मोदी जी सुनिए तो..

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-अंशुल कृष्णा

आदरणीय मोदी जी,

अभी अभी केतली से चाय लेकर एक मगरमच्छ नुमा पकौड़ा हाथ में लिया ही था कि एक खबर देखकर चौंक गया ,खबर थी कि आप फिलिस्तीन में हैं और वहां 6 अहम करारों में एक करार नेहरू स्कूल को लेकर भी है ,वही नेहरू जो प्रधानमंत्री न होते तो देश मे कोई समस्या ही न होती ,बस पकौडे, चाय ,आप और हम होते,वैसे नेहरू को लेकर मैं आपसे सहमत हूँ ,वो आदमी बाकई बुरे थे ,देखिये न तो उनका सीना 56 इंच का ,और न ही उन्होंने कभी चाय बेची,न ही कोई दँगा करवाया ,और न ही किसी करन थापर के यहां पानी पिया,बस इसरो ही तो दिया ,जो बस 56 हजार किमी तक रॉकेट करता है ,क्या कहा ? नंबर गलत है ,अच्छा वैसे 600 करोड़ वाला नंबर भी गलत है ,हम दोनों एक जैसे हैं ,

हाँ तो मैं कह रहा था कि नेहरू अच्छे आदमी नहीं थे ,अच्छा आदमी तो वो होता है जो सदन में एक महिला की हँसी का मजाक बनाते हुए उसकी तुलना रामायण के किसी पात्र से कर दे और वो भी तब जब उसकी अपनी धर्म पत्नी किसी दुर्घटना में जख्मी हो गयी हो ,धर्म जो राजनीति में कब आया ये आपसे बेहतर कौन जानता होगा ,और बीवी -छोड़िये वो फिर कभी ..आपने जब नेहरू पटेल वाली बात कही तो कई वेबपोर्टल्स ने छापा कि आपकी इतिहास की जानकारी ठीक नहीं है ,वो जो कह रहे हैं वो ही कुछ कुछ मैंने भी पढ़ रखा है लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूँ क्योंकि उनमें से किसी के पास एंटायर पोलिटिल साइंस की डिग्री नहीं है ,जबकि आपके पास तो … अच्छा अच्छा उस पर नहीं बोलना सॉरी सॉरी …

वैसे मैं आपका फैन हूँ क्योंकि जिस वक्त रोजगार भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर इराक में क्रांति मची है ,आपने उन सब मुद्दों का पकौड़ा बनाकर सारी क्रांति खुद ही कर डाली ,वैसे मैं बस एक बात पर आपसे असहमत हूँ आप देश के तीन महापुरुषों का जिक्र करते हैं -गांधी बुद्ध और दींन दयाल ,ये भी कोई महापुरुष हुए ,न तो इनके बेटे ने 80 करोड़ कमाये ,न ही किसी का नाम DDCA में आया ,न ही राफेल में ,और न ही किसी जज की हत्या के केस में ,तो कैसे महापुरुष हो सकते हैं मैं इससे असहमत हूँ ,देश मे सिर्फ तीन लोग ही महापुरुष हो सकते हैं ,आप अमित और जेटली,अब ये तो मानना पड़ेगा आपको ,आपको चाय पकौडे और केतली की कसम !!

मोदी जी मैं खुद को किसी विचारधारा से कभी जोड़ ही नहीं पाया ,क्योंकि एक विचारधारा है जिससे आदिवासी दलित और पिछड़े छूट जाते हैं तो दूसरी विचारधारा है जिससे कश्मीरी पंडित छूट जाते हैं ,और साला हम दोनों (मैं और आप) से तो दोनों ही छूट जाते हैं ,क्या करें पकौड़ा ही इतना अच्छा है और शुक्रीया इस केतली का जो चाय अब तक गर्म है ,

मोदी जी जिस वक्त सीमा पर शहीदों की संख्या बढ़ती जा रही हैं ,एक अस्पताल से वो किसी आतंकी को भी छुड़वाकर ले गए ,आज भी कुछ सैनिक शहीद हुए ,सुना 5 में से 4 मुसलमान थे ,लेकिन वो मैं नहीं बताऊंगा,हिन्दू राष्ट्र बनाना है आखिर, मोदी जी मुझे तो बहुत डर लग रहा था ,लेकिन मैने किसी से कुछ कहा नहीं क्योंकि मेरे पास 1984 वाले सवाल का जवाब नहीं था लेकिन मुझे मोहन भागवत जी ने बहुत हिम्मत दी ,उन्होंने जिस तरीके से देश की सेनाओं पर भरोसा तोड़ते हुये तीन दिन में संघ के सेना बनाने की बात कही है ,मेरे सभी बागों में बहार आ गयी है ,सीना मेरा भी बढ़ता ही जा रहा,बस डर है कि कहीं फिलिस्तीन तक न पहुँच जाए ,मोहन भागवत ने जब से तीन दिन वाला बयान दिया है ,तब से पाकिस्तान पूरा खाली हो चुका है ,चीन के लोग पैकिंग करने लगे हैं,पुतिन अभी खाकी नेकर पहने मिला ,तब मैने ही उससे कहा -हाफ नहीं फुल पहन के आओ ,सद्दाम हुसैन फिर से जिंदा होकर कांप रहा है ,ट्रम्प और ओबामा तोगड़िया वाली जगह पर छुपे हुए है,विदेश की धरती पर सिर्फ आपका ही नहीं भागवत का भी ड़ंका बज रहा है लेकिन यहाँ का बामी मीडिया हमको ये बताता ही नहीं.

अच्छा चलता हूँ मोदी जी ,सुबह से धूप नहीं निकली तो कपड़े नहीं सूख पाये ,अगर पटेल प्रधानमंत्री होते तो जरूर सूख जाते ,ख्याल रखिये अपना ,आप तब तक उधर से मंदिर का उद्घटान करके लौटिए ,तब तक मैं आपके हिस्से का झूठ बोलकर लोगों का बताता रहूँगा -मंदिर वहीं बनाएंगे!! नेहरू की फ़ोटो भी शेयर करनी हैं अब तो काम बहुत बढ़ गया है मोदी जी ,ये बामिये पता नहीं कहाँ से लीलाधर बाजपेयी का जिक्र खोज लाये ,और कहां से बजराज मधोक की किताब खोल निकाले ,मैं आज कल इनसे बहस नहीं कर पाता ,फंस जाता हूँ तो फोटोशॉप फ़ोटो बहुत काम आतीं हैं ,

धन्यवाद

(अंशुल कृष्णा की फ़ेसबुक वाल से)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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