एक जंगली होने के नाते मैं कानून की बारीकियां नहीं जानता..

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वो हमारे नायक है !
वो हमारे हीरो है। 
शम रात भर अंधेरो से लड़ती रही 
सवेरा हुआ तो उजालो ने बुझा दिया। 

-नारायण बारेठ||
जयपाल सिंह मुंडा ने आज ही के दिन आखिरी सांस ली थी। वे जंगे आज़ादी के योद्धा थे, उनमे बहुत कुछ था कि पीढ़िया अपने इस नायक को याद करे और याद रखे।
वे आदिवासी थे। वे आदिकाल से भारत में रहते आये है। वे आदिम है। मुंडा भारत की हॉकी टीम के कप्तान भी थे। होलेंड में 1928 में आयोजित हॉकी ओलम्पिक में भारतीय टीम ने मुंडा की कप्तानी भारत की जीत के झंडे गाड़े और भारत को गोल्ड मेडल मिला।उस समय वे ब्रि टेन में भारतीय प्रशासनसिक सेवा के प्रशिक्षु थे। उन्हें ओलम्पिक में जाने की इज्जाजत नहीं दी गई।लेकिन ये मुंडा की वतनपरस्ती थी ,उन्होंने अंग्रेज हुकूमत की परवाह नहीं की। सरकार नाराज हुई और प्रशिक्षण अवधि बढ़ा दी गई। मुंडा ने इसे गवारा नहीं किया और नौकरी को ठोकर मार दी।

देश की सविंधान सभा में वे आदिवासियों के प्रतिनिधि थे। 19 दिसम्बर 1946 में वे सविंधान सभा से मुखातिब हुए/ उनके बोल कालजयी बन गए। इस सभा में नेहरू जैसे गणमान्य बैठे थे। स्व मुंडा ने प्रस्ताव पर बेलाग कहा -” एक जंगली होने के नाते मैं कानून की बारीकियां नहीं जानता। मगर मेरी समझ कहती है हम सभी को आजादी की राह पर साथ साथ चलना है।

सर ,अगर कोई एक भारतीय समूह है जिसके साथ बहुत अन्यायपूर्ण और बेदर्दी का सलूक किया गया है ,वो सिर्फ मेरे लोग है। उन्हें विगत छ हजार साल से उपेक्षा का शिकार बनाया जा रहा है। मैं भारत का इतिहास हु ,मैं सिंधु घाटी सभ्यता की संतान हु। आप में से ज्यादातर घुसपैठिये है। ये जो नवागन्तुक है ,उन्होंने मेरे लोगो को सिंधु घाटी से जंगलो में फैंक दिया। पूरा इतिहास अनवरत शोषण की कहानी कहता है। पंडित नेहरू ! मैं आपके अल्फ़ाज़ में यकीन करता हु ,हम एक नया अध्याय शुरू कर रहे है ,आज़ाद भारत का नया अध्याय। वहां सब को समान अवसर मिलेंगे ,किसी की उपेक्षा नहीं होगी ” [“As a jungli, as an Adibasi, I am not expected to understand the legal intricacies of the Resolution. But my common sense tells me that every one of us should march in that road to freedom and fight together. Sir, if there is any group of Indian people that has been shabbily treated it is my people. They have been disgracefully treated, neglected for the last 6,000 years. The history of the Indus Valley civilization, a child of which I am, shows quite clearly that it is the new comers — most of you here are intruders as far as I am concerned — it is the new comers who have driven away my people from the Indus Valley to the jungle fastness…The whole history of my people is one of continuous exploitation and dispossession by the non-aboriginals of India punctuated by rebellions and disorder, and yet I take Pandit Jawahar Lal Nehru at his word. I take you all at your word that now we are going to start a new chapter, a new chapter of independent India where there is equality of opportunity, where no one would be neglected.”]

मगर आज के हालत कुछ और ही गवाही देते है।स्वतंत्र भारत में स्व मुंडा की संतति के साथ हमने न्याय नही किया। 52 फीसद आदिवासी गरीबी रेखा के नीचे का जीवन बसर करते है। तीन आदिवासी बहुत -छत्तीसगढ़ ,झारखण्ड और ओडिसा खनिज सम्पदा से भरपूर है। मगर किसी भी राज्य में कोई आदिवासी सी एम नही है। अब कॉर्पोरेट उन्हें बेदखल करने में लगे हुए है/भारत के हर तीसरे घर और सरकारी ढांचे में छत्तीसगढ़ का लोहा लगा है। मगर आदिवासी गरीब है।

रांची से दिल्ली चलने वाली सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस को ‘दासता एक्सप्रेस ‘ कहते है। क्योंकि प्रति दिन इस गाड़ी में झारखण्ड से आदिवासी लड़कियों को मानव तस्करी के रूप में बड़े शहरो में लाया जाता है। एक गैर सरकारी संघटन के मुताबिक कोई 42 हजार आदिवासी लडकिया बड़े शहरो में घरो और दफ्तरों में गुलाम की तरह काम करती है। उनके साथ हर तरह की ज्यादती होती है।नेता चुप है। धर्म और धर्माचार्य खामोश है।सिर्फ स्व मुंडा की रूह आंसू बहाती है। वे ओक्स फोर्ड में पढ़े थे। कुशल वक्ता थे। अच्छे प्रशासक थे।उस वक्त रुतबे वाली इंडियन सिविल सर्विस में चुने गए/लेकिन इससे विलग हो गए। बीकानेर रियासत दौर में[1938 ] कुछ वक्त बतौर राजस्व आयुक्त काम किया। लेकिन यह रास नहीं आया/ वे आदिवासी महासंघ बना कर काम करने लगे। आदिवासी उन्हें सम्मान से” मारंग गोमके ‘ यानि महान नेता कहते है। काश जन जन भी यही कहता। सविंधान सभा में कहे उनके शब्द आदिवासी बहुत जंगल ,दरिया ,दरख्त और वादियों में गूँज रहे है।लेकिन उनकी बरसी का लम्हा तब आया जब पूरा भारत क्रिकेट।भला बाजार को इससे क्या सरोकार। एक बार सरदार पटेल ने कहा आदिवासी सच्चे राष्ट्रवादी है ,ये लोग आज़ादी की लड़ाई हमसे भी पहले से लड़ते रहे है।अखबारों में छपती रिपोर्टे आदिवासी बहुल राज्यों में गरीबी की दारुण दास्तान सुनाती रहती है।

बेशक मुंडा एक कुशल खिलाडी थे। मगर न वे बाजार का खेल जानते थे, न उनकी संतान इस खेल से वाकिफ है।
शत शत नमन इस महानायक को !

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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