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वर्तमान राजनीति हमें बेईमान बना रही है

-अरुण कुमार झा||

कोई व्यक्ति जन्मजात नैतिकताविहीन नहीं होता। नैतिक और अनैतिक संस्कार उसे परिवार और अपने समाज से मिलता है। जैसा पारिवारिक परिवेश होगा बच्चे के मन पर वैसा ही संस्कार अंकित होगा। संस्कारों के क्रमिक विकास में समाज का बड़ा योगदान होता है। बच्चे जिस समाज-चरित्र में संस्कारित होते हैं वही उसका राष्ट्रीय चरित्र होता है। एक बात उल्लेखनीय है कि आज देश में जिस प्रकार का राजनीति माहौल है उसके प्रभाव से कोई अछूता नहीं है- चाहे बच्चे हों या बुजूर्ग। इसका सु-प्रभाव या कुप्रभाव बच्चे के संस्कार पर पड़ता है। जो आजीवन विकसित होता रहता है।

आज अधिकांश व्यक्तियों में सत्यनिष्ठा की कमी पाई जाती है वह इस लिए कि देश की राजनीति हमें बेईमान और कुसंस्कारी बना रही है। राजनीति अपने आप में बुरी चीज नहीं होती। लेकिन राजनीतिक पार्टियों के कुसंस्कार के कारण राजनीति की दिशा और दशा बदल सी गयी है। यह बूरी तरह बदरंग होती चली जा रही हैै। यह हमारे जीवन पर इस कदर हावी-प्रभावी है कि एक भी सांस लेना इसके बिना असंभव है। इसके कुप्रभाव का ही असर है कि हम नैतिकता और अनैतिकता में अन्तर कर नहीं पा रहे हैं। हर तरफ से इनकी शैतानी चाल हमारी नैतिकता को छलनी कर रही है। इसी दिशाहीन राजनीति के कारण सत्ताधारी अपने स्वार्थ और लालचीपन के चलते मनमानी कर देश की संवैधनिक संस्थाओं को बेइमान, पंगु और अंधा बनाते जा रहे हैं। आम आदमी को कुछ सूझ नहीं रहा है कि वह किस दिशा में जाये। फल स्वरूप उनका स्वार्थ जिस तरफ सुरक्षित दिखता है, वे उसी तरफ बिना सोचे समझे दौड़ पड़ता है। वहीं से व्यक्ति में नैतिकता का क्षरण प्रारम्भ होता है। फिर व्यक्ति रीढ़विहीन जनता या एक वोटर बन कर रह जाता है। किसी राजनीतिक संस्था/व्यक्ति के पिछलग्गू या उनके अंधभक्त बन कर चिर काल के लिए अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अशुभ साबित होने लगता है। तत्काल तो यह सबकुछ अच्छा और बड़ा लुभावना लगता है, आधुनिक सुख-सुविधाओं को भोगने में सक्षम भी हो जाता है लेकिन यही स्थिति उसकी आने वाली पीढ़ी को बेईमान और अनैतिक बनाती है। यही अनैतिकता समाज और राष्ट्र के लिए विश्वसनीयता और निष्ठा का संकट खड़ा करने में अपनी भूमिका बनाने लगती है जो हमें दिखाई नहीं देता। यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है। पता नहीं यह कब तक ऐसा ही चलता रहेगा।

खगोलीकरण के कारण दुनिया के किसी कोने में छोटा विकास हो या बडा विकास, इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी जाती है। लेकिन बहुत क्षोभ की बात है कि जिसे दुनिया विकास कहती है वह एक भ्रम है।

यह विकास किसके लिए और क्यों?

इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो क्योंकि हम विनाश को ही विकास समझने की भूल कर बैठते हैं। विश्व पटल पर भी यही सब चल रहा है। खगोलीकरण से यह तो पता चलता है कि दुनिया के सभी देश इसी अंधी दौड़ में शामिल हैं। सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए बड़े-बड़े हथियारों और विनाश के ‘वेपन’ तैयार किये जा रहे हैं। विज्ञान का फायदा प्राणी की भलाई के लिए होने की जगह आज समाज और राष्ट्र को क्षतविक्षत करने के लिए प्रयोग में आने लगा है। परमाणू बम हो या हाइड्रोजन बम या अन्य रासायनिक बम- आखिर इसकी क्या उपयोगिता हैें? किसी के पास इस का जवाब नहीं है। लेकिल यह सामान्य सी बात है कि हर देश डरा हुआ है। हर देश के प्रमुख अपनी संप्रभुता की रक्षा के नाम पर विनाशकारी खेल जारी रखे हुए हैं। विचारणीय सवाल है कि आखिर प्राणी विनाश के औजार से कौन सी सभ्यता को बचाने के लिए विकास का ढोंग कर रहे हैं? हथियारों की होड़ में पागल होती दुनिया के सभी देश किसी से पीछे नहीं रहना चाहते। क्या नोबल की आत्मा कहीं शांति से रह रही होगी?

विक्षिप्त होती देश और दुनिया की राजनीति की दशा और दिशा को नया आयाम देने के लिए हमें नई ‘आइडियोलाॅजी’ पेश नहीं करना चाहिए? इस दिशा में पूरी दुनिया के ‘थिंकर’ और ‘आविष्कारक’ क्यों मौन हैं? इस बात के लिए मानव ही नहीं प्राणी संरक्षणवादी संस्थाएँ भी मौन क्यों हैं? मुझे तो लगता है कि 21वीं सदी में भी पूरी दुनिया या तो पूरी तरह सभ्य नहीं हुई है या पूरी तरह होशो-हवास में ही नहीं है, जरूर मानसिक रूप से बीमार है या पागल!

इसका एक ताजा उदाहरण सोशल मीडिया भी है। जुकरबर्ग ने जब फेसबुक की स्थापना की होगी उसने भी नहीं सोचा होगा उस वक्त कि इसका दुरूपयोग व्यक्ति और समाज के भटकेाव, नफरत और गुमराह करने, राजनीतिक के दुष्प्रचार के लिए करेंगे। यह पागलपन नहीं तो और क्या है? लाइक-लाइक के ओछा खेल में कितने लोग डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। तो बाजारवादियों के लिए यह प्लेटफाॅर्म स्वर्ग का मंच साबित हो रहा है। वहीं विकृत मानसिकता वाले सेक्स-सेक्स के आभासी खेल खेलने में लगे हुए हैं।

लालच और बाजारवाद ने हर आदमी के मन-प्राण पर अपना दबाव बनाया हुआ है। इसमें घी का काम हमारी व्यवस्था पूरी करती है। नैतिकताविहीन शिक्षा हमारी पीढ़ी के लिए अनुकूल नहीं है। यहाँ भी राजनीति अपना कुप्रभाव डाल रखा है। अपने बच्चों को शिक्षा हम इसलिए दिलवाते हैं कि वह पैसा बना सकें इसी वजह से शिक्षा को बाजारोन्मुखी बना दिया गया है। जबकि शिक्षा का मूल स्वभाव यह है कि वह मनुष्य को समग्रता में इंसान बनाती है। मनुष्य के दिल में पूरी तरह मानवता के भाव पैदा करती है। ईश्वर ने भी मनुष्य को इस लिए बनाया था। लेकिन हमने तो ईश्वर को भी व्यापार का औजार बना दिया है। यह सब भी असली शिक्षा के अभाव में हो रहा है। इस जगह भी हमारे व्यवस्थापक और तथाकथित शिक्षाविद् टोटली फेल साबित हो रहे हैं।

लगभग दो दशक से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और स्तर में जो गिरावट और क्षरण आया है यह भारी चिन्ता का विषय है। लेकिन इसकी चिन्ता किसी को नहीं है। शोध का स्तर इतना निम्न है कि शोध आलेख पढ़कर तरस आता है उच्च शिक्षा के व्यवस्थापकों पर। सतही शोध से किसका भला होगा मुझे नहीं पता। पीएचडी प्राप्त कर शिक्षक बनने की होड़ जारी है। इससे समाज और शिक्षा का कितना भला होगा। यह समझना बड़ा मुश्किल काम है।

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