एक था पेड़..

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-वीरेंद्र चौधरी॥

एक पेड़ था। पेड़ से अपनी पुरानी दोस्ती थी। बातचीत भी होती थी। बचपन इसी पेड़ की छाँव में गुजरा था। लोग इस पेड़ को बूढा पेड़ कहते थे, जबकि वह और जवान, और हरा होता जा रहा था। पेड़ को बूढ़ा कहने वाले अलबत्ता बुढ़ाते जा रहे थे।

गर्मियों की कोई ऐसी दोपहरी नहीं होगी, जो इसकी छाँव तले न बीती हो। सारे खेल यहीं होते थे। कभी-कभार तमाशे वाले भी आते। रस्सी पर चलने वाले नट-नटी, मदारी, बर्तन में कलई लगाने वाले, चाक़ू-छूरी तेज करने वाले, बर्तन में नाम लिखने वाले; किसी का भी आगमन होता तो दरी बिछाने से लेकर समेटने तक, पूरी कार्रवाई के प्रत्यक्षदर्शी होने का अलिखित विधान जैसा था।

पेड़ के नीचे एक चूल्हा था। पत्थरों को जुटा-जमाकर बनाया हुआ। अस्थाई होते हुए भी अब इसका दर्जा स्थाई जैसा हो गया था, क्योंकि एक के बाद दूसरे का आना-जाना लगा रहता था। तब पूरे इलाके में सिर्फ एक भिखारी हुआ करता था, जिसका नाम खेतरो था। खेतरो यायावर किस्म का भिखारी था। एक गाँव में 5-6 दिन से ज्यादा नहीं टिकता था। हमेशा फौजियों वाली एक घिसी हुई वर्दी में नजर आता था। सिर पर खाकी रंग का हेट होता था। खेतरो जितने दिनों तक गाँव में रहता, इस पेड़ की छाँव ही उसका डाक बंगला होती और पत्थरों वाला चूल्हा उसकी रसोई। उसका सारा माल-असबाब एक पोटली में हुआ करता था और मुझे पोटली को खोलकर देखने की तीव्र इच्छा हुआ करती थी। जरूर उस पोटली में कुछ जादुई चीजें हुआ करती थीं। एक दिन किसी दूसरे गाँव से खबर आई कि खेतरो का ‘माढ़र’ हो गया। चर्चा आस-पास के सारे इलाके में फैल गई। यह एक मर्डर मिस्ट्री थी, जिसने कई दिनों तक लोगों की उत्तेजनाओं को बरकरार रखा था। भला खेतरो जैसे भिखारी की कोई हत्या कैसे कर सकता है? पर यह बात सिर्फ मुझे पता थी कि उसकी जान जाने का कारण जरूर उसकी जादुई पोटली रही होगी। काश कि मैं कभी उसे देख पाता!

बाइस्कोप वाले बूढ़े बाबा का ओपन एयर थियेटर इसी पेड़ के नीचे जमा करता था। बाइस्कोप उनकी पीठ पर मजबूत पट्टों से बंधा होता था और हाथ में लकड़ी का एक फोल्डिंग स्टैंड होता था, जो अंग्रेजी के ‘एक्स’ अक्षर के आकार में बना होता था। पेड़ के नीचे आकर वे सबसे पहले स्टैंड को फैलाते और फिर बाइस्कोप को रख देते। माथे से पसीना पोंछने के बाद मेरी ओर देखते। में इशारा समझ जाता और दौड़कर घर से घड़े का ठंडा पानी ले आता। गिलास तब कांसे का हुआ करता था और उसका आकार आज के प्रचलित गिलासों की तुलना में तीन गुना बड़ा रहता होगा। पानी पीकर वे तृप्त हो जाते और गीले-बुदबुदाते होंठों से आसीस जैसा कुछ देते थे। फिर बच्चों को इकठ्ठा करने के लिए फेरी होती थी और खेल शुरू हो जाता था। गीत एक ही बजता था जो उन दिनों बाइस्कोप वालों का ‘नेशनल एंथम’ था- “देखो, देखो, देखो/ बाइस्कोप देखो/ दिल्ली का कुतुबमीनार देखो/ बम्बई शहर की बहार देखो/ ये आगरे का है ताजमहल/ घर बैठे सारा संसार देखो।” लौटने से पहले वे एक गिलास पानी और पिया करते थे।

नट-नटी वाले खेल में पूरे परिवार का आगमन होता था। महिला अपना मोर्चा पेड़ तले चूल्हे में संभालती थी। पुरुष करतब का सूत्रधार होता था और एक छोटा-सा हमउम्र बालक खेल का हीरो। दोनों छोर में बाँस के सहारे पतली-मजबूत रस्सी को तान दिया जाता था। एक बाँस उस छोटे से बच्चे के हाथ में थमाया जाता और जिस उम्र में बच्चे पैजनियाँ बजाते ठुमक-ठुमक चलते हुए गिरते हैं, वह ऊँचाई पर तनी हुई रस्सी पर सीधे चलता था। नीचे चूल्हे पर रोटियाँ सिकती होती थीं। आग सिर्फ चूल्हे में नहीं होती थी। उस बच्चे के पेट में होती थी जो अपनी गर्मी से उसके पांवों को ऐन रस्सी में टिकाए होती थी। उस बाप के पेट में होती थी जो फूल से बच्चे को कई बार मना करने के बावजूद घुड़क कर चढ़ने को विवश करता था और दर्शकों की निगाह में ‘निर्दयी बाप’ का किरदार निभाता था। आग उस माँ के पेट में भी होती थी जो जानबूझकर हमेशा इस तरह से बैठती थी कि रोटियाँ सेंकते हुए तनी हुई रस्सी उसकी पीठ की ओर हो।

सबसे ज्यादा मज़ा मुझे तब आता जब भालू वाला मदारी आता था। उसके पास ‘भालूमोहरी’ होती थी। बाँसुरी को वहाँ की स्थानीय बोली में मोहरी कहा जाता था। पर वह बाँसुरी नहीं होती थी, बाँस होता था। बाँसुरी का आदिम रूप। आगे चलकर बाँस गीत बस मुझे आकाशवाणी रायपुर में सुनने को मिला। अब पता नहीं रायपुर में
यह संगीत बजता है या नहीं, क्योंकि रायपुर में अब आदिम रूप में कुछ भी नहीं बचा। शहर अब सारे स्मार्ट हो गए हैं।

बूढा पेड़ बच्चों के लिए बूढ़े बाबा की तरह थे। उनका आसरा हर मौसम में था। गर्मियों में छाँव तो मिलती ही थी और जब दोपहरी में घर के सारे बड़े लोग सो जाते थे, बच्चों वाले खेल यहीं होते थे। आज की तरह खिलौने नहीं होते थे। खेलने वाली सामग्री में कौड़ियाँ, टूटी हुई चूड़ी, घोड़ा छाप माचिस के खाली डिब्बे, इमली और सीताफल के बीज, साइकिल की पुरानी टायर, उसकी ट्यूब से बने गुलेल, तालाब से बीनकर लाए हुए चिकने पत्थर वगैरह हुआ करते थे। खेलते हुए बच्चों को देखने की जिम्मेदारी बूढ़े पेड़ बाबा की होती थी। सर्दियों में जब धूप में बदन जलने लगता था और छाँव में ठंड लगती थी तो आधी धूप, आधी छाँव बाबा से ही मिलती थी। बारिश में जब अचानक तेज बारिश हो जाए तो घर तक पहुँचने से पहले भीगने से पहले यहीं रुका जाता था। माँ उधर चिल्लाकर कहती कि बारिश में पेड़ के नीचे नहीं खड़ा होना चाहिए। बिजली यहीं पर गिरती है।

उन दिनों कुरकुरे, चिप्स, चाकलेट नहीं हुआ करते थे। घर में होली-दीवाली के एक महीने पहले व्यंजन बनना शुरू हो जाते। इन्हें ‘सीलबंद’ डिब्बों में रख दिया जाता क्योंकि पूजा के बाद भोग लगाने से पहले इन्हें जूठा नहीं किया जा सकता था। यह नियम हम बच्चों के मौलिक अधिकारों का हनन था। हर बार सीलबंद डिब्बों से बेसन के लड्डू या बर्फी चुराई जाती थी और चुराए हुए माल का भोग लगाने के लिए बूढ़े बाबा की छांव का ही आसरा था। चोरी पकड़े जाने के बाद पिटाई भी होती थी और रुलाई आने पर आँसू भी बाबा ही पोंछते थे।

गाँव से कहीं बाहर जाने पर जब भी लौटना होता, तो सबसे पहले दौड़कर वहीं जाता मानों कह रहा हूँ कि “बाबा, देखो में लौट आया।” फिर एक दिन गाँव छूट गया। गाँव की जब भी याद आती है, सबसे पहले उसी दरख्त का चेहरा याद आता है। मुझे पता है कि चेहरे पर कभी झुर्रियाँ नहीं आई होंगी। पत्ते पहले से ज्यादा हरे होंगे। कुछ नई कोपलें भी फूटी होंगी।

सोचा था कि इस बार गर्मियों में सारे काम छोड़कर गाँव जाऊँगा और घण्टे-दो घण्टे बाबा से बतिया आऊँगा। पर सुना है कि उनकी हत्या कर दी गयी है। खेतरो के बाद यह उस इलाके की दूसरी बड़ी हत्या है।अब गाँव का विकास हो रहा है। विकास के आगे बड़े-बड़े सुरमा नहीं टिक पाते तो एक बूढ़े दरख्त की क्या औकात। बस इतना है कि विकास के लिए उजड़ने वालों को मुआवजा देना पड़ता है। चार सौ साल पुराने दरख्त की हत्या करने का मुआवजा सौ साल से भी कम अरसे में आने वाली पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा। हाँ, जो कहानियाँ इसके नीचे दफ्न हो गयी हैं, उनकी गूंज शायद ही कभी सुनाई पड़े। जितनी मुझे पता थी, कह दी!

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