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सुभाष बोस ने नैतिकता की गांधीवादी राह कभी नहीं छोड़ी

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गुरदीप सिंह सप्पल॥

आज नेता जी सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिवस है।121 साल पहले, 1897 में उनका जन्म हुआ और मात्र 48 साल की आयु में वे हम से दूर चले गए।

नेताजी जी क्या थे? ये समझने के लिए केवल तथ्य जानना काफ़ी नहीं है। उन तथ्यों को अपने दिल से लगा कर, उनका मर्म समझना होगा। ख़ुद उनका दिल कैसे धड़कता था, ये अहसास करना होगा।

उस इंसान का ख़्वाब कोई महान या बड़ा व्यक्ति बनना नहीं था। ऐसा होता तो ICS की नौकरी को नहीं छोड़ देते। सिर्फ़ 21 साल की उम्र थी तब, और ICS परीक्षा में चौथी पोज़िशन पाई। बड़ेपन का ख़्वाब होता हो साहब बन कर पूरी ज़िंदगी ठाठ से रहते।

जीवन राह मुश्किल चुनी। जो सत्ता सिर पर साहबी का रुतबा सजा रही थी, उसी से टकराने चल दिए।सिर्फ़ इसलिए कि रुतबा सिर्फ़ ख़ुद के लिए नहीं, पूरे हिंदुस्तान के लिए चाहते थे।

नए रास्ते पर चलने के लिए चिरंजनदास की शगिर्दी की और काँग्रेस से जुड़ गए। लेकिन केवल धरना प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहे। अख़बार निकाला, कलकत्ता नगर निगम के CEO बने, फिर मेयर भी बने और फिर 1925 में गिरफ़्तार हो गए।

तीन साल बाद जेल से निकले तो गांधी के शिष्य और नेहरु के साथी बन कर। इन दो रिश्तों में ही बोस का असली व्यक्तिव नज़र आता है और इन्हीं रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में उन्हें समझा जा सकता है।

नैतिकता, सिद्धांत और कार्यशैली ये तीनों अलग अलग हैं, यह सच बोस के गांधी और नेहरु से रिश्तों की गहराई में डूब कर ही समझ आता है।

बोस नैतिकता में गांधी के अनुयायी थे, तो सिद्धांत में नेहरु के साथी और कार्यशैली में दोनों ही से जुदा, बिलकुल ही अलग।

गांधी से विरोध भी किया, दो दो बार काँग्रेस के अध्यक्ष बने।गांधी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ दोनों बार जीते भी। लेकिन नैतिकता की गांधीवादी राह नहीं छोड़ी। विरोध और समर्पण की ये नयी मिसाल थी।

अध्यक्षता के ये साल आसान नहीं थे, बापू की कार्यशैली से मेल कर ही नहीं सके। लेकिन सिद्धांत पर साफ़ थे कि कैसा भारत चाहिए। इसीलिए, बतौर अध्यक्ष प्लानिंग कमेटी बनायी और नेहरु को ही उसका अध्यक्ष बनाया। कहा भी कि नेहरु ही वह बौद्धिक क्षमता रखते हैं, जो प्लानिंग के इस काम को पूरा कर सके।

ये प्लानिंग कमेटी ही आज़ाद भारत की रूपरेखा की नींव बनी। इसने 37 रिपोर्ट दीं, हर विषय पर दी – वित्त, वाणिज्य, लेबर, कृषि, खाद्य सुरक्षा, बीमा, विदेश व्यापार जैसे सभी क्षेत्रों की रूपरेखा बनाई।

बोस- नेहरु की इसी जुगलबंदी ने स्वाधीन भारत में प्रशासन की तैयारी को फ़ाइनल रूप दे दिया।

गांधी के विरोध के चलते ही बोस को काँग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। तब वे काँग्रेस से भी अलग हो गए और फ़ॉर्वर्ड ब्लाक नाम से अपनी पार्टी बना ली।

बोस सशस्त्र विरोध के हिमायती थे। इसीलिए आज़ाद हिन्द फ़ौज बनायी। यहीं आ कर गांधी, नेहरु से उनके रिश्तों में की सच्चाई उजागर होती है।

जिन गांधी की वजह से काँग्रेस छोड़ी, जिन नेहरु को बोस के बाद गांधी ने पार्टी सौंपी, उन्हीं गांधी, नेहरु के नाम पर आज़ाद हिन्द फ़ौज की ब्रिगेड का नाम रखा। एक ब्रिगेड थी गांधी ब्रिगेड, दूसरी थी नेहरु ब्रिगेड।

यही नहीं, 1944 में गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ का ख़िताब भी बोस ने ही दिया था। रिश्तों की तल्ख़ी और सिद्धांतों के सम्मान की अनोखी दास्ताँ थी ये। लेकिन ये इक तरफ़ा नहीं थी।

जब बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज बनायी और युद्ध लड़ा, तो काँग्रेस के सभी नेता जेल में थे। सेन्सरशिप के दौर में जेल में कोई ख़बर नहीं आती थी। जब तक बाहर आए तो आज़ाद हिन्द फ़ौज हार चुकी थे और बोसे ताइवान में हवाई दुर्घटना के शिकार हो चुके थे। उनके साथियों पर देशद्रोह के मुक़दमे चल रहे थे।

तब नेहरु ने काँग्रेस को आज़ाद हिन्द फ़ौज के पक्ष में खड़ा किया। पार्टी की ओर से डिफ़ेन्स कमेटी बनायी और लाल क़िला मुक़द्दमा लड़ा। नेहरु ने ख़ुद भी दशकों बाद वक़ील का काला चोगा पहना।

कोर्ट में बतौर वक़ील नेहरु के खड़े होने का नैतिक, राजनीतिक संदेश सिर्फ़ ब्रिटिश सरकार ही नहीं, पूरी दुनिया ने सुना। नेहरु के इस एक क़दम से नेताजी बोस नाज़ी साथी होने के आरोप से बरी हो पाए। दुनिया ने उन्हें नाज़ी जर्मनी और जापान के साथी के रूप में नहीं, अपने देश के स्वाधीनता सेनानी के रूप में स्वीकार किया।

नेहरु की बोस को श्रधांजलि आगे भी जारी रही, जब उन्होंने बोस ने नारे ‘जय हिंद’ को राष्ट्रीय उदघोष के रूप में स्वीकारा। यही नहीं संविधान सभा में ‘जन गण मन’ की उसी धुन को अधिकारिक धुन का दर्जा दिलवाया, जो बोस ने जर्मनी में तैयार करवायी थी। हालाँकि इस धुन का कुछ विरोध था, क्योंकि ये धुन नाज़ी कार्यक्रम के लिए बनायी गयी थी।

आज जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्मतिथि है, हम अगर व्यक्तिगत विरोध, देशहित, सिद्धांत, नैतिकता के इस जटिल तालमेल को समझ सकें, तो ये देश -समाज में कितने ही तनाव कम हो जाएँगे।

(बोस की इसी शख़्सियत और उनके काम के एक पहलू पर मैंने RSTV में रहते हुए रागदेश फ़िल्म बनायी थी। नेताजी को ये मेरी श्रद्धांजली थी।
उम्मीद है राज्य सभा टीवी आज़ाद हिन्द फ़ौज पर बनाया हुआ टीवी सीरीयल भी जल्दी रिलीज़ करेगा, जो चैनल के पास बन कर तैयार है)
(लेखक राज्यसभा टीवी के पूर्व CEO हैं)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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