देश नहीं बिकने दूँगा पर IMPCL तो बेच ही दूँगा..

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आईएमपीसीएल के निजीकरण का यह उदाहरण फिर से मोदी सरकार के दोहरे चरित्र को समझने के लिए काफी है। एक तरफ मोदी, आयुर्वेद और योग के प्रसार का ढिंढोरा पीटते हैं और दूसरी ओर सरकारी स्वामित्व वाली एकमात्र आयुर्वेदिक दवा कंपनी को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहे हैं जबकि यह कंपनी मुनाफे में चल रही है और ‘मिनि रत्न’ पीएसयूज़ में शुमार है।

रोहित जोशी॥

‘देश नहीं बिकने दुंगा.’ यह नारा आपको याद होगा. 2014 के लोकसभा चुनावों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किए गए वादे/नारे आप इतनी जल्दी भूल भी नहीं पाएंगे, ​क्योंकि अत्याधुनिक प्रचारमाध्यमों के ज़रिए आपकी अंत:चेतना में इन्हें बार—बार इस तरह बिठाया गया था, कि मोदी को वह अविश्वस्नीय बहुमत मिला.

लेकिन फिर क्या हुआ, इन वादों का.. इन नारों का? पीएनबी घोटाला आजकल चर्चाओं में है और साथ ही इस घोटाले में शामिल ‘नीरव मोदी’ और ‘मेहुल भाई’ का प्रधानमंत्री मोदी से नजदीकी परिचय बताया जा रहा है. सोशल मीडिया में नीरव मोदी के साथ पिछले दिनों प्रधानमंत्री की दावोस यात्रा के दौर की तस्वीरें भी शेयर हो रही हैं। साथ ही एक वीडियो में प्रधानमंत्री ‘मेहुल भाई’ का नाम इस तरह लेते दिख रहे हैं जैसे वे काफी क़रीबी परिचित होते हों।

यह ‘हरि’ कथा है.. और अनंत है..

सोशल मीडिया में चुनावी रैली के दौरान का प्रधानमंत्री का एक वीडियो भी सर्कुलेट हो रहा है जिसमें वे कह रहे हैं, ”आप मुझे प्रधानमंत्री मत बनाइये.. भाईयो बहनो.. आप मुझे चौकीदार बनाइए.. चौकीदार.. और भाईयो बहनों मैं दिल्ली में जाकर चौकीदार बनकर बैठुंगा.. और आपको विश्वास दिलाता हूं कि आप ऐसा चौकीदार बिठाओगे कि मैं हिंदुस्तान की तिज़ोरी पर कोई पंजा नहीं पड़ने दुंगा.”

मोदी अपनी स्वाभाविक भाषण शैली में यह बात गरजते हुए कहते हैं. लेकिन हासिल क्या हुआ. जनता ने उन्हें दिल्ली में चौकीदार क्या प्रधानमंत्री बना दिया और उन्हीं की नाक के नीचे से नीरव मोदी पीएनबी में जमा भारतीय जनता के 11400 करोड़ रूपये ले उड़े. ‘तिज़ोरी पर पंजा’ पड़ गया। लेकिन आप चिंता ना करें यह चौकीदार सोया नहीं था बल्कि नीरव मोदी को खुद दावोस में दावत दे रहा था।

जनता को ठगे जाने का यह इकलौता वाकिया नहीं बल्कि सिलसिला है। ‘हर अकाउंट में 15 लाख’ को पहले ही चुनावी जुमला कह दिया गया। अच्छी खासी ग्रोथ वाली इकॉनोमी, नोटबंदी और जीएसटी की मार झेल क्राइसिस में चली गई। राफेल को कई गुना दामों में ​खरीद कर, सौदे की डिटेल सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया गया। करोड़ों रोजगार के दावे ऐसे पिघले कि स्वत:स्फूर्त पकौड़े का ठेला लगा अपनी रोजी कमाने वालों को मोदी ने अपने ‘मेक इन इंडिया’ में लपेट लिया। जज लोया पर क्या हो रहा है हम देख ही रहे हैं। यह ‘हरि’ कथा है.. और अनंत है।

‘देश नहीं बिकने दुंगा’

इस आलेख की शुरुआत, ‘देश नहीं बिकने दुंगा.’ से की गई थी फिर वहीं लौटते हैं। बीते दौर में देश और देशभक्ति को जिस तरह सत्तारुढ़ भाजपा और उसके मातृ संगठन आरएसएस की सुविधाजनक परिभाषा में सीमित कर दिया गया है, अगर आप उसी परिभाषा के आधार पर मोदी के ‘देश नहीं बिकने दुंगा’ के नारे को पढ़ें तो आप आंख मूंद कर परमानंद का भ्रम पाल सकते हैं।

लेकिन असल में जो ‘देश’ है उसे मोदी के नेतृत्व में बेचा जा रहा है। ऐसे कई वाकिए हैं। बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स के लाखों करोड़ों में लोन्स को माफ कर दिया गया है। रेलवे को सरकारी कंपनी इंडियन आॅयल के बजाय प्रधानमंत्री की प्रिय निजी कंपनी रिलायंस से डीजल सप्लाई करवा, सरकार/देश के ख़जाने को अरबों की चपत लगाई जा रही है। तेल से लगने वाली इस चपत का सिलसिला चलता रह सके ​इसके लिए रेलवे के विद्युतिकरण का प्रस्तावित कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है।

‘स्ट्रेटेजिक डिस्इंवेस्टमेंट’ यानि निजीकरण की नई स्ट्रेटेजी

इसी सिलसिले में मोदी सरकार, सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियों को भी बेच रही है और इसे नाम दिया गया है ‘स्ट्रेटेजिक डिस्इंवेस्टमेंट’ का। पिछले साल मोदी सरकार के नीति आयोग ने सरकार की स्वामित्व वाली 36 कंपनियों को बेचकर 75 हज़ार करोड़ रुपये जुटाने का जो अभियान क्षेड़ा असल में यह देश को बेचने के अभियान का ही हिस्सा है।

इसी अभियान में भारत के आयुष मंत्रालय की एक ऐसी कंपनी भी चपेट में आ रही है जो कि भारत सरकार की आयुर्वेदिक और यूनानी दवाएं बनाने की एकमात्र कंपनी है। अल्मोड़ा ज़िले के मोहान में स्थित, इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) नाम की इस कंपनी के भी डिस्इंवेस्टमेंट यानि कि उसे निजी हाथों में बेचने की कवायद शुरू हो चुकी है।

योग आयुर्वेद का ढिंढोरा और असलियत

आईएमपीसीएल के निजीकरण का यह उदाहरण फिर से मोदी सरकार के दोहरे चरित्र को समझने के लिए काफी है। एक तरफ मोदी, आयुर्वेद और योग के प्रसार का ढिंढोरा पीटते हैं और दूसरी ओर सरकारी स्वामित्व वाली एकमात्र आयुर्वेदिक दवा कंपनी को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहे हैं जबकि यह कंपनी मुनाफे में चल रही है और ‘मिनि रत्न’ पीएसयूज़ में शुमार है।

आईएमपीसीएल के कर्मचारी इन दिनों इस डिस्इंवेस्टमेंट को लेकर अपने भविष्य को लेकर आशंकाओं से भरे हैं। कंपनी की विभिन्न ट्रेड यूनियनें इसका विरोध कर रही हैं और सवाल उठा रही हैं कि ‘इसे बेचने की आखिर ज़रूरत क्या है जबकि आईएमपीसीएल लगातार बढ़ोत्तरी में है और 2016-17 में इसका सालाना टर्नओवर 66.45 करोड़ का रहा है।

कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर, आरबी चौधरी बताते हैं कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने, आईएमपीसीएल के मूल्य निर्धारण की प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए ट्रांजेश्नल एडवाइजर, लीगल एडवाइजर और एसेट वैल्यू फर्म के चयन के लिए टैंडर जारी कर दिए हैं। ”जब आईएमपीसीएल के कुल मूल्य निर्धारण के बारे में इन संस्थाओं की रिपोर्ट आ जाएगी तो सरकार डिस्इंवेस्टमेंट की दिशा में अगला कदम उठाएगी।” चौधरी ने सरकारी प्रक्रिया के बारे में बताया।

वित्त मंत्रालय के निवेश एवं सार्वजनिक सम्पत्ति प्रबंधन विभाग डीआईपीएएम की ओर से मंत्रालय की वैबसाइट में एक रिलीज़ जारी की गई है जिसमें बताया गया है कि बताया गया है कि दिल्ली में 6 लीगल एडवाइजर फर्मस्ए, आईएमपीसीएल के साथ ही तीन अन्य सरकारी कंपनियों के ‘स्ट्रैटेजिक डिस्इंवेस्टमेंट’ की लीगल एडवाइज़िंग के लिए प्रेजेंटेशन देंगी जिसके बाद इनमें से किसी एक फर्म को चुन लिया जाएगा। लेकिन मंत्रालय ने इस प्रजैंटेशन की तारीख को पिछले दो महीनों में अब तक तकरीबन 5 बार बदल दिया है।

“पतंजली को फायदा पहुंचाने की कोशिश तो नहीं”

इस पर आईएमपीसीएल की गतिविधियों पर लंबे समय से नज़र रखे सामाजिक/राजनीतिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट मुनीष कुमार गंभीर सवाल उठाते हैं। ”उस लॉ फर्म पर बहुत कुछ निर्भर करता है जिसे कि डिस्इंवेस्टमेंट की प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए चुना जाएगा। ऐसे में केंद्रीय मंत्रालय, जिस तरह बार-बार इन लॉ फर्मस् के प्रैजेंटेशन की तारीखों में बदलाव कर रहा है ​इसने पारदर्शिता को लेकर हमारे जेहन में संदेह पैदा कर दिया है।”

मुनीष कुमार आगे कहते हैं, ”एक तरफ आईएमपीसीएल को डिस्इंवेस्ट करने का फैसला और ठीक उसी समय में पतंजली आयुर्वेद लिमिटेड को उत्तराखंड में जड़ी—बूटियों के दाम निर्धारित करने के अधिकर देना, सरकार इन कवायदों पर सवाल उठाता है। देश में आयुर्वेद के क्षेत्र में पतंजली सबसे बड़ी कंपनी है और एनडीए सरकार उसे फायदा पहुंचाती रही है। ऐसे में आईएमपीसीएल को निजी हाथों में सौंपने की यह कवायद कहीं रामदेव की पतंजली को फायदा पहुंचाने की कोशिश तो नहीं, यह सवाल उठना जायज हो जाता है।”

“नुकसान कर्मचारियों को”

उधर, आईएमपीसीएल के कर्मचारी संगठनों में भी कंपनी को निजी हाथों में सौंपे जाने को लेकर रोष है। ठेका मजदूर कल्याण संघ के अध्यक्ष किशन शर्मा कहते हैं, ”एक तरफ सरकार योग और आयुर्वेद को बढ़ावा देने की बात करती है और दूसरी तरफ आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली सरकार की एकमात्र कंपनी को बेचने की कवायद कर रही है। यह मोदी सरकार का दोहरा चरित्र है।”

किशन शर्मा सरकार के प्रति रोष जताते हुए कहते हैं, ”हमने कई बार कंपनी के भीतर चल रही अनियमिततओं के खिलाफ प्रदर्शन किए और कई पत्र भी सरकार को लिखे लेकिन कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन सरकार उन अनियमिततओं को दूर कर कंपनी के कामकाज सुधार कर इसके मुनाफे में बढ़ोत्तरी और कर्मचारियों के कल्याण की बात सोचने के बजाय इस बेचने जा रही है। यह शर्मनाक है।”

आईएमपीसीएल में एसी एसटी ओबीसी कर्मचारी और अधिकारी संघ के अध्यक्ष रवि राम भी डिस्इंवेस्टमेंट पर एतराज़ जताते हुए कहते हैं, ”डिस्इंवेस्टमेंट से सबसे अधिक नुकसान कर्मचारियों को होगा।”

इधर, कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर आरबी चौधरी का कहना था कि कंपनी प्रबंधन ने भी आयुष मंत्रालय के ज्वाइंट सैक्रेट्री के माध्यम से पीएमओ का एक पत्र लिखकर इस डिस्इंवेस्टमेंट को रोकने की गुहार लगाई है। ”जैसा कि मुझे मालूम है, पीएमओ हमारे पत्र का गंभीरता पूर्वक संज्ञान ले रहा है क्योंकि आईएमपीसीएल एक मुनाफे में चल रही कंपनी है। हमें उम्मीद है कि इसके डिस्इंवेस्टमेंट को रोक दिया जाएगा।”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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