिर जैसे ही गर्मी आती है ,कारवां वादी ए कश्मीर में दाखिल हो जाता है। जावेद बताते है जब बकरवाल एक इलाके से दुसरे इलाके का रुख करते है ,पहले एक अग्रिम दस्ता आगे पहुंचता और अस्थाई डेरा बनाता है। पीछे पीछे बकरवाल मवेशी के साथ दूसरे दल में पहुंचते है। उनका अपना कम्युनिकेशन सिस्टम है। शौकत जावेद के अनुसार ,वे खास तरह की शीटी से आवाज निकालते है।उनके जानवर बकरवालो के इशारे समझते है।
जावेद कहते है अब इनमे पढ़ाई लिखाई का चलन बढ़ा है।गुज्जर बिरादरी की दो के करीब लड़किया डॉक्टर बन गई है। इनमे पंद्रह बीस बकरवाल भी है। जम्मू और कश्मीर में एक बालिका हॉस्टल है। उनमे बकरवाल लड़किया पढ़ रही है। सूबे के 22 जिलों में हॉस्टल है। इनमे छात्र रहते है और पढ़ते है। खर्च सरकार वहन करती है। बकरवालो में कुछ पढ़ लिख कर अफसर बन गए है। लेकिन बहुतायत अब भी मवेशी पालन करती है।उनके साथ बकरिया है ,भेड़े है और घोड़े भी है। पर बकरियों का बाहुल्य है। इसीलिए बकरवाल हो गए। कुछ नमक का कारोबार करते थे ,वे लूणवाल हो गए।

स्वभाव में कैसे है ?जावेद बताने लगे ‘शांति प्रिय लोग है। आप देखलो जिस बच्ची आसिफा के साथ ज्यादती हुई है ,उसके परिवार वालो ने इतना ही कहा उन्हें अल्लाह देखेंगे। और वे अपने माल मवेशी के साथ आगे बढ़ गए। अब मीडिया वाले उन्हें खोज रहे है।
राजस्थान में गुज्जर आंदोलन ने सक्रिय रहे डॉ रूप सिंह कहते है ‘ मुगल काल में ये लोग दमन का शिकार हुए और पहाड़ो में चले गए।उनकी आस्था में इस्लाम है। मगर उनके जाति उप नाम वही है जो राजस्थान में गुजरो के है। डॉ सिंह कहते है -जम्मू कश्मीर में गुज्जर और बकरवाल वतनपरस्ती में हमेशा आगे रहे है। जब कारगिल में घुसपैठ हुई ,एक बकरवाल ने ही सुरक्षा कर्मियों को सूचना दी। ऐसे ही 1971 में माला गुज्जर ने वतन के लिए शहादत दी।

डॉ सिंह के मुताबिक – माली गुज्जर के अलावा 1965 की लड़ाई में एक गुज्जर महिला जाउनी को भारत ने अपने तमगो से सम्मानित किया।इसके साथ मोहंदीदन और गुलाब्दीन को पदम् पुरस्कारों से नवाजा गया ।

उस क्षेत्र में गुज्जर समुदाय के लिए जम्मू में गुज्जर देश चेरिटेबल ट्रस्ट बहुत काम कर रहा है।इसमें गुजर बिरादरी के प्रमुख लोग जुड़े हुए है। वे इतिहास संकलन से लेकर समुदाय की तरक्की के लिए काम करते है।अलग अलग इलाको में रहे रहे अपने समुदाय के लोगो को परस्पर जोड़ा है।

राजस्थान में जब गुज्जर समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर सड़को पर आया और हिंसा हुई तो जम्मू कश्मीर के गुज्जर नेता भी चिंतित हुए।इनमे जम्मू के पूर्व उप कुलपति मसूद चौधरी भी शामिल थे /उन्होंने जयपुर में सरकार से हुई बातचीत में अपनी बिरादरी की नुमाइंदगी की । वे गुज्जर बिरादरी के पहले व्यक्ति थे जो अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पद तक पहुंचे।बाद में जब राजौरी में बाबा गुलाम शाह बादशाह यूनिवर्सिटी स्थापित हुई तो वे उसके संस्थापक कुलपति बने।

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